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वैश्विक उथल-पुथल के दौर में भारत की भूमिका

दुनिया में बड़ा बदलाव हो रहा है. अमेरिका की नीतियां बदल रही हैं, वैश्वीकरण बिखर रहा है, और तकनीकी व ऊर्जा क्षेत्र में होड़ बढ़ रही है. भारत के लिए यह अवसर और चुनौती दोनों है.

India Global Role
Prashant Rai Edited by Prashant Rai

दुनिया में इस समय बड़े बदलाव हो रहे हैं. अमेरिका में ट्रंप प्रशासन की वापसी के साथ ही नीतियों में भारी बदलाव देखने को मिल रहा है. वह फिर से “Make America Great Again” पर जोर दे रहा है. इसके तहत अमेरिका ने व्यापार संतुलन सुधारने और सरकारी खर्च कम करने के लिए नए टैरिफ लगाए हैं. पुराने गठबंधनों को फिर से परिभाषित किया जा रहा है, जिससे यूरोप और एशिया के सहयोगियों पर असर पड़ रहा है. इसके अलावा, अमेरिका पेरिस समझौते, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) से हट चुका है. इन फैसलों से वैश्विक शक्ति संतुलन में एक शून्य पैदा हो गया है. लेकिन यह शून्य लंबे समय तक नहीं रहेगा – इसे अन्य महाशक्तियां भरने की कोशिश करेंगी.

अमेरिका अभी भी सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन दुनिया फिर से बहुध्रुवीय (Multipolar) बनती जा रही है. वैश्वीकरण का बिखराव, तकनीकी प्रभुत्व की होड़, ऊर्जा की राजनीति और वैश्विक संस्थाओं की विफलता—ये सभी बड़े बदलाव भारत के लिए नए अवसर और चुनौतियां लेकर आ रहे हैं.

तकनीक पर बढ़ता नियंत्रण और व्यापार युद्ध

आज का दौर तकनीक की होड़ का है. चिप निर्माण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और साइबर सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गए हैं. दुनिया भर में देश अरबों डॉलर चिप मैन्युफैक्चरिंग पर खर्च कर रहे हैं ताकि वे तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बन सकें.

दूसरी तरफ, व्यापार युद्ध फिर से शुरू हो गए हैं. 2008 की आर्थिक मंदी के बाद से वैश्वीकरण कमजोर हुआ. कोविड-19 महामारी ने वैश्विक सप्लाई चेन को हिला दिया, जिससे देशों और कंपनियों ने वैकल्पिक सप्लाई चेन बनाने की दिशा में काम शुरू किया. ट्रंप प्रशासन के नए टैरिफ नीतियों के चलते यह प्रक्रिया और तेज हो गई है.

व्यापार युद्ध अब केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं हैं. तकनीक, ऊर्जा और औद्योगिक नीतियों पर भी इनका असर दिख रहा है. देश रक्षा और ऊर्जा सुरक्षा के लिए अपने उद्योगों की रक्षा कर रहे हैं. विश्व व्यापार संगठन (WTO) कमजोर हो चुका है, जिससे देश द्विपक्षीय (bilateral) और बहुपक्षीय (plurilateral) समझौतों की ओर बढ़ रहे हैं.

भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर है. अगर सही नीतियां अपनाई जाएं, तो भारत वैश्विक उत्पादन केंद्र (manufacturing hub) बन सकता है. इसके लिए व्यापार समझौतों, निवेश-आकर्षित करने वाली नीतियों और कारोबारी माहौल को आसान बनाने पर ध्यान देना होगा.

ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन

ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव हो रहा है. आज वे देश ताकतवर बन रहे हैं जिनके पास लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ मेटल्स जैसे खनिजों का भंडार है. या फिर वे, जो इनका प्रसंस्करण (processing) करते हैं.

70-80% रेयर अर्थ मेटल्स का खनन और प्रसंस्करण चीन के पास है. 80% सोलर पैनल्स और 70% इलेक्ट्रिक व्हीकल बैटरियां चीन में बनती हैं.

अमेरिका ने पेरिस जलवायु समझौते से हटकर परंपरागत ईंधन (fossil fuel) पर जोर दिया है. यह वैश्विक ऊर्जा बदलाव के लिए खतरा पैदा करता है. विकसित देशों ने पहले ही 80% कार्बन बजट इस्तेमाल कर लिया है, लेकिन वे विकासशील देशों को पर्याप्त जलवायु वित्त (Climate Finance) नहीं दे रहे. इससे विकासशील देशों की आगे बढ़ने की संभावनाएं प्रभावित हो रही हैं.

भारत को ग्रीन हाइड्रोजन, सोलर एनर्जी और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में निवेश जारी रखना होगा. हमें खनिजों तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए व्यापार समझौतों पर भी ध्यान देना होगा. साथ ही, हमें नए तकनीकी सहयोग (जैसे अगली पीढ़ी के सोलर पैनल और बैटरियां) पर भी जोर देना चाहिए.

वैश्विक संस्थाओं की गिरती साख और भारत की भूमिका

जब दुनिया को सबसे ज्यादा वैश्विक सहयोग (Global Cooperation) की जरूरत है, तब संस्थाएं कमजोर हो रही हैं. संयुक्त राष्ट्र (UN) अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने में संघर्ष कर रहा है. WTO का विवाद निपटान तंत्र (dispute resolution mechanism) ठप पड़ा है. COP29 जलवायु वित्त पर कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाया. युद्ध और संघर्ष बढ़ रहे हैं. यूक्रेन, गाजा और सूडान में हालात खराब हैं. वैश्विक तापमान 1.5°C सीमा पार कर चुका है. ग्लोबल साउथ की आवाज अब भी अनसुनी की जा रही है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमेशा कहा है कि 21वीं सदी की चुनौतियों को पुराने संस्थानों से हल नहीं किया जा सकता. उन्होंने संवाद और समावेशिता पर जोर दिया है. भारत को इस अवसर का लाभ उठाकर नए वैश्विक आर्थिक मॉडल और न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए नेतृत्व करना चाहिए.

भारत की नई वैश्विक भूमिका

आने वाला दशक वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था को नया आकार देगा. भारत एक संतुलित और व्यावहारिक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभर रहा है. हम ग्लोबल साउथ के मुद्दों को उठा रहे हैं और वैश्विक संघर्षों पर संतुलित रुख अपना रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी के “संवाद को टकराव से ऊपर रखने” के संदेश को वैश्विक स्तर पर सराहा गया है. भारत की कूटनीतिक संतुलन नीति (Diplomatic Balancing Act) इस नए युग की पहचान बन रही है. हमें इस अवसर का पूरा लाभ उठाते हुए वैश्विक शक्ति संतुलन में अपनी स्थिति मजबूत करनी होगी.


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-भारत एक्सप्रेस



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