असम में 2026 के विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां अभी से तेज़ होती जा रही हैं. एक ओर राज्य की सत्ता पर काबिज भाजपा और उसके तेजतर्रार मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा हैं, तो दूसरी ओर कांग्रेस ने एक नए दांव के तहत लोकसभा में विपक्ष के उपनेता गौरव गोगोई को असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कमान सौंप दी है. इसके साथ ही अब साफ हो गया है कि आगामी चुनाव में मुकाबला “सरमा बनाम गोगोई” के फ्रेम में ढलता नजर आ सकता है.
राजनीतिक टकराव से निजी हमलों तक
बीते कुछ महीनों में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा और कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई के बीच राजनीतिक बयानबाज़ी तीखी होती गई है. सरमा ने गोगोई पर कई गंभीर आरोप लगाए, जिनमें पाकिस्तान यात्रा और उनकी पत्नी के आईएसआईएस से कथित संबंध जैसे विवादास्पद दावे भी शामिल हैं. सरमा ने यह भी कहा कि पाकिस्तान यात्रा के बाद गोगोई ने संसद में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवाल उठाए.
हालांकि अब तक मुख्यमंत्री इन आरोपों के पक्ष में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाए हैं. गौरव गोगोई ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन कांग्रेस ने जिस तरह उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया है, उससे यह स्पष्ट है कि पार्टी उनके साथ मजबूती से खड़ी है.
कांग्रेस की रणनीति: युवा नेतृत्व के सहारे बदलाव की दिशा में
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने न केवल 42 वर्षीय गोगोई को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया, बल्कि उनके साथ तीन युवा नेताओं — जाकिर हुसैन सिकंदर, रोजलीना तिर्की और प्रदीप सरकार — को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है. इस बदलाव से कांग्रेस ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि वह 2026 के चुनाव को युवा नेतृत्व, नई ऊर्जा और समावेशी राजनीति के आधार पर लड़ना चाहती है.
गौरव गोगोई, तीन बार के सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के पुत्र हैं. राजनीतिक विरासत और संसदीय अनुभव का संगम उन्हें कांग्रेस के लिए एक विश्वसनीय चेहरा बनाता है — खासकर तब, जब भाजपा विरोधी मतदाताओं के बीच एक नई लीडरशिप की तलाश हो रही है.
क्या गोगोई कांग्रेस के लिए गेमचेंजर साबित होंगे?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की यह रणनीति सिर्फ चेहरों की अदला-बदली नहीं, बल्कि चुनावी नैरेटिव को बदलने का प्रयास है. गोगोई बनाम सरमा की लड़ाई केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत लड़ाई नहीं बल्कि दो राजनीतिक दृष्टिकोणों — आक्रामक बनाम संतुलित, केंद्रीकरण बनाम संवाद — की टक्कर बन सकती है. हालांकि चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं. गोगोई को राज्य की जातीय और सामाजिक जटिलताओं को न केवल समझना होगा बल्कि उनसे जुड़कर कांग्रेस को ज़मीन पर फिर से खड़ा करना होगा.
रणनीति में दम है, अब परफॉर्मेंस की बारी
गौरव गोगोई की ताजपोशी कांग्रेस के लिए एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश है — कि पार्टी अब असम में लड़ाई को नेतृत्व आधारित फ्रेम में लेकर जाएगी. यदि कांग्रेस यह नैरेटिव मज़बूती से गढ़ पाती है और संगठन को ज़मीन पर सक्रिय कर पाती है, तो “गोगोई बनाम सरमा” की लड़ाई उसे रणनीतिक बढ़त दिला सकती है.
-भारत एक्सप्रेस
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