24 जुलाई 2025 को केंद्रीय गृह मंत्री एवं सहकारिता मंत्री ने राष्ट्रीय सहकार नीति (NCP) 2025 राष्ट्र को समर्पित की. इस नीति का उद्देश्य प्रधानमंत्री के मंत्र ‘सहकार से समृद्धि’ को साकार करने के लिए एक समग्र, आधुनिक और व्यवहारिक ढांचा तैयार करना है. देश में 8.5 लाख से अधिक सहकारी संस्थाएं किसानों, कारीगरों और छोटे उद्यमियों को आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभा रही हैं.
समग्र विकास और पारदर्शिता पर जोर
NCP में समावेशी विकास, सामाजिक-आर्थिक जवाबदेही और पारदर्शिता पर बल दिया गया है. इसमें दृष्टि, मिशन, लक्ष्य और प्रमुख क्षेत्रों के साथ कार्ययोजना और रणनीति तय की गई है. नीति में कानूनी, संस्थागत और परिचालन ढांचा भी शामिल है, जिससे सतत सहकारी और सामूहिक उद्यमों को बढ़ावा मिल सके. इसका उद्देश्य विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को हासिल करना है.
वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी सहकारिता
सहकारी संस्थाओं में विश्वस्तरीय उद्यम बनने की क्षमता है. इसके लिए नेतृत्व विकास, प्रतिस्पर्धात्मकता, पेशेवर प्रबंधन, गुणवत्तापूर्ण सेवाएं और ग्राहक संतुष्टि पर ध्यान देना जरूरी है. आधुनिक तकनीक और सामुदायिक भागीदारी से इन्हें अधिक सक्षम और भविष्य-उन्मुख बनाया जा सकता है. नीति में सभी हितधारकों के लिए जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की बात कही गई है.
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समावेशी विकास में सहकारिता की भूमिका
संविधान में सहकारी समितियों के गठन को मौलिक अधिकार माना गया है. NCP का लक्ष्य सहकारी आंदोलन को मजबूत और व्यापक बनाना है. इसके तहत युवाओं और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने, गतिविधियों में विविधता लाने और सहकारी संस्थाओं को तकनीक-आधारित, आधुनिक और प्रतिस्पर्धी बनाने पर जोर है.
सहकारिता के मूल सिद्धांत
नीति में सहयोग, आत्मनिर्भरता, जिम्मेदारी, लोकतंत्र, समानता और एकजुटता के मूल्यों को महत्व दिया गया है. स्वैच्छिक भागीदारी, लोकतांत्रिक निर्णय, स्वायत्तता, सदस्य आर्थिक भागीदारी, और सामुदायिक चिंता जैसे सिद्धांतों को अपनाने पर बल है. इससे देशभर में सहकारी संस्थाओं का विस्तार और प्रबंधन में पेशेवर दृष्टिकोण आ सकेगा.
सहकारी क्षेत्र में सुधार
NCP में अल्पकालिक, मध्यमकालिक और दीर्घकालिक सुधारों का विस्तृत खाका पेश किया गया है. चूंकि सहकारिता राज्य का विषय है, इसलिए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ तालमेल जरूरी है. विभिन्न राज्यों के सहकारिता कानूनों और प्रक्रियाओं की समीक्षा कर उनमें आवश्यक बदलाव लाने की सिफारिश की गई है. इससे महिलाओं, युवाओं, वंचित वर्गों, कारीगरों, भूमिहीन मजदूरों, मछुआरों और ग्रामीण-शहरी गरीबों की भागीदारी बढ़ाई जा सकेगी.
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-भारत एक्सप्रेस
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