Jaya Ekadashi Vrat Katha: इस साल जया एकादशी का व्रत आध्यात्मिक दृष्टि से काफी विशेष और फलदायी माना जा रहा है. इस दिन सिर्फ भगवान विष्णु का प्रिय गुरुवार ही नहीं है, बल्कि प्रातः 07:11 से 07:31 तक मात्र 20 मिनट के लिए रवि योग का अत्यंत शुभ मुहूर्त भी बन रहा है. शास्त्रों के अनुसार, रवि योग में की गई पूजा और संकल्प सभी बाधाओं को दूर कर जीवन में तेज और सफलता लाते हैं.
किसी भी उपवास को पूरा करने के लिए उसकी कथा सुनना काफी अहम माना जाता है. जया एकादशी की व्रत कथा भी इस दिन के महत्व को समझने का एक खास माध्यम है. नीचे व्रत की खास कथा लिखा है.
जया एकादशी के लिए व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha)
पद्म पुराण में जया एकादशी की महिमा का बड़ा ही सुंदर वर्णन मिलता है. एक बार की बात है, जब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे प्रभु! माघ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या महत्व है?” तब श्री कृष्ण ने बताया कि इस एकादशी को ‘जया एकादशी’ कहते हैं और जो भी इसका व्रत करता है, उसे कभी भूत-प्रेत या पिशाच योनि में नहीं भटकना पड़ता. इसे समझाने के लिए उन्होंने यह कथा सुनाई.
जब स्वर्ग में प्रेम बना श्राप का कारण
इंद्र लोक की सभा सजी थी. देवराज इंद्र के सामने अप्सरा पुष्पवती नाच रही थी और गंधर्व माल्यवान गा रहा था. नाचते-गाते हुए दोनों एक-दूसरे की खूबसूरती में इतना खो गए कि वे सुर और ताल ही भूल गए. उन्हें सुध ही नहीं रही कि वे इंद्र की सभा में हैं.
इंद्र को लगा कि ये उनका अपमान है. गुस्से में आकर उन्होंने श्राप दे दिया, “तुम दोनों ने मर्यादा तोड़ी है, इसलिए अभी स्वर्ग से गिरकर धरती पर पिशाच (राक्षस) बन जाओ और अपने पापों का फल भोगो.”
ये भी पढ़ें- 29 जनवरी का पंचांग: जया एकादशी, गुरुवार व्रत और शुभ मुहूर्त की पूरी जानकारी
हिमालय पर बिताए कठिन दिन
श्राप के कारण दोनों हिमालय पर्वत की कंदराओं में पिशाच बनकर रहने लगे. वहां न चैन था, न ढंग का खाना. वे बहुत दुखी थे. इसी दौरान माघ शुक्ल एकादशी आई. उस दिन ठंड बहुत थी. दुखों और भूख की वजह से उस दिन उन्होंने कुछ नहीं खाया और केवल फल-फूल खाकर ही समय काटा.
पूरी रात वे ठंड के कारण सो भी नहीं पाए. जाने-अनजाने में उनसे जया एकादशी का व्रत और रात भर का जागरण हो गया.
श्री हरि की कृपा और मुक्ति
जैसे ही अगली सुबह हुई, भगवान विष्णु की कृपा से उनका पिशाच रूप खत्म हो गया और उन्हें फिर से अपना सुंदर देव स्वरूप मिल गया. दोनों सीधे स्वर्ग पहुंचे. इंद्र उन्हें वापस अपने पुराने रूप में देखकर हैरान रह गए और पूछा, “तुम दोनों को इस भयंकर श्राप से मुक्ति कैसे मिली?”
तब माल्यवान ने हाथ जोड़कर कहा, “महाराज! यह भगवान विष्णु की जया एकादशी का चमत्कार है. उसी व्रत के प्रभाव से हम पिशाच योनि से आजाद हुए हैं.”
Also Follow Bharat Express on Youtube
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.



