रंगों के पर्व होली की शुरुआत ब्रज क्षेत्र में फुलेरा दूज के साथ रंगों में सराबोर होने लगी है. कहीं फूलों की होली हो रही है, तो कहीं लठमार होली की धूम है. इन सबके बीच मथुरा का एक छोटा सा गांव ‘फालैन’ पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है.
होलिका दहन तो पूरे देश में होता है, लेकिन फालैन में इसकी तैयारी करीब डेढ़ महीने पहले ही शुरू हो जाती है. यहां का पंडा (पुजारी) कोई मामूली व्रत नहीं रखता, बल्कि वह 45 दिनों तक एक ऐसी तपस्या करता है जिसे सुनकर ही पसीने छूट जाएं.
यूपी पर्यटन विभाग के अनुसार इस दौरान पुजारी पूरी तरह ब्रह्मचर्य का पालन करता है. वह जमीन पर सोता है, दिन में सिर्फ एक बार सात्विक भोजन करता है और अपना अधिकतम समय प्रह्लाद मंदिर में भक्ति में बिताता है. यह तैयारी शरीर को नहीं, बल्कि मन को उस अग्नि परीक्षा के लिए तैयार करने की होती है जिसे उसे होलिका दहन की रात पार करना है.
फालैन में आग और भक्ति का अद्भुत संगम
होलिका दहन वाली रात का नजारा वाकई रोंगटे खड़े कर देने वाला होता है. पूरा गांव प्रह्लाद कुंड के पास जमा होता है. मंत्रोच्चार के बीच जब विशाल होलिका में आग लगाई जाती है, तो उसकी लपटें आसमान छूने लगती हैं. गर्मी ऐसी कि दूर खड़े लोग भी पीछे हटने लगते हैं.
तभी, प्रह्लाद कुंड में डुबकी लगाकर पुजारी गीले बदन और नंगे पैर बाहर निकलता है. लोग सांसें थाम लेते हैं जब वह बिना किसी डर के उस प्रचंड आग के बीच में कूद पड़ता है. वह आग के बीच से दौड़ते हुए दूसरी तरफ निकल आता है और हैरानी की बात ये है कि सदियों से चली आ रही इस परंपरा में आज तक कोई भी पुजारी झुलसा नहीं है. गांव वाले इसे आज भी भगवान विष्णु का साक्षात चमत्कार मानते हैं.
क्यों खास है फालैन?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्रह्लाद को मारने के लिए उसकी बुआ होलिका उसे गोद में लेकर आग में बैठी थी. होलिका के पास वरदान था कि आग उसे नहीं जलाएगी, लेकिन इसका उल्टा हुआ. प्रह्लाद अपनी भक्ति की वजह से बच गए और होलिका जलकर राख हो गई.
फालैन गांव खुद को उसी घटना का गवाह मानता है, इसलिए इसे ‘प्रह्लाद की नगरी’ भी कहा जाता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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