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CBI के संयुक्त निदेशक दोषी करार! IRS अधिकारी के घर जबरन घुसने और मारपीट मामले में दिल्ली तीस हजारी कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

CBI joint Director Convicted: दिल्ली तीस हजारी कोर्ट ने साल 2000 में IRS अधिकारी के घर तड़के की गई दुर्भावनापूर्ण छापेमारी के मामले में दो वरिष्ठ CBI अधिकारियों को दोषी ठहराया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि CAT आदेश को निष्प्रभावी करने के लिए ये गिरफ्तारी की गई थी.

CBI joint Director Convicted

CBI joint Director Convicted

CBI joint Director Convicted: दिल्ली तीस हजारी कोर्ट ने साल 2000 में IRS अधिकारी के घर तड़के की गई दुर्भावनापूर्ण छापेमारी के मामले में दो वरिष्ठ CBI अधिकारियों को दोषी ठहराया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि CAT आदेश को निष्प्रभावी करने के लिए ये गिरफ्तारी की गई थी.

आज दिए गए इस ऐतिहासिक फैसले में, वर्तमान में CBI में संयुक्त निदेशक के पद पर कार्यरत रमनीश (जो वर्ष 2000 में डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस, SIU-8, CBI के पद पर तैनात थे) और वी.के. पांडे, सेवानिवृत्त सहायक पुलिस आयुक्त, दिल्ली (जो उस समय SIU-9, CBI में इंस्पेक्टर थे) को IPC की धारा 323/427/448/34 के तहत दोषी ठहराया गया है. इन धाराओं में जानबूझकर चोट पहुंचाना, शरारत करना, आपराधिक अतिक्रमण और साझा इरादे से किए गए कृत्य शामिल हैं. यह फैसला नई दिल्ली स्थित तीस हजारी कोर्ट में पश्चिम जिला के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी शशांक नंदन भट्ट की अदालत ने सुनाया.

इस मामले के शिकायतकर्ता अशोक कुमार अग्रवाल हैं, जो 1985 बैच के IRS अधिकारी हैं और उस समय दिल्ली जोन में प्रवर्तन निदेशालय में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर कार्यरत थे. बाद में CBI द्वारा दर्ज दोनों मामलों में उन्हें बरी कर दिया गया.

कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष – एक नजर में

गिरफ्तारी दुर्भावनापूर्ण थी

19 अक्टूबर 2000 को की गई तलाशी और गिरफ्तारी की पूरी कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण थी, जिसका एकमात्र उद्देश्य 28 सितंबर 2000 के CAT आदेश को निष्प्रभावी करना था, जिसमें शिकायतकर्ता के निलंबन की समीक्षा का निर्देश दिया गया था.

कोर्ट ने कहा कि आरोपियों ने अपने अधिकारों का खुला उल्लंघन किया. उनके कृत्य ‘आधिकारिक कर्तव्य’ के अंतर्गत नहीं आते, इसलिए उन्हें CrPC की धारा 197 या दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 140 के तहत कोई संरक्षण नहीं मिल सकता.

जबरन प्रवेश साबित

आरोपियों ने शिकायतकर्ता के घर का मुख्य स्लाइडिंग दरवाजा तोड़ा, जो शरारत और आपराधिक अतिक्रमण के दायरे में आता है. यह तथ्य आरोपियों की खुद की सर्च लिस्ट से भी साबित हुआ.

हिरासत में मारपीट

शिकायतकर्ता को बेडरूम से घसीटकर बाहर लाया गया, सीढ़ियों पर मारपीट की गई और उनके दाहिने हाथ में चोट आई. यह प्रत्यक्षदर्शियों, मेडिकल रिपोर्ट (MLC) और आरोपी वी.के. पांडे के हलफनामे से भी साबित हुआ.

CAT के निर्देश के अनुसार 18 अक्टूबर 2000 तक जवाब भेजने के बजाय, CBI ने उसी शाम एक गुप्त बैठक की और अगले दिन छापेमारी व गिरफ्तारी का निर्णय लिया, जिसे कोर्ट ने सोची-समझी साजिश माना. जिन CBI मामलों में जांच चल रही थी, उनमें शिकायतकर्ता को अंततः बरी कर दिया गया, जिससे उनका पक्ष मजबूत हुआ.

मामले की पृष्ठभूमि

शिकायतकर्ता संवेदनशील FERA मामलों की जांच कर रहे थे, जिनमें प्रभावशाली लोग शामिल थे. उन्होंने 1998-99 के दौरान राजस्व सचिव को 7 बार शिकायत की कि उनकी जांच में हस्तक्षेप किया जा रहा है. आरोप है कि बदले की भावना से, अभिषेक वर्मा (जिसकी जांच शिकायतकर्ता कर रहे थे) ने CBI अधिकारियों की मिलीभगत से उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद FIR दर्ज हुई.

जब CAT ने 28 सितंबर 2000 को उनके निलंबन की समीक्षा का आदेश दिया, तो आरोप है कि रमनीश ने इसे टालने और उन्हें फंसाने की कोशिश की. 18 अक्टूबर को जवाब देने के बजाय CBI ने उसी शाम गुप्त बैठक कर अगले दिन गिरफ्तारी का प्लान बनाया.

19 अक्टूबर 2000 की सुबह करीब 5 बजे CBI टीम शिकायतकर्ता के घर पहुंची. गार्ड ने पहचान पत्र मांगा तो उसे पीटा गया. टीम ने दीवार फांदी, दरवाजा तोड़ा, परिवार को एक कमरे में बंद किया और शिकायतकर्ता को अंडरगारमेंट्स में घसीटकर बाहर निकाला. उन्हें सीढ़ियों पर धक्का दिया गया जिससे चोट आई. बाद में उन्हें पीरागढ़ी के पास ले जाया गया और फिर अस्पताल ले जाया गया. उन्हें धमकी भी दी गई कि अगर उन्होंने शिकायत की तो परिवार को भी गिरफ्तार किया जाएगा.

महत्वपूर्ण कानूनी निष्कर्ष

अदालत ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट (2016) और सुप्रीम कोर्ट (2023) पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि आरोपियों को इस प्रावधान के तहत कोई संरक्षण नहीं मिल सकता. ट्रायल कोर्ट ने भी इसी निष्कर्ष को बरकरार रखा.

बचाव पक्ष की दलील खारिज

कोर्ट ने बचाव पक्ष के तर्कों को अविश्वसनीय बताया. बयान आपस में मेल नहीं खाते- एक ओर दरवाजा तोड़ने की बात स्वीकार की गई, जबकि दूसरी ओर केवल कुंडी टूटने का दावा किया गया. कोर्ट ने माना कि मेडिकल रिपोर्ट वैध है और खुद आरोपी ने इसे पहले स्वीकार किया था.

शिकायत दर्ज करने में हुई देरी को अदालत ने उचित ठहराया. कोर्ट के मुताबिक, आरोपी प्रभावशाली पदों पर थे और शिकायतकर्ता को धमकाया गया था, जिसके चलते देरी स्वाभाविक थी.

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कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि आरोपियों द्वारा 19.10.2000 को की गई तलाशी और गिरफ्तारी की कार्रवाई कानून के प्रावधानों का घोर उल्लंघन थी और इसका उद्देश्य CAT के आदेश को निष्प्रभावी करना था. यह पूरी कार्रवाई सोची-समझी साजिश थी.

इसी के साथ, CBI के संयुक्त निदेशक रमनीश और वी.के. पांडे को IPC की धारा 323/427/448/34 के तहत दोषी करार दिया गया. यह फैसला 18 अप्रैल 2026 को खुली अदालत में सुनाया गया.

-भारत एक्सप्रेस



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