Rajasthan JJM Scam Case
Rajasthan JJM Scam Case: राजस्थान के बहुचर्चित जल जीवन मिशन (JJM) टेंडर घोटाले में सियासी और प्रशासनिक घमासान तेज हो गया है. पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव (PHED) सुबोध अग्रवाल ने अपने खिलाफ दर्ज एसीबी एफआईआर को मनमाना और दुर्भावनापूर्ण बताते हुए इसे चयनात्मक कार्रवाई करार दिया है. उनका आरोप है कि जांच एजेंसियां पूरे मामले की बजाय केवल उनके कार्यकाल को निशाना बना रही हैं.
करीब 979 करोड़ रुपये के इस कथित घोटाले में दो फर्मों- श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी और श्री श्याम ट्यूबवेल कंपनी पर फर्जी अनुभव प्रमाणपत्रों के जरिए 2021 से 2023 के बीच 104 वर्क ऑर्डर हासिल करने का आरोप है. इनमें से 67 ऑर्डर 5 करोड़ रुपये से कम के थे, जिन्हें वरिष्ठ इंजीनियर स्तर पर मंजूरी मिली. वहीं, 37 बड़े टेंडरों में से 33 टेंडर पूर्व ACS सुधांश पंत के कार्यकाल (2020-2022) में स्वीकृत हुए, जबकि जांच फिलहाल 2023 में मंजूर सिर्फ 4 टेंडरों तक सीमित है.
सुबोध अग्रवाल का दावा है कि उन्होंने अपने कार्यकाल (18 अप्रैल 2022 से 12 जनवरी 2024) के दौरान अनियमितताओं को दबाने के बजाय उजागर किया.
- मार्च 2023 में ऊंची दरों के चलते वित्तीय बोलियां मंजूर करने से इनकार
- 2023 में कंपनियों की क्षमता की दोबारा जांच के निर्देश
- जून 2023 में IRCON से फर्जी प्रमाणपत्रों की शिकायत मिलने के बाद तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन
- अगस्त 2023 में रिपोर्ट आने पर सभी ठेके रद्द और ब्लैकलिस्टिंग की कार्रवाई
- सितंबर 2023 में संबंधित अधिकारी का निलंबन
सरकारी खजाने को नहीं पहुंचा कोई नुकसान
उनकी याचिका में कहा गया है कि उनके कार्यकाल में स्वीकृत किसी भी कार्य आदेश के बदले आरोपित फर्मों को भुगतान नहीं हुआ, जिससे सरकारी खजाने को कोई नुकसान नहीं पहुंचा. साथ ही, RTPP एक्ट के तहत तकनीकी पात्रता की जिम्मेदारी Bid Evaluation Committee की होती है, ऐसे में वित्त समिति तकनीकी रिपोर्ट पर भरोसा करने के लिए बाध्य थी.
अग्रवाल ने यह भी तर्क दिया कि एफआईआर 245/2024, पहले से दर्ज एफआईआर 215/2023 के समान विषय पर दूसरी FIR है, जो सुप्रीम कोर्ट के T.T. Antony बनाम केरल राज्य फैसले के विपरीत है.
जयपुर की विशेष अदालत ने भी जांच पर उठाये सवाल
इस बीच, 2 फरवरी 2026 को जयपुर की विशेष PMLA अदालत ने भी जांच पर सवाल उठाते हुए इसे पहली नजर में चयनात्मक और पक्षपातपूर्ण बताया. अदालत ने टिप्पणी की कि फर्जी IRCON प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल अप्रैल 2021 से हो रहा था, लेकिन जांच केवल 2023 के टेंडरों तक सीमित है.
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सुबोध अग्रवाल का कहना है कि उनके नेतृत्व में ही सभी 104 ठेके रद्द किए गए, भुगतान रोका गया, फर्मों को ब्लैकलिस्ट किया गया और दोषियों पर कार्रवाई हुई. ऐसे में उन्हें आरोपी बनाना “न्याय का विकृतिकरण” है. उन्होंने मांग की है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और व्यापक जांच हो, ताकि जवाबदेही सभी की तय हो- न कि सिर्फ चुनिंदा अधिकारियों की.
भारत एक्सप्रेस
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