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हर धार्मिक संस्था के लिए नियम जरूरी, अराजकता नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट

Religious Institutions Rules: सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धार्मिक संस्थानों के संचालन के लिए नियम और ढांचा होना अनिवार्य है. कोर्ट ने जोर दिया कि प्रबंधन का अर्थ ‘अराजकता’ नहीं हो सकता.

SUPREME COURT
Edited by Shubhra Rai

Sabarimala Case: 9 जजों की बेंच ने कहा कि हर धार्मिक स्थल (मंदिर या दरगाह) की अपनी मर्यादा और कार्यप्रणाली होनी चाहिए, लेकिन ये नियम संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकते. कोर्ट के अनुसार, व्यक्तिगत पसंद या मनमर्जी के बजाय एक संस्थागत रेगुलेशन जरूरी है, ताकि व्यवस्था बनी रहे और किसी भी तरह का भेदभाव न हो.

प्रत्येक धार्मिक संस्था के अपने नियम होने चाहिए

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मामले में सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रत्येक धार्मिक संस्था के अपने नियम होने चाहिए, अराजकता नहीं हो सकती. सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ मामले में कल भी सुनवाई जारी रहेगी.

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन के अधिकार का अर्थ संरचना का अभाव नहीं हो सकता, साथ ही इसके संचालन के लिए एक कार्यप्रणाली और मानदंड निर्धारित किया जाना चाहिए.

अधिकार का अर्थ संरचना का अभाव नहीं हो सकता

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि यह संरक्षण का पहलू है. प्रबंधन के अधिकार का अर्थ संरचना का अभाव नहीं हो सकता. हर चीज के लिए एक कार्यप्रणाली होनी चाहिए, अराजकता नहीं हो सकती. उन्होंने कहा कि एक दरगाह या मंदिर का उदाहरण लीजिए, संस्था से जुड़े तत्व, पूजा पाठ का तरीका और कार्यों का क्रम अवश्य होगा. किसी को तो इसे विनियमित करना ही होगा.

ऐसा नहीं हो सकता कि हर कोई अपनी मर्जी से कुछ भी करे या द्वार बिना किसी नियंत्रण के हर समय खुले रहें, तो सवाल यह है कि वह कौन सी संस्था है जो इसका प्रबंधन करती है? यही पर संरक्षण का महत्व आता है, क्योंकि विनियमन आवश्यक है.

संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकते

साथ ही यह संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकता. ऐसा नहीं हो सकता कि हर कोई अपनी मनमर्जी करें. न ही यह संभव है कि बिना किसी नियंत्रण के द्वार हर समय खुले रहें. सवाल यह है कि प्रबंधन करने वाली संस्था कौन सी है? कोर्ट ने यह साफ किया गया धार्मिक नियम संविधान के दायरे से बाहर नहीं हो सकते.

जस्टिस अमानुल्लाह ने आगे कहा, नियम जरूरी है, लेकिन वे संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकते. व्यापक संविधानिक मापदंडों पर किसी भी तरह का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है. हर संस्थान ने अपने मानक होने चाहिए और यह हर व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता.

जगह की अपनी धार्मिक मर्यादा है

मामले की सुनवाई के दौरान हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से जुड़े वंशज पीरजादा सैयद अल्तमश निजामी की ओर से पेश वकील निजाम पाशा ने कहा कि कोई व्यक्ति हिजाब को धार्मिक रूप से अनिवार्य मान सकता है.

लेकिन स्कूल के नियम अलग हो सकते है. मतलब धार्मिक विश्वास हमेशा संस्थागत नियमों से ऊपर नहीं हो सकता. अगर किसी मोहल्ले की मस्जिद सबके लिए खुली हो तो भी कोई जाकर घंटी नहीं बजा सकता है. आरती नहीं कर सकता है, क्योंकि उस जगह की अपनी धार्मिक मर्यादा है.

पाशा ने कहा कि इस्लाम मे मृत्यु के बाद संतों की स्थिति को लेकर अलग-अलग मत है, लेकिन सूफी आस्था प्रणाली में उस स्थान के प्रति गहरी श्रद्धा होती है, जहां किसी संत को दफनाया जाता है.

हर चीज के लिए व्यवस्था होनी चाहिए

उन्होंने कहा कि भारत में सूफी आस्था प्रणाली में चिश्तिया, कादरिया, नक्शबंदीया और सुहरावर्दिया सहित कई प्रमुख परंपराएं शामिल हैं. मौजूदा मामला चिश्तिया से जुड़ा है. मेरा कहना है कि यह व्यवस्था स्पष्ट रूप से एक धार्मिक संप्रदाय है.

अगर हजरत निजामुद्दीन औलिया की शिक्षाओं को देखा जाए, तो उनमें रोजा, नमाज, हज, जकात और सबसे बढ़कर आस्था जैसी इस्लामी परंपराओं के पालन पर जोर है. इसपर जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि प्रबंधन के अधिकार का मतलब ढांचे का अभाव नहीं हो सकता और हर चीज के लिए व्यवस्था होनी चाहिए.

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-भारत एक्सप्रेस



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