प्लास्टिक कचरे से दूषित होते समुद्र और नदियों में बह रहे गंदे पानी की सफाई.
प्लास्टिक कचरे से दूषित होते समुद्र और नदियों में बह रहे गंदे पानी की सफाई के लिए दुनिया में एक ऐसी अनोखी तकनीक काम कर रही है, जिसके बारे में आज भी बहुत से आम लोगों को जानकारी नहीं है. नीदरलैंड की गैर-लाभकारी संस्था ‘द ओशन क्लीनअप’ (The Ocean Cleanup) ने वैश्विक स्तर पर समुद्रों को बचाने की अपनी मुहिम को अब एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है. संस्था ने हाल ही में ‘द ऑडेसियस प्रोजेक्ट’ के तहत $121 मिलियन (लगभग ₹1000 करोड़) का फंड हासिल किया है. इस फंड की मदद से मुंबई समेत दुनिया के 30 बड़े शहरों की नदियों और जलाशयों से प्लास्टिक कचरे को समुद्र में गिरने से पहले ही रोकने का काम तेजी से शुरू हो गया है.
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि दुनिया की करीब 30 लाख नदियों में से सिर्फ 1,000 नदियां ही समुद्र में पहुंचने वाले 80% प्लास्टिक कचरे के लिए जिम्मेदार हैं. इसी समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए ‘इंटरसेप्टर’ (Interceptor) सिस्टम का आविष्कार किया गया है.
क्या है ‘इंटरसेप्टर’ तकनीक और यह कैसे काम करती है?
आसान भाषा में कहें तो इंटरसेप्टर पानी पर तैरने वाली एक हाई-टेक सौर ऊर्जा (Solar Powered) से चलने वाली मशीन है, जो एक तरह से ‘नदियों का वैक्यूम क्लीनर’ है. यह पूरी तरह से स्वचालित (Autonmous) होती है, यानी इसे चलाने के लिए किसी इंसान को चौबीसों घंटे वहां रहने की जरूरत नहीं होती.
कचरा खींचने की प्रक्रिया: नदी में तैरते हुए प्लास्टिक बैरियर लगाए जाते हैं, जो पानी के बहाव के साथ आ रहे प्लास्टिक कचरे को इस मशीन के मुंह की तरफ मोड़ देते हैं.
कन्वेयर बेल्ट का जादू: इंटरसेप्टर के अंदर एक कन्वेयर बेल्ट लगी होती है, जो कचरे को पानी से अलग करके ऊपर उठाती है और मशीन के अंदर बने बड़े-बड़े डस्टबिन (शटल) में डाल देती है.
स्मार्ट अलर्ट: जब यह मशीन कचरे से पूरी तरह भर जाती है, तो इसमें लगे कंप्यूटर और सेंसर तुरंत स्थानीय सफाई टीम को इंटरनेट के जरिए अलर्ट भेज देते हैं. इसके बाद टीम आकर कचरे को निकालती है और उसे रीसाइक्लिंग के लिए भेज दिया जाता है. यह मशीन एक दिन में 50,000 किलोग्राम से लेकर 1 लाख किलोग्राम तक कचरा साफ कर सकती है.

भारत में मुंबई को छूते समुद्र और खाड़ियों की बदलेगी सूरत
इस वैश्विक मुहिम का एक सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई है. ‘द ओशन क्लीनअप’ ने भारत में ‘भरत क्लीन रिवर्स फाउंडेशन’ और महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) के साथ मिलकर मुंबई के जलमार्गों की पूरी मैपिंग पूरी कर ली है. मुंबई की मीठी नदी और विभिन्न खाड़ियों (Creeks) में इन इंटरसेप्टर मशीनों को तैनात करने की प्रशासनिक तैयारी अंतिम चरण में है. इसका उद्देश्य मानसून के दौरान और आम दिनों में मुंबई के नालों और नदियों से बहकर अरब सागर में मिलने वाले टनों प्लास्टिक को रोकना है. इससे न सिर्फ समुद्र साफ होगा, बल्कि मछलियों के प्राकृतिक आवास बचेंगे और तटीय पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा.

विश्व स्तर पर मिली सफलताएं और 2026 के नए प्रोजेक्ट्स
यह मुहिम कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर बड़े बदलाव ला रही है. जनवरी 2026 तक के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस संस्था ने दुनिया भर के समुद्रों और महासागरों से 5 करोड़ किलोग्राम (50,000 मीट्रिक टन) से अधिक कचरा निकाला है.
क्षेत्र/नदी ⊂⊃ मुहिम का असर
ग्वाटेमाला (Rio Las Vegas) भारी बारिश के दौरान आए 14 लाख किलो कचरे को चंद घंटों में रोका.
मनीला, फिलीपींस (Meycauayan River) जून 2026 से नया इंटरसेप्टर चालू होने जा रहा है, जो सालाना 540 टन प्लास्टिक रोकेगा.
ग्रेट पैसिफिक गारबेज पैच समुद्र के बीच तैरते प्लास्टिक के सबसे बड़े द्वीप को ‘सिस्टम 03’ तकनीक से साफ किया जा रहा है.
मिशन 2040 – साल 2040 तक दुनिया के समुद्रों से 90% तैरते हुए प्लास्टिक को पूरी तरह साफ करना.
इस तकनीक के जरिए न सिर्फ इंडोनेशिया के जकार्ता, मलेशिया के कुआलालंपुर और डोमिनिकन रिपब्लिक जैसे देशों की नदियां साफ हो रही हैं, बल्कि यह इंसानी सभ्यता को यह भी सिखा रही है कि आधुनिक विज्ञान का इस्तेमाल प्रकृति को उसका पुराना रूप लौटाने के लिए कैसे किया जा सकता है. साफ पानी और प्लास्टिक मुक्त नदियां अब केवल एक सपना नहीं, बल्कि हकीकत बनती जा रही हैं.
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