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शिक्षित परिवारों में दहेज मृत्यु और दहेज की बढ़ती मांग: कारण, जड़ें और समाधान

Dowry Deaths and the Rising Demand for Dowry in Educated Families: शिक्षित परिवारों में दहेज की बढ़ती मांग यह साबित करती है कि डिग्री और नौकरी अकेले सामाजिक कुरीतियों को नहीं मिटा सकतीं। जब तक शिक्षा के साथ आत्मसम्मान, कानून का डर और सामाजिक बहिष्कार नहीं जुड़ेगा, तब तक ट्विशा शर्मा, दीपिका नागर, वैष्णवी हगवाने जैसी लड़कियाँ मरती रहेंगी।

लेखिका- डॉ शालिनी अली
(सामाजिक कार्यकर्ता, नई दिल्ली)

भारत में दहेज प्रथा को 1961 से अवैध घोषित किया जा चुका है। दहेज निषेध अधिनियम, भारतीय न्याय संहिता की धारा 80 और घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 जैसे कानून मौजूद हैं। फिर भी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार 2024 में 5737 दहेज मृत्यु दर्ज हुईं, यानी रोजाना 15-16 महिलाएँ दहेज से जुड़ी हिंसा, उत्पीड़न या आत्महत्या के कारण मरती हैं। सबसे चिंताजनक बदलाव यह है कि यह समस्या अब केवल ग्रामीण या अशिक्षित तबके तक सीमित नहीं रही। भोपाल, नोएडा, दिल्ली, बेंगलुरु जैसे शहरों में डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, एमबीए और लेक्चर परिवारों में भी दहेज की मांग और मौतें बढ़ रही हैं। शिक्षा ने दहेज को खत्म करने के बजाय उसे अधिक परिष्कृत और महंगा बना दिया है।

वर्तमान परिदृश्य

पिछले एक साल के कुछ मामले इस बदलाव को साफ दिखाते हैं:

ट्विशा शर्मा मामला, भोपाल, मई 2026: 33 वर्षीय पूर्व मॉडल और अभिनेत्री ट्विशा शर्मा की भोपाल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। उनके पति एक वकील हैं और सास रिटायर्ड जज हैं। परिवार ने दहेज उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाया। सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया और संस्थागत पक्षपात व प्रक्रियागत खामियों पर सवाल उठाए। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में लिगेचर मार्क्स पाए गए, लेकिन पुलिस ने शुरुआती दौर में इसे अवसाद और नशे का मामला बताकर दिशा भटकाने की कोशिश की।

दीपिका नागर मामला, ग्रेटर नोएडा, 18 मई 2026: 25 वर्षीय दीपिका की शादी के 17 महीने बाद छत से गिरकर मौत हो गई। परिवार ने दहेज के लिए बार-बार प्रताड़ना का आरोप लगाया।

वीना कुमारी मामला, पश्चिम दिल्ली, मई 2026: 25 वर्षीय वीना ने 9:55 बजे भाई को फोन करके कहा “मैं प्रताड़ित की जा रही हूँ” और कुछ मिनट बाद छत से गिरकर मर गई। पति और देवर को गिरफ्तार किया गया। परिवार ने बताया कि शादी में बाइक, टीवी, फर्नीचर देने के बाद भी रॉयल एनफील्ड बुलेट की मांग जारी रही।

वैष्णवी हगवाने मामला, पुणे, मई 2025: एनसीपी नेता की बहू वैष्णवी की संदिग्ध मौत हुई। परिवार ने दहेज उत्पीड़न और शारीरिक-मानसिक यातना का आरोप लगाया। एनसीडब्ल्यू ने पुलिस से तीन दिन में कार्रवाई रिपोर्ट माँगी।

पुष्पवती मामला, बेंगलुरु, 2025: 25 वर्षीय कॉमर्स लेक्चर पुष्पवती ने डैम में कूदकर आत्महत्या कर ली। मरने से पहले वीडियो में उसने पति और ससुराल वालों पर दहेज उत्पीड़न और मानसिक हिंसा का आरोप लगाया।

इन सभी मामलों में एक बात समान है: महिलाएँ पढ़ी-लिखी थीं, नौकरी करती थीं, शहरी माहौल में रहती थीं। फिर भी दहेज की मांग और हिंसा से नहीं बच सकीं।

शिक्षित परिवारों में दहेज की मांग क्यों बढ़ रही है?

दहेज का बाजारीकरण: शिक्षा अब दहेज रोकने का साधन नहीं रही, बल्कि उसकी कीमत बढ़ाने का जरिया बन गई है। आईआईटी, आईआईएम, विदेश में सेटल लड़कों की “मार्केट वैल्यू” तय होती है। एक 2023 के अध्ययन के अनुसार “हायर क्वालिटी ग्रूम्स” अधिक दहेज माँगते हैं। दूल्हे के परिवार को लगता है कि उन्होंने शिक्षा पर निवेश किया है, तो उसे वसूलना चाहिए।

स्टेटस सिंबल बनती शादी: दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर में शादी अब सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन बन गई है। डेस्टिनेशन वेडिंग, ब्रांडेड गिफ्ट्स, महंगी गाड़ियाँ देना सामान्य हो गया है। जो परिवार नहीं देता, उसे कमतर समझा जाता है।

लड़की की कमाई को संसाधन मानना: जब लड़की खुद कमाती है, तो ससुराल वाले उसे घर का लोन चुकाने, खर्च उठाने का साधन मान लेते हैं। उसकी कमाई पर नियंत्रण के लिए मानसिक दबाव बनाया जाता है।

कानून का कमजोर क्रियान्वयन: दहेज निषेध अधिनियम 1961 में अधिकतम 6 महीने की सजा और 5000 रुपये जुर्माना है। मुकदमे सालों चलते हैं, सबूत नष्ट हो जाते हैं, गवाह पलट जाते हैं। ट्विशा शर्मा केस में पोस्टमार्टम रिपोर्ट में लिगेचर मार्क्स होने के बावजूद पुलिस ने पहले इसे अवसाद का मामला बताया।

सामाजिक और पारिवारिक दबाव: “लोग क्या कहेंगे”, “शादी टूट जाएगी तो बदनामी होगी” जैसी सोच महिलाओं को चुप रहने पर मजबूर करती है। दीपिका नागर को माता-पिता ने घर लाकर फिर ससुराल भेज दिया क्योंकि “शुरुआती दौर में एडजस्टमेंट होता है”।

शिक्षित लड़कियाँ हिंसा से बाहर क्यों नहीं निकल पातीं?

यह सवाल सबसे कठिन है। एक लड़की जो एमए, एलएलबी, एमबीए है, वह भी शिकायत क्यों नहीं करती? इसके कई कारण हैं:

भावनात्मक फँसाव और सामाजिक छवि: शिक्षित लड़कियों को बचपन से सिखाया जाता है कि “घर बसाना” उनकी जिम्मेदारी है। शादी टूटने को व्यक्तिगत असफलता माना जाता है। ट्विशा शर्मा ने अपनी माँ को मैसेज किया था “मुझे बहुत घुटन हो रही है, माँ”, लेकिन पुलिस को तब बताया गया जब वह मर चुकी थीं।

आर्थिक स्वतंत्रता का अभाव: नौकरी करने वाली लड़कियों की सैलरी भी अक्सर ससुराल के नियंत्रण में रहती है। उनके पास अलग बैंक अकाउंट, प्रॉपर्टी या बचत नहीं होती। बिना आर्थिक बैकअप के घर छोड़ना मुश्किल लगता है।

परिवार का रवैया: माता-पिता खुद लड़की को “थोड़ा एडजस्ट कर लो” कहते हैं। वैष्णवी हगवाने की माँ ने भी कहा था कि नए रिश्ते में एडजस्टमेंट होता है। इससे लड़की को लगता है कि शिकायत करने पर कोई साथ नहीं देगा।

पंचायत और अनौपचारिक समाधान: कई मामलों में परिवार पंचायत में जाता है। नोएडा के निक्की मामले में पंचायत ने पति को माफी मँगवाई, लेकिन हिंसा फिर शुरू हो गई। पंचायत अक्सर महिला को ही समझौता करने के लिए कहती है।

मानसिक स्वास्थ्य का स्टिग्मा: जब लड़की अवसाद या एंग्जायटी की बात करती है, तो ससुराल और मायका दोनों इसे “नाटक” या “कमजोरी” कहते हैं। ट्विशा के मामले में भी पहले इसे मानसिक बीमारी बताकर केस कमजोर किया गया।

एफ. कानूनी प्रक्रिया का डर: पुलिस स्टेशन, कोर्ट, गवाहों के सामने बार-बार घटना बताना महिलाओं के लिए ट्रॉमा बन जाता है। धीमे न्याय और समाज में बदनामी का डर उन्हें चुप रखता है।

कारणों की गहराई में

आर्थिक कारण: दहेज अब केवल सोना-नकद नहीं रहा। कार, फ्लैट, विदेश यात्रा, बिजनेस में निवेश की मांग होती है। लड़के के परिवार का मानना है कि उन्होंने शिक्षा पर खर्च किया है, तो उसकी भरपाई होनी चाहिए।

सांस्कृतिक कारण: “बेटा कुल का चिराग है, बेटी पराया धन है” जैसी सोच अभी भी मजबूत है। लड़की को संसाधन उपभोग करने वाला माना जाता है, जबकि लड़का कमाने वाला।

मनोवैज्ञानिक कारण: हिंसक पति अक्सर माफी माँगकर फिर वही व्यवहार दोहराते हैं। इससे पीड़ित महिला “होप ट्रैप” में फँस जाती है कि अगली बार सुधर जाएगा।

संस्थागत कारण: पुलिस अक्सर “घर का मामला है” कहकर टाल देती है। सबूत नष्ट हो जाते हैं। पंचनामा और पोस्टमार्टम में देरी होती है।

समाधान की दिशा

कानूनी स्तर पर:
दहेज मृत्यु के मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट अनिवार्य हो। 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को फटकार लगाते हुए कहा कि दहेज मृत्यु में जमानत देने से गलत संदेश जाता है।
इलेक्ट्रॉनिक सबूत, कॉल डिटेल, व्हाट्सएप चैट को तुरंत संरक्षित करने का प्रोटोकॉल बने। ट्विशा केस में परिवार ने हाईकोर्ट से CDR और डेटा सुरक्षित रखने की माँग की।
झूठे केस रोकने के साथ असली पीड़ितों को त्वरित राहत मिले।

सामाजिक स्तर पर:
दहेज लेने-देने वाले परिवारों का सामाजिक बहिष्कार हो। कुछ समुदायों ने “दहेज मुक्त विवाह” अभियान चलाकर उदाहरण पेश किया है।
शिक्षित युवकों को सार्वजनिक रूप से कहना होगा कि वे बिना दहेज के शादी करेंगे। यह सबसे बड़ा संदेश होगा।
मीडिया और सोशल मीडिया को भव्य शादियों को ग्लैमराइज करने के बजाय दहेज के दुष्परिणाम दिखाने चाहिए।

आर्थिक स्तर पर:
माता-पिता बेटी के नाम पर प्रॉपर्टी, एफडी, बीमा करें ताकि उसे आर्थिक सुरक्षा मिले।
महिलाओं के लिए शेल्टर होम, लीगल एड, काउंसलिंग सेंटर हर जिले में सक्रिय हों।

शैक्षिक स्तर पर:
स्कूल-कॉलेज में लैंगिक समानता, रिश्तों में सम्मान, सहमति और घरेलू हिंसा के कानूनी पहलुओं को पाठ्यक्रम में शामिल करें।
मानसिक स्वास्थ्य पर बात करना सामान्य बनाया जाए ताकि लड़कियाँ डिप्रेशन को छिपाएँ नहीं।

व्यक्तिगत स्तर पर:
लड़कियों को बचपन से सिखाया जाए कि आत्मसम्मान समझौते से बड़ा है।
अगर हिंसा हो रही है तो तुरंत महिला हेल्पलाइन 181, टेली-मानस 14416 या स्थानीय पुलिस से संपर्क करें।

निष्कर्ष

शिक्षित परिवारों में दहेज की बढ़ती मांग यह साबित करती है कि डिग्री और नौकरी अकेले सामाजिक कुरीतियों को नहीं मिटा सकतीं। जब तक शिक्षा के साथ आत्मसम्मान, कानून का डर और सामाजिक बहिष्कार नहीं जुड़ेगा, तब तक ट्विशा शर्मा, दीपिका नागर, वैष्णवी हगवाने जैसी लड़कियाँ मरती रहेंगी।

दहेज मृत्यु केवल एक महिला की मौत नहीं है। यह पूरे समाज की असफलता है। समाधान कानून, पुलिस और अदालत में कम, घर, स्कूल और समाज में ज्यादा है। जब माता-पिता बेटी को बेटे के बराबर मानेंगे, जब लड़के दहेज को अपमान समझेंगे, और जब समाज दहेज लेने वाले को हीन दृष्टि से देखेगा, तभी यह प्रथा खत्म होगी।

तब तक 181 हेल्पलाइन, 14416 टेली-मानस जैसी सेवाएँ पीड़ितों के लिए जीवन रेखा हैं।
चुप्पी तोड़ना ही पहला कदम है।

-भारत एक्सप्रेस



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