मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र
मेरठ/भोपाल, 28 मई 2026: उर्दू अदब के आसमान का एक चमकता सितारा हमेशा के लिए डूब गया. मशहूर उर्दू शायर और गजलकार डॉ. बशीर बद्र का गुरुवार दोपहर करीब 12 बजे भोपाल में निधन हो गया. 91 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली. डॉ. बद्र लंबे समय से डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे. अंतिम समय में उनकी याददाश्त काफी हद तक जा चुकी थी और वे अपनों को भी पहचान नहीं पा रहे थे. पिछले कुछ समय से उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी. उनके जाने से मुशायरा मंचों और साहित्य प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई है, लेकिन इस दुख की सबसे गहरी गूंज मेरठ में सुनाई दे रही है.
मेरठ कॉलेज में रहे प्रोफेसर, यहीं से मिली पहचान
बशीर बद्र का मेरठ से बेहद गहरा और भावनात्मक रिश्ता रहा. साल 1970 के दशक में वे मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष थे. उस दौर में मेरठ की साहित्यिक महफिलों, मुशायरों और मुशायरा मंचों की वे सबसे बड़ी पहचान माने जाते थे. उन्होंने मेरठ में रहकर ही उर्दू गजल को एक नया लहजा और नई दिशा दी. उनकी गजलें आम लोगों की जिंदगी, मोहब्बत, दर्द और इंसानी रिश्तों की सादगी को बेहद आसान शब्दों में बयां करती थीं.
1987 के दंगों ने अंदर तक तोड़ दिया, आग के हवाले हुआ आशियाना
जिस मेरठ शहर से डॉ. बशीर बद्र को बेइंतहा मोहब्बत थी, उसी शहर के एक जख्म ने उनकी पूरी जिंदगी बदलकर रख दी. साल 1987 में मेरठ में हुए भीषण सांप्रदायिक दंगों के दौरान उपद्रवियों ने शास्त्रीनगर में स्थित उनके घर को आग के हवाले कर दिया था. इस आग में न सिर्फ उनका आशियाना जला, बल्कि उनकी जिंदगी भर की कमाई, अनमोल किताबें और कई ऐसी गजलों की डायरियां भी जलकर राख हो गईं, जो कभी छप ही नहीं पाई थीं. इस हिंसा ने उनका दिल पूरी तरह तोड़ दिया. इसी गम में उन्होंने मेरठ को हमेशा के लिए छोड़ दिया और भोपाल जाकर बस गए.
राख के ढेर पर खड़े होकर लिखा था यह ऐतिहासिक शेर
मेरठ दंगों के उस भयानक दर्द और अपने जलते हुए घर को देखकर डॉ. बशीर बद्र की कलम से जो दर्द निकला, वो आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है. उन्होंने अपने इस सबसे चर्चित शेर में उस तबाही को बयां किया था:
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में.”
नए मिजाज के शहरों को बशीर बद्र ने ही दी थी नसीहत
बशीर बद्र ने पुरानी और कठिन रिवायती शायरी से अलग राह चुनी. उन्होंने कठिन अल्फाजों की जगह इतनी आसान भाषा का इस्तेमाल किया कि हर आम इंसान को उनकी शायरी अपनी कहानी लगने लगी. समाज के बदलते रंग और इंसानी दूरियों पर उनका यह शेर आज भी लोगों की जुबान पर है:
“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो.”
उनके निधन के साथ उर्दू अदब का एक बड़ा और बेहद खूबसूरत अध्याय खत्म हो गया है. खासतौर पर मेरठ के लिए यह खबर एक बेहद भावुक करने वाली क्षति है, क्योंकि इस शहर की यादें, प्यार और दंश दोनों ही उनकी शायरी में हमेशा-हमेशा के लिए जिंदा रहेंगे.
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