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सुप्रीम कोर्ट ने देश में इंटरनेट पर उपलब्ध पोर्नोग्राफी (अश्लील सामग्री) पर पूरी तरह से रोक लगाने और इसके लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग वाली जनहित याचिका का अंतिम रूप से निपटारा कर दिया है. शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता को इस संवेदनशील विषय पर राहत के लिए संबंधित प्रशासनिक प्राधिकारी (सक्षम ऑथोरिटी/केंद्र सरकार) के समक्ष अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है. सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष खंडपीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया. यह जनहित याचिका प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता बीएल जैन की ओर से दायर की गई थी.
मामले की पिछली सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील वरुण ठाकुर ने कोर्ट में दलील दी थी कि वर्तमान समय में युवाओं के लिए डिजिटल साधनों की आसान पहुँच हो गई है. विशेष रूप से कोविड-19 (Covid-19) महामारी के बाद ऑनलाइन कक्षाओं के चलन से 14 से 18 साल के किशोर व बच्चे महज एक सिंगल क्लिक में पोर्नोग्राफी जैसी घातक सामग्री के सीधे संपर्क में आ रहे हैं, जो उनके मानसिक विकास के लिए बेहद नुकसानदेह है.
आईटी एक्ट की धारा 69A का था जिक्र
सुप्रीम कोर्ट में दायर इस याचिका में मुख्य रूप से केंद्र सरकार को यह सख्त निर्देश देने की मांग की गई थी कि वह अश्लील और हिंसक सामग्री तक आम जनता व बच्चों की पहुँच को पूरी तरह रोकने के लिए एक व्यापक ‘राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना’ (नेशनल पॉलिसी) तैयार करे. साथ ही, सार्वजनिक स्थानों पर ऐसी आपत्तिजनक सामग्री को देखने या प्रसारित करने पर कानूनी प्रतिबंध लगाया जाए.
याचिका में भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया गया था कि देश में वर्तमान में लाखों अश्लील वेबसाइट्स धड़ल्ले से चल रही हैं. इंटरनेट पर 20 करोड़ से ज्यादा पोर्न वीडियो या क्लिपिंग्स खुलेआम उपलब्ध हैं, जिनमें बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार को दर्शाने वाले चाइल्ड पोर्नोग्राफी के बेहद संवेदनशील वीडियो भी शामिल हैं.
याचिकाकर्ता ने इंटरनेट के डरावने आंकड़ों को रखते हुए कहा कि साल 2005 के बाद से दुनिया भर में हर सेकेंड औसतन 5 हजार से ज्यादा पोर्न साइट्स लगातार देखी जा रही हैं और हर साल 2 करोड़ से ज्यादा नए पोर्न वीडियो या क्लिपिंग्स इंटरनेट पर जारी किए जा रहे हैं. याचिका में सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 69A का भी विशेष रूप से जिक्र किया गया था, जो केंद्र सरकार को देश की संप्रभुता, अखंडता या सार्वजनिक व्यवस्था के मद्देनजर किसी भी कंप्यूटर संसाधन (इंटरनेट) के जरिए किसी भी जानकारी तक जनता की पहुँच को ब्लॉक (प्रतिबंधित) करने का असीमित कानूनी अधिकार देती है. याचिकाकर्ता का तर्क था कि इस प्रावधान के तहत मिली शक्तियों के बावजूद केंद्र सरकार ने इन साइटों पर कोई ठोस प्रतिबंध नहीं लगाया है.
2024 का ऐतिहासिक फैसला
इस याचिका के निपटारे के साथ ही देश में चाइल्ड पोर्नोग्राफी को लेकर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2024 में दिए गए उस ऐतिहासिक और मील के पत्थर साबित हुए फैसले की चर्चा भी दोबारा तेज हो गई है. साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के एक विवादित फैसले को पूरी तरह से रद्द कर दिया था. मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि मोबाइल फोन में किसी पोर्न वीडियो को केवल निजी तौर पर डाउनलोड करके रखने से कोई व्यक्ति पॉक्सो (POCSO) एक्ट और आईटी कानून की धारा 67B के तहत सीधे तौर पर अपराधी नहीं बन जाता.
हाई कोर्ट के इस ढुलमुल रुख को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में व्यवस्था दी थी कि किसी भी मोबाइल फोन या इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में चाइल्ड पोर्नोग्राफी (बाल अश्लीलता) से जुड़ी सामग्री को डाउनलोड करके रखना और उसे देखना, दोनों ही कानूनन गंभीर और दंडनीय अपराध हैं.
अदालत ने तकनीकी पेंच को स्पष्ट करते हुए कहा था कि अगर किसी व्यक्ति से अनजाने या गलती से कोई ऐसी फाइल डाउनलोड हो जाती है और वह उसे तुरंत डिलीट (नष्ट) कर देता है, तो वह अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा. लेकिन, यदि वह पूरी जानकारी होने के बावजूद उसे अपने मोबाइल फोन से डिलीट नहीं करता है और डिवाइस में सहेज कर रखता है, तो वह कानूनन पूरी तरह दोषी माना जाएगा.
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बाल यौन शोषण सामग्री कहने का दिया था सुझाव
सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चों के गरिमापूर्ण जीवन को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार को यह महत्वपूर्ण सुझाव भी दिया था कि वह कानूनी संहिताओं से ‘चाइल्ड पोर्नोग्राफी’ (Child Pornography) शब्द को हमेशा के लिए हटाने और उसके स्थान पर ‘बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री’ (Child Sexual Abuse and Exploitation Material) शब्द को प्रतिस्थापित करने के लिए एक अध्यादेश (ऑर्डिनेंस) जारी करे. इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने देश की सर्वोच्च न्यायपालिका से लेकर सभी निचली और उच्च अदालतों को भी यह कड़ा निर्देश जारी किया था कि वे अपने किसी भी कानूनी आदेश, फैसले या चार्जशीट में ‘चाइल्ड पोर्नोग्राफी’ शब्द का उपयोग बिल्कुल न करें.
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