खुद को दुनिया का सबसे पुराना और महान लोकतंत्र बताने वाले अमेरिका से एक ऐसी खबर (Trump Dollar Signature) आई है जिसने पूरी दुनिया के अर्थशास्त्रियों और राजनीतिक विश्लेषकों के कान खड़े कर दिए हैं. दरअसल अमेरिकी इतिहास में पिछले 165 सालों से चले आ रहे एक बेहद निष्पक्ष और लोकतांत्रिक नियम की धज्जियां उड़ाते हुए अब सरकारी करेंसी यानी डॉलर पर सीधे देश के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दस्तखत छापे जा रहे हैं.
इतिहास में यह पहली बार हो रहा है जब किसी सिटिंग राष्ट्रपति ने अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए डॉलर जैसी वैश्विक मुद्रा पर अपना ऑटोग्राफ दे मारा है. इस फैसले के सामने आते ही अमेरिका समेत पूरी दुनिया में ट्रंप की तीखी आलोचना हो रही है और लोग इसे किसी लोकतंत्र का नहीं, बल्कि किसी तानाशाह साम्राज्य का शाही फरमान बता रहे हैं.
गृहयुद्ध के जमाने का ऐतिहासिक नियम टूटा
अमेरिकी इतिहास के पन्नों को पलटें तो साल 1861 यानी गृहयुद्ध के समय से ही यह सख्त नियम लागू था कि डॉलर पर कभी भी देश के राष्ट्रपति के हस्ताक्षर नहीं होंगे. इसका सीधा और साफ कारण यह था कि अमेरिकी डॉलर किसी एक नेता या पार्टी का नहीं बल्कि पूरे देश की साख का प्रतीक है. इसलिए इस पर केवल ट्रेजरी विभाग के गैर-राजनीतिक अधिकारियों के ही हस्ताक्षर होते थे ताकि नोट की निष्पक्षता बनी रहे.
लेकिन अपनी आत्म-मुग्धता के लिए मशहूर डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में आते ही इस 165 साल पुरानी लोकतांत्रिक मर्यादा को मलबे में तब्दील कर दिया. अब अमेरिकी प्रिंटिंग प्रेस से करोड़ों की संख्या में उड़ने वाली डॉलर की शीटों पर सिर्फ और सिर्फ ट्रंप के दस्तखत चमक रहे हैं, जो यह दिखाता है कि वे सरकारी खजाने को अपनी निजी जागीर समझ बैठे हैं.
क्या अब अमेरिका बनेगा नया नॉर्थ कोरिया?(Trump Dollar Signature)
ट्रंप के इस फैसले पर अमेरिका के भीतर ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखा बवाल खड़ा हो गया है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह ठीक वैसी ही सनक है जैसी तीसरी दुनिया के तानाशाहों या राजशाही वाले देशों में देखी जाती है, जहां राजा अपनी ताकत दिखाने के लिए सिक्कों और नोटों पर अपनी तस्वीर और नाम छपवाता था.
विपक्ष ने आरोप लगाया है कि डोनाल्ड ट्रंप खुद को अमेरिका का राष्ट्रपति नहीं बल्कि एक सुप्रीम लीडर साबित करने पर तुले हुए हैं. जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाली सरकारी मशीनों का इस्तेमाल जिस तरह से ट्रंप अपनी पर्सनल पीआर और मार्केटिंग के लिए कर रहे हैं, उसने अमेरिकी साख को पूरी दुनिया के सामने बेहद कमजोर कर दिया है.
खुद को भगवान साबित करने की अजीबोगरीब जिद
डोनाल्ड ट्रंप की यह आत्म-मुग्धता (Trump Dollar Signature) सिर्फ डॉलर पर हस्ताक्षर करने तक ही सीमित नहीं है. इससे पहले वे बकायदा अपनी खुद की तस्वीर और रेजोल्यूट डेस्क वाले 24 कैरेट सोने के सिक्के भी सरकारी तौर पर जारी करवा चुके हैं. हद तो तब हो गई जब उनकी सरकार ने अमेरिकी संसद में ढाई सौ डॉलर का एक बिल्कुल नया नोट छापने का प्रस्ताव रख दिया जिस पर सीधे ट्रंप का चेहरा छपा होगा.
अमेरिकी कानून के अनुसार किसी भी जीवित व्यक्ति का चेहरा नोट पर नहीं छप सकता, लेकिन ट्रंप के सिपहसालार इस कानून को भी बदलने की जुगत में भिड़ गए हैं. आलोचकों का कहना है कि देश में महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक मंदी के खतरे मंडरा रहे हैं, लेकिन राष्ट्रपति का पूरा ध्यान सिर्फ इस बात पर है कि वे कैसे भी करके खुद को अमेरिकी इतिहास में अमर कर लें.
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दुनिया के सामने पूरी तरह पिट गई अमेरिकी साख
कड़ी सुरक्षा के बीच अमेरिकी प्रिंटिंग प्रेस में एक-एक पैलेट में 12.8 मिलियन डॉलर के नए नोट छपकर पैक किए जा रहे हैं. ट्रंप के दस्तखत वाले ये विवादित नोट जल्द ही पूरी दुनिया के बाजारों में तैरने लगेंगे, लेकिन इसके साथ ही अमेरिकी साख पर लगा यह दाग कभी नहीं धुलेगा. दुनिया भर के निवेशकों में यह संदेश जा रहा है कि अमेरिकी डॉलर अब एक स्थिर और संस्थागत मुद्रा नहीं रह गई है, बल्कि यह देश के राष्ट्रपति की सनक और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का खिलौना बन चुकी है.
अब देखना यह होगा कि इस शाही और तानाशाही फैसले के खिलाफ अमेरिका की जनता और वहां का सुप्रीम कोर्ट क्या रुख अपनाता है, या फिर ट्रंप की इस मनमर्जी के आगे पूरा अमेरिकी सिस्टम घुटने टेक देगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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