Nelson Mandela on America: 18 जुलाई को हर साल संयुक्त राष्ट्र ‘नेल्सन मंडेला अंतरराष्ट्रीय दिवस’ मनाता है. मंडेला सिर्फ रंगभेद के खिलाफ लड़ने वाले योद्धा नहीं थे, बल्कि वे अमेरिकी विदेश नीति और उसकी साम्राज्यवादी व वर्चस्ववादी सोच के सबसे मुखर आलोचक भी थे. उन्होंने कहा था, ‘अगर दुनिया में कोई ऐसा देश है जिसने सबसे ज्यादा अत्याचार किए हैं, तो वह अमेरिका है. उन्हें बाकी दुनिया की कोई परवाह नहीं है.’
साल 2003 में जब ताकत के नशे में चूर अमेरिका, इराक पर हमले की तैयारी कर रहा था, तब मंडेला ने अंतरराष्ट्रीय मंच से अमेरिका के अहंकार को पूरी तरह बेनकाब किया था. आज साल 2026 में भी जब वैश्विक हालात तनावपूर्ण हैं, तो अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियों को लेकर मंडेला के कहे शब्द बिल्कुल सटीक बैठते हैं.
कौन थे Nelson Mandela?
नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति और रंगभेद विरोधी आंदोलन के सबसे बड़े वैश्विक नायक थे. उन्होंने पूरा जीवन दक्षिण अफ्रीका में अश्वेतों को उनका हक दिलाने में चला गया. इतना ही नहीं, अपने इसी आंदोलन के कारण उन्होंने अपने जीवन के 27 साल सलाखों के पीछे गुजारी.
उन्हें 1993 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया और भारत ने भी उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा. मंडेला का मानना था कि दुनिया को किसी एक देश की लाठी से नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियमों और सामूहिक कूटनीति से चलना चाहिए.
झुकने वाले नेता नहीं
जब दक्षिण अफ्रीका आजाद हुआ, तो अमेरिका ने मंडेला पर दबाव बनाया कि वे क्यूबा के फिदेल कास्त्रो और लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी से अपने रिश्ते तोड़ लें. इसपर मंडेला ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के सामने दोटूक कहा था, ‘कोई भी देश यह तय नहीं कर सकता कि हमारा दोस्त कौन होगा. जब हम रंगभेद के खिलाफ अपने जीवन की सबसे अंधेरी लड़ाई लड़ रहे थे, तब क्यूबा और लीबिया हमारे साथ खड़े थे. उस वक्त अमेरिका कहां था? अमेरिका तो हमारी पार्टी को आतंकवादी संगठन बता रहा था.’
अमेरिका के पाखंड को किया बेनकाब
मंडेला ने अमेरिका की साम्राज्यवादी सनक और उसके दोहरे चरित्र पर चोट करते हुए याद दिलाया था कि अमेरिका दुनिया का इकलौता ऐसा देश है, जिसने इंसानों पर परमाणु बम गिराए हैं. लेकिन आज वही देश पूरी दुनिया को परमाणु हथियारों के नाम पर डराता है और खुद को दुनिया का ठेकेदार समझता है. उन्होंने आरोप लगाया था कि इराक पर हमला केवल एक मुखौटा था, अमेरिका का असली निशाना तो वहां के तेल कुओं पर कब्जा करना था.
मंडेला ने सवाल उठाया था कि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र (UN) का सम्मान सिर्फ तब तक करता है, जब तक उसके हित पूरे होते हैं, वरना वह अंतरराष्ट्रीय कानूनों को ठेंगा दिखा देता है. आज भी दुनिया अमेरिका की इसी साम्राज्यवादी सोच का खामियाजा भुगत रही है.
ये भी पढ़ें: 10 करोड़ लोग और धधकती गर्मी; अमेरिका में क्यों तेजी से बढ़ रहा है तापमान?
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

