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‘जो खुद पर शासन करे, वही विश्व पर राज करे’, जानिए आचार्य विनोबा भावे की प्रेरणादायक कहानी

आचार्य विनोबा भावे की जयंती पर जानिए उस महान समाज सुधारक की कहानी, जिन्होंने महात्मा गांधी के विचारों को आगे बढ़ाते हुए भूदान आंदोलन के जरिए भूमिहीनों को जमीन दिलाने की मुहिम छेड़ी.

आज 11 सितंबर को देश आचार्य विनोबा भावे की जयंती पर उन्हें याद कर रहा है. वे सिर्फ महात्मा गांधी के करीबी अनुयायी नहीं थे, बल्कि ऐसे समाज सुधारक थे जिन्होंने बिना हिंसा और बिना किसी राजनीतिक ताकत के समाज में बदलाव लाने की कोशिश की. सादगी, सेवा, अहिंसा और समानता उनके जीवन के सबसे अहम आधार रहे.

विनोबा भावे का जन्म 11 सितंबर 1895 को महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र के गागोदे गांव में हुआ था. उनका मूल नाम विनायक नरहरि भावे था. बचपन से ही उनका झुकाव आध्यात्मिकता की ओर था. उनकी मां रुक्मिणी देवी का उनके व्यक्तित्व पर गहरा असर पड़ा. आगे चलकर यही आध्यात्मिक सोच उनके पूरे जीवन की दिशा तय करने वाली बनी.

गांधी के संपर्क में आए और बदल गई जीवन की दिशा

1916 में विनोबा ने औपचारिक पढ़ाई का रास्ता छोड़कर महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम का रुख किया. गांधी जी के विचारों ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने अपना जीवन सत्य, अहिंसा और समाज सेवा को समर्पित कर दिया. उन्होंने बेहद सादा जीवन जिया और जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन किया.

गांधी जी का विनोबा पर इतना भरोसा था कि 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू होने पर उन्होंने विनोबा भावे को पहला सत्याग्रही चुना. ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलनों में हिस्सा लेने के कारण उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा.

जेल का समय भी उन्होंने बेकार नहीं जाने दिया. उन्होंने वहां भगवद्गीता का गंभीर अध्ययन किया और बाद में उसका मराठी में ‘गीताई’ नाम से अनुवाद किया. वे कई भाषाओं के जानकार थे और हिंदी, मराठी, संस्कृत, गुजराती, उर्दू और कन्नड़ जैसी भाषाओं पर उनकी अच्छी पकड़ थी.

पोचमपल्ली से शुरू हुआ भूदान आंदोलन

आजादी के बाद विनोबा भावे ने गांधी के सर्वोदय यानी ‘सबके कल्याण’ के विचार को आगे बढ़ाया. उनके जीवन की सबसे बड़ी पहचान बना भूदान आंदोलन.

18 अप्रैल 1951 को तेलंगाना के पोचमपल्ली गांव में कुछ भूमिहीन हरिजन परिवारों ने अपने लिए जमीन की मांग रखी. विनोबा ने वहां मौजूद जमीन मालिकों से गरीब परिवारों की मदद करने की अपील की. उनकी अपील का असर हुआ और रामचंद्र रेड्डी नाम के एक जमींदार ने 100 एकड़ जमीन दान करने की घोषणा कर दी.

यहीं से भूदान यज्ञ ने एक बड़े सामाजिक आंदोलन का रूप लेना शुरू किया.

विनोबा भावे ने लोगों तक पहुंचने के लिए आसान रास्ता चुना. वे खुद गांव-गांव पैदल चलने लगे. करीब 13 वर्षों तक चली इस पदयात्रा में उन्होंने लगभग 65 हजार किलोमीटर की दूरी तय की. वे जमीन के मालिकों से अपील करते थे कि वे अपनी जमीन का कुछ हिस्सा भूमिहीन लोगों के लिए स्वेच्छा से दे दें.

उनका संदेश था कि वे खुद को परिवार का हिस्सा बताते हुए कहते थे कि जैसे बेटे को हिस्सा मिलता है, वैसे ही समाज के गरीब और भूमिहीन लोगों को भी उनका अधिकार मिलना चाहिए.

सिर्फ जमीन नहीं, सोच बदलने की कोशिश

भूदान आंदोलन का मकसद केवल जमीन इकट्ठा करके बांटना नहीं था. विनोबा चाहते थे कि समाज में अमीर और गरीब के बीच की दूरी कम हो और लोग अपनी संपत्ति को केवल निजी अधिकार के तौर पर न देखें, बल्कि समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी समझें.

इसी सोच से आगे चलकर ग्रामदान और संपत्तिदान जैसे विचार सामने आए. यह आंदोलन गांधी के ट्रस्टीशिप और हृदय परिवर्तन के सिद्धांत से काफी प्रभावित था. विनोबा का मानना था कि समाज में स्थायी बदलाव कानून या दबाव से नहीं, बल्कि लोगों की सोच बदलने से आएगा.

उन्होंने चंबल के बीहड़ों में रहने वाले कई डाकुओं को आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसके अलावा सर्वोदय समाज, खादी, ग्रामीण आत्मनिर्भरता और ग्राम स्वराज जैसे मुद्दों पर भी उन्होंने लगातार काम किया.

सम्मान भी मिला, लेकिन सादगी नहीं छोड़ी

विनोबा भावे के सामाजिक कार्यों को देश ही नहीं, दुनिया में भी पहचान मिली. 1958 में उन्हें अंतरराष्ट्रीय रेमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया. वे यह सम्मान पाने वाले पहले भारतीय बने. बाद में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया.

उनका जीवन इस बात का उदाहरण रहा कि बड़े बदलाव के लिए हमेशा सत्ता या धन की जरूरत नहीं होती. दृढ़ विचार, लगातार मेहनत और लोगों से सीधा संवाद भी समाज को प्रभावित कर सकता है.

उनका एक प्रसिद्ध विचार है “जो स्वयं पर शासन करता है, वही पूरे विश्व पर शासन करता है.” इस कथन में उनके जीवन का सार भी दिखाई देता है. आत्मअनुशासन और आत्मसंयम को वे व्यक्ति और समाज, दोनों की मजबूती का आधार मानते थे.

15 नवंबर 1982 को महाराष्ट्र के पवनार, वर्धा में विनोबा भावे ने अंतिम सांस ली. लेकिन उनके विचार आज भी चर्चा में हैं. भूमि सुधार, ग्रामीण विकास, सामाजिक समानता और कमजोर वर्गों के अधिकारों की बात होती है, तो भूदान आंदोलन और विनोबा भावे का नाम सामने आता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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