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सूखी लकड़ी को काटने से पहले पिता करते थे नमन, राष्ट्रपति मुर्मू ने सुनाया बचपन का किस्सा

Droupadi Murmu: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने बचपन की स्मृति साझा करते हुए बताया कि उनके पिता सूखी लकड़ी को चूल्हे में इस्तेमाल करने से पहले हाथ जोड़कर नमन करते थे. उन्होंने कहा कि यह परंपरा प्रकृति के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और आदिवासी समाज के सह-अस्तित्व की भावना को दर्शाती है.

Droupadi Murmu Childhood Memory Nature Respect

Droupadi Murmu Childhood Memory Nature Respect

 Droupadi Murmu Childhood Memory Nature Respect: नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने बचपन की एक भावुक और प्रेरक स्मृति साझा की. उन्होंने बताया कि उनके पिता खाना पकाने के लिए पास के जंगल से सूखी लकड़ियां लाते थे. इन लकड़ियों को चूल्हे में जलाने लायक आकार देने के लिए काटने से पहले वे हाथ जोड़कर उन्हें नमन करते थे. राष्ट्रपति ने कहा कि बचपन में उन्होंने कई बार अपने पिता को ऐसा करते देखा था. राष्ट्रपति मुर्मू ने इस प्रसंग के जरिए आदिवासी समाज के प्रकृति के साथ गहरे और संवेदनशील संबंध को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय पेड़-पौधों, जंगलों और प्रकृति को केवल संसाधन के रूप में नहीं देखता, बल्कि उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना रखता है.

‘यह सूखी लकड़ी भी हमारी सेवा कर रही है’

राष्ट्रपति ने बताया कि बचपन में उन्हें अपने पिता की यह परंपरा समझ में नहीं आती थी. एक दिन उन्होंने पिता से पूछा कि जब लकड़ी पहले ही सूख चुकी है और उसे जलाने के लिए इस्तेमाल किया जाना है, तो फिर उसे नमन क्यों किया जाता है. इस पर उनके पिता ने उन्हें प्रकृति के प्रति सम्मान का अर्थ समझाया. उन्होंने कहा कि भले ही लकड़ी अब सूख चुकी है, लेकिन वह आज भी परिवार के काम आ रही है. जब पेड़ जीवित था, तब उसने लोगों को हवा और ऑक्सीजन दी. अब उम्र पूरी होने के बाद भी उसकी लकड़ी किसी न किसी रूप में मानव जीवन के काम आ रही है. राष्ट्रपति के मुताबिक, पिता की यह बात उनके मन में गहराई से बैठ गई. उनके लिए यह केवल लकड़ी को नमन करने की परंपरा नहीं थी, बल्कि प्रकृति से मिले योगदान के प्रति आभार व्यक्त करने का तरीका था.

प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की सीख

राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि दुनियाभर के कई समुदायों के पास सदियों पुराना पारंपरिक ज्ञान मौजूद है. प्रकृति के प्रति सम्मान, कठिन परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता और बदलती जलवायु के अनुरूप खुद को ढालने की क्षमता उनकी जीवनशैली का हिस्सा रही है. उन्होंने कहा कि उन्होंने स्वयं देखा है कि आदिवासी समाज किस तरह सादगी और मजबूती के साथ प्रकृति के साथ मिल-जुलकर रहता है. जंगल, पेड़-पौधे और प्राकृतिक संसाधन आदिवासी जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहे हैं. राष्ट्रपति ने अपने अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि आदिवासी समाज में बचपन से ही बच्चों को प्रकृति के महत्व और उसके प्रति सम्मान की सीख दी जाती है. जंगलों के प्रति श्रद्धा और उनकी पूजा आज भी कई आदिवासी समुदायों की परंपराओं में दिखाई देती है.

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‘आज भी हम जंगलों की पूजा करते हैं’

राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि आदिवासी समाज को शुरुआत से ही यह सिखाया गया है कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर रहना है. उन्होंने कहा कि आज भी आदिवासी समुदायों में जंगलों की पूजा की जाती है. उन्होंने हाल ही में प्रधानमंत्री के साथ अपने गांव जाने का जिक्र करते हुए भी आदिवासी जीवन और प्रकृति के रिश्ते की बात की. राष्ट्रपति के मुताबिक, उनके समुदाय की परंपराओं में प्रकृति के प्रति सम्मान केवल किसी विशेष अवसर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा है.

परंपरा में छिपा पर्यावरण संरक्षण का संदेश

राष्ट्रपति द्वारा सुनाया गया यह बचपन का प्रसंग आदिवासी परंपराओं में मौजूद पर्यावरणीय चेतना की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है. एक सूखी लकड़ी को काटने से पहले उसका सम्मान करना इस सोच को दर्शाता है कि प्रकृति से प्राप्त हर चीज के पीछे उसका अपना योगदान रहा है. राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने अनुभव के माध्यम से यह संदेश रखा कि आधुनिक जीवन में भी प्रकृति के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और संतुलन की भावना महत्वपूर्ण है. उनके बचपन की यह छोटी-सी घटना आदिवासी समाज की उस जीवन-दृष्टि को सामने लाती है, जिसमें जंगल और प्रकृति केवल जीवन-यापन के साधन नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं.

भारत एक्सप्रेस



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