बिहार विधानसभा की 243 सीटों ने लंबे समय से राष्ट्रीय दलों को अकेले चुनाव लड़ने वाले दल के बजाय गठबंधन प्रबंधकों (Coalition Managers) की तरह सोचने पर मजबूर किया है. बीजेपी के लिए बिहार की राजनीति में अब केंद्रीय सवाल यह नहीं रह गया है कि क्या वह राज्य की सियासत को प्रभावित कर सकती है, बल्कि सवाल यह है कि क्या वह अंततः किसी मजबूत क्षेत्रीय सहयोगी पर निर्भर रहे बिना अपने दम पर बिहार का नेतृत्व कर सकती है.
क्या बीजेपी किसी क्षेत्रीय ‘बड़े भाई’ के बिना बिहार पर राज कर सकती है?
बीजेपी अपनी शर्तों पर बिहार का नेतृत्व करने की आकांक्षा रख सकती है, लेकिन वह राज्य के गहरे क्षेत्रीय राजनीतिक मिजाज को नजरअंदाज नहीं कर सकती. एनडीए (NDA) का 2025 का सीट-बंटवारा फॉर्मूला—जिसमें बीजेपी और जेडीयू (JD-U) दोनों ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा—गठबंधन के भीतर पुराने ‘बड़े भाई’ वाले मॉडल से निकलकर बराबरी की साझेदारी की ओर बढ़ने का साफ संकेत था. यह बदलाव बेहद अहम था, क्योंकि बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं और बहुमत का जादुई आंकड़ा 122 है.
गठबंधन के भीतर बदला शक्ति संतुलन
वर्षों तक, नीतीश कुमार की जेडीयू ने एनडीए को एक मजबूत क्षेत्रीय चेहरा दिया, खासकर उन जाति समूहों और मतदाताओं के बीच जो उन्हें सुशासन और सोशल इंजीनियरिंग के चश्मे से देखते थे. वहीं बीजेपी ने राष्ट्रीय नेतृत्व, संगठन, हिंदुत्व का आकर्षण और मजबूत चुनावी तंत्र दिया. यह फॉर्मूला इसलिए सफल रहा क्योंकि दोनों पक्ष एक-दूसरे की कमजोरियों की भरपाई कर रहे थे.
लेकिन सीट-बंटवारे में बराबरी यह दर्शाती है कि बीजेपी अब खुद को बिहार में केवल ‘छोटा भाई’ या जूनियर पार्टनर के रूप में नहीं देखती. उस समय की रिपोर्टों में 101-101 सीटों के इस समान समझौते को सत्ताधारी गठबंधन के भीतर एक स्पष्ट राजनीतिक पुनर्संतुलन के रूप में देखा गया था.
बीजेपी की चुनावी रणनीति हो रही है और अधिक स्थानीय
बिहार में बीजेपी की एक सफल चुनावी रणनीति केवल राष्ट्रीय मुद्दों के भरोसे नहीं चल सकती. पार्टी को बूथ स्तर पर अपनी ताकत बनानी होगी, राज्य स्तरीय नेताओं को तैयार करना होगा, जातिगत समीकरणों को साधना होगा और रोजगार, पलायन, जनकल्याणकारी योजनाओं की जमीनी पहुंच, कानून-व्यवस्था व ग्रामीण आकांक्षाओं जैसे स्थानीय मुद्दों पर सीधे बात करनी होगी.
पार्टी की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल हैं:
- शहरी और सवर्ण वर्ग के अपने पारंपरिक प्रभाव से बाहर निकलकर ईबीसी (अत्यंत पिछड़ा वर्ग), दलित, ओबीसी और महिला मतदाताओं के बीच अपनी पैठ को गहरा करना.
- बिहार में एक विश्वसनीय और मजबूत स्थानीय नेतृत्व तैयार करना, ताकि पार्टी को केवल ‘दिल्ली से चलने वाले अभियानों’ पर निर्भर न माना जाए.
- अपने सहयोगियों को छोटा दिखाए बिना उनके साथ तालमेल बिठाना, खासकर तब जब जेडीयू, लोजपा (रामविलास), हम (HAM) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) जैसे दल अपने साथ एक तय वोट बैंक लाते हैं.
- सरकारी योजनाओं को जन-भरोसे में बदलना, क्योंकि मतदाता अक्सर उन दलों को तरजीह देते हैं जो योजनाओं के लाभ को धरातल पर पारदर्शी तरीके से पहुंचाते हैं.
बिहार के क्षेत्रीय दल आज भी क्यों हैं इतने महत्वपूर्ण?
बिहार के राजनीतिक दल केवल चुनाव लड़ने वाले साधन भर नहीं हैं; वे अपने साथ जातिगत इतिहास, क्षेत्रीय पहचान और गहरी भावनात्मक निष्ठा लेकर चलते हैं. आरजेडी (RJD) का संबंध आज भी यादव-मुस्लिम सामाजिक आधार से है, जेडीयू की पहचान नीतीश कुमार की शासन विरासत से है, और छोटे सहयोगी दल अपने-अपने विशिष्ट समुदायों के बीच गहरा असर रखते हैं. यही वजह है कि बीजेपी के लिए विस्तार की आकांक्षा रखते हुए भी गठबंधन के महत्व को समझना मजबूरी है.
2025 के चुनावी नतीजों ने एनडीए को कुल 202 सीटें दिलाकर काफी मजबूत किया, जिसमें पीआरएस (PRS) के आंकड़ों के अनुसार बीजेपी सबसे बड़े घटक के रूप में उभरी और जेडीयू उसके ठीक पीछे रही. हालांकि, इसका सबक यह नहीं है कि गठबंधनों का दौर खत्म हो गया है; बल्कि इसका मतलब यह है कि गठबंधन की मेज पर बीजेपी की मोलभाव करने की ताकत (Bargaining Power) काफी बढ़ चुकी है.
सहयोगी से मुख्य ताकत बनने का सफर
बिहार में बीजेपी का यह सफर किसी अचानक होने वाले टकराव या अलगाव का नहीं है, बल्कि अपनी निर्भरता को धीरे-धीरे खत्म करके अपना दबदबा कायम करने का है. पार्टी को आज सहयोगियों की जरूरत है, लेकिन वह ऐसा ढांचा चाहती है जहां सहयोगी उसकी ताकत को तय न करें, बल्कि उसकी ताकत को केवल सहारा दें.
बिहार की राजनीति पर नजर रखने वाले पाठकों के लिए असली कहानी यही है: बिहार अब क्षेत्रीय दलों के नेतृत्व वाले गठबंधनों से उस दौर की ओर बढ़ सकता है जहां बीजेपी खुद केंद्रीय धुरी बनने की कोशिश कर रही है. वह इसमें कितनी सफल होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपने स्थानीय नेतृत्व को कैसे खड़ा करती है, जातिगत संतुलन कैसे साधती है और अपने राष्ट्रीय एजेंडे को खांटी ‘बिहारी पहचान’ के साथ कैसे जोड़ पाती है.
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