Krishna Janmabhoomi: मथुरा के बहुचर्चित श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट अब 6 नवंबर को अगली सुनवाई करेगा. जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई बार-बार टलने पर नाराजगी जताते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया. सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत को अवगत कराया गया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में संबंधित पक्षकार फिलहाल किसी आपसी समझौते पर नहीं पहुंच सके हैं.
मुस्लिम पक्ष ने हाईकोर्ट के फैसलों को दी है चुनौती
मुस्लिम पक्ष (मस्जिद कमेटी) ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, जिसमें एक पक्ष को भगवान श्रीकृष्ण के सभी भक्तों का प्रतिनिधि माना गया था. इसके साथ ही, इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा इस विवाद से जुड़े सभी 18 मुकदमों की एक साथ सुनवाई किए जाने के आदेश के खिलाफ भी याचिका दायर की गई है. पिछली सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने संकेत दिया था कि वह मामले को पुनर्विचार के लिए वापस हाईकोर्ट भेजने के पक्ष में है, क्योंकि हाईकोर्ट ने यह कदम उठाने से पहले सभी मूल वादियों को अपना पक्ष रखने के लिए विधिवत नोटिस जारी नहीं किया था.
‘एएसआई संरक्षित स्मारक है विवादित स्थल’: हिंदू पक्ष का दावा
मामले में हिंदू पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने अदालत के समक्ष पुरजोर दलील दी कि विवादित ढांचा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित एक प्राचीन स्मारक है. अधिवक्ता हरिशंकर जैन की ओर से दाखिल अर्जी में बताया गया कि प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम 1904 के तहत 27 दिसंबर 1920 को आधिकारिक गजट अधिसूचना प्रकाशित कर इस संपत्ति को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था. हिंदू पक्ष का तर्क है कि जब ढांचा एएसआई के संरक्षण में है, तो वहां मस्जिद का अस्तित्व नहीं हो सकता और इस पर पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 (Places of Worship Act) के नियम प्रभावी नहीं होते हैं.
एएसआई और केंद्र को पक्षकार बनाने का मामला
हिंदू पक्ष की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका देकर मांग की गई थी कि विवादित स्थल के प्रबंधन और देखरेख का जिम्मा एएसआई के पास होने के चलते भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और केंद्र सरकार को भी मुकदमे में पक्षकार बनाया जाए. हाईकोर्ट ने इस मांग को स्वीकार कर लिया था, जिसके खिलाफ मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है. सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि चूंकि मस्जिद कमेटी अपने बचाव में प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट का हवाला दे रही है, इसलिए वादी पक्ष कानूनन एएसआई और केंद्र को पक्षकार बनाने की मांग कर सकता है और हाईकोर्ट का यह आदेश प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होता है. अदालत इस मामले के सभी कानूनी पहलुओं की पड़ताल 6 नवंबर को करेगी.
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