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‘खतरे में है आम नागरिक का वोट देने का अधिकार’, पूर्व जज रोहिंटन नरीमन ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठाए गंभीर सवाल

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने पर जताई चिंता. कहा- खतरे में है आम नागरिक का वोट देने का अधिकार.

Former SC Judge Rohinton Nariman Expresses Concern Over Election Commission Functioning Voting Rights
Edited by Vaibhav Gupta

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने देश की चुनावी प्रक्रिया और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. ‘द कॉन्स्टिट्यूशन एंड द कॉमन मैन’ विषय पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यानी आम नागरिक का वोट देने का संवैधानिक अधिकार आज अभूतपूर्व खतरे का सामना कर रहा है.

’90 लाख मतदाता लिस्ट से बाहर

जस्टिस नरीमन ने मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर लोगों के नाम हटाए जाने पर गहरा दुख व्यक्त किया. उन्होंने कहा कि लगभग 90 लाख लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए, जिससे वे अपने मताधिकार से वंचित हो गए. इनमें से 22 लाख लोगों ने चुनाव आयोग के इस फैसले को ट्रिब्यूनल में चुनौती दी.

जस्टिस नरीमन ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि जिन एक लाख अपीलों पर निर्णय आया, उनमें से 93 प्रतिशत मामलों में फैसला आम नागरिकों के पक्ष में रहा. उन्होंने सवाल उठाया कि जब इतने बड़े पैमाने पर गलत तरीके से नाम हटाए गए, तो आखिर किस आधार पर नागरिकों को चुनाव प्रक्रिया से बेदखल किया गया?

मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से हटाने पर उठाए सवाल

चुनावी प्रणाली में सुधार के मुद्दे पर बोलते हुए जस्टिस नरीमन ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी निशाना साधा. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘अनूप बरनवाल’ फैसले की याद दिलाई, जिसमें चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की समिति बनाने का आदेश दिया गया था.

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने बाद में संसद से कानून बदलकर चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश को हटा दिया और उनकी जगह एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर लिया, जिससे चयन प्रक्रिया पर एक बार फिर कार्यपालिका का वर्चस्व स्थापित हो गया.

सुप्रीम कोर्ट से तत्काल हस्तक्षेप की उम्मीद

पूर्व जज ने चुनाव आयुक्तों के बीच आपसी मतभेदों और आपत्तियों से जुड़ी मीडिया रिपोर्टों का जिक्र करते हुए कहा कि एक संवैधानिक संस्था की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है. उन्होंने उम्मीद जताई कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और साख को बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट इस मामले में जल्द से जल्द हस्तक्षेप करेगा, क्योंकि अगर वोट का अधिकार ही सुरक्षित नहीं रहा, तो लोकतांत्रिक ढांचे की बुनियाद ही हिल जाएगी.

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-भारत एक्सप्रेस



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