Sarvpitr amavasya ki katha: हिंदू धर्म में सर्वपितृ अमावस्या को पितरों की विदाई का सबसे पवित्र दिन माना जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस अमावस्या तिथि की शुरुआत कैसे हुई? और इसका नाम ‘अमावस्या’ ही क्यों पड़ा? पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन के शुरू होने के पीछे पितरों की मानसी कन्या अच्छोदा की एक अनजानी भूल और उनकी ज़िद की बेहद रोचक कथा है. आइए जानते हैं मतस्य पुराण में वर्णित इस अनोखी पौराणिक कहानी को.
कौन थीं अच्छोदा? (Acchoda kaun thi)
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पितृलोक में ‘अग्निष्वात्त’ नाम के पितर रहते हैं. अच्छोदा इन्हीं पितरों की मानसी कन्या (मन से उत्पन्न पुत्री) थीं. अच्छोदा बहुत रूपवान, तपस्वी और गुणी थीं, लेकिन उनके भीतर एक कमी थी कि उन्हें शारीरिक रूप से माता-पिता का सुख नहीं मिला था, क्योंकि वे केवल मन की कल्पना से उत्पन्न हुई थीं. इसी कारण उनके मन में हमेशा एक सच्चे परिवार और माता-पिता के प्रेम की तीव्र इच्छा रहती थी.
जब पितर पर ही दिल हार बैठीं अच्छोदा(Sarvpitr amavasya ki katha)
एक बार पितृलोक में सभी देव-पितर एक सभा के लिए एकत्रित हुए. उस सभा में ‘अमावसु’ नाम के एक अत्यंत तेजस्वी और शांत स्वभाव के पितर भी मौजूद थे. सभा के दौरान अच्छोदा की दृष्टि अमावसु पर पड़ी. अमावसु के तेज और शांत व्यक्तित्व को देखकर अच्छोदा अपने मन पर नियंत्रण खो बैठीं. पिता के समान पूजनीय पितर को देखकर उनके मन में वैवाहिक और शारीरिक आकर्षण जाग उठा. वे अमावसु से विवाह करने की ज़िद पर अड़ गईं और उनके सामने प्रणय निवेदन (विवाह का प्रस्ताव) रख दिया.
पितर अमावसु का धैर्य और अच्छोदा को मिला श्राप
अच्छोदा की इस अनुचित मांग से पूरी सभा हैरान रह गई. लेकिन अमावसु बिल्कुल विचलित नहीं हुए. उन्होंने अत्यंत धैर्य और संयम के साथ अच्छोदा के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और कहा, “हे पुत्री! मैं तुम्हारे पिता के समान हूँ. तुम्हारा यह विचार लोक-मर्यादा के विरुद्ध है. अपनी कामुक भावना और मर्यादा भूलने के कारण अच्छोदा का दिव्य तेज नष्ट होने लगा. वे स्वर्ग और पितृलोक से नीचे गिरने लगीं. जब उन्हें अपनी इस भयानक भूल का अहसास हुआ, तो उन्होंने रोते हुए सभी पितरों से क्षमा मांगी.
कैसे हुआ सर्वपितृ अमावस्या का जन्म?(Sarvpitr amavasya Story)
अच्छोदा के सच्चे पश्चाताप को देखकर पितर अमावसु और अन्य पितरों को उन पर दया आ गई. पितरों ने कहा, “चूंकि तुमने अपनी भूल स्वीकार कर ली है, इसलिए तुम्हें इस पाप से मुक्ति मिलेगी. तुम्हें द्वापर युग में महर्षि पराशर की पत्नी और राजा शांतनु की रानी ‘सत्यवती’ (मत्स्यगंधा) के रूप में पृथ्वी पर जन्म लेना होगा. वहीं तुम्हें महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास जैसे महान पुत्र की माता बनने का गौरव प्राप्त होगा.
इसके साथ ही, पितरों ने अमावसु के अपूर्व धैर्य और संयम से प्रसन्न होकर उन्हें एक विशेष वरदान दिया. पितरों ने कहा कि चूंकि अमावसु ने अमावस्या के दिन अपने मन को डिगने नहीं दिया और वासना पर विजय पाई, इसलिए यह तिथि हमेशा के लिए ‘अमावस्या’ के नाम से जानी जाएगी. इस तिथि के स्वामी स्वयं अमावसु होंगे.
साथ ही पितरों ने यह भी घोषित (Sarvpitr amavasya ki katha) किया कि जो भी मनुष्य इस तिथि (अमावस्या) पर अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण या पिंडदान करेगा, उसे पूरे वर्ष के श्राद्धों के बराबर पुण्य फल मिलेगा.
-भारत एक्सप्रेस
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