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विशेष; पाक-अफगान युद्ध: अधूरा इतिहास

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव की जड़ें सिर्फ मौजूदा राजनीति में नहीं, बल्कि डुरंड रेखा, पश्तूनिस्तान आंदोलन और ब्रिटिश काल की नीतियों में भी छिपी हैं. जानिए कैसे इतिहास, राष्ट्रवाद और क्षेत्रीय राजनीति ने दोनों देशों के रिश्तों को दशकों तक प्रभावित किया.

हम कभी नहीं भूल सकते कि पश्तून राष्ट्र का एक बड़ा हिस्सा आज पाकिस्तान में रहता है. अफगानिस्तान को समझना हो तो उसके महान कवि खुशाल खान खट्टक की इन पंक्तियों को याद करना जरूरी है:

बेटा, मेरे पास तेरे लिए एक ही बात है,
किसी से मत डरना और किसी के आगे मत भागना.
तलवार निकाल और उसे मार डाल,
जो कहे कि पश्तून और अफगान एक नहीं हैं.
अरब इसे जानते हैं और रोमन भी,
अफगान पश्तून हैं, पश्तून अफगान हैं.

अफगानिस्तान एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में 18वीं शताब्दी के मध्य में उभरा. उस समय नादिर शाह की फारसी सेना में अब्दाली टुकड़ी का नेतृत्व अहमद खान कर रहे थे, जो बाद में अहमद शाह दुर्रानी के नाम से प्रसिद्ध हुए. उन्होंने फारस और कमजोर पड़ते मुगल साम्राज्य के बीच एक बफर क्षेत्र की स्थापना की, जिसने आगे चलकर आधुनिक अफगानिस्तान का रूप लिया.

इतिहास को चाहे जितना बदलने या नकारने की कोशिश की जाए, वह बार-बार स्वयं को दोहराता है. आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा सबक यह है कि राष्ट्रीयता आज भी लोगों को जोड़ने वाली सबसे मजबूत ताकत है. सिर्फ धर्म अलग-अलग समुदायों को लंबे समय तक एकजुट नहीं रख सकता. पाकिस्तान इसका उदाहरण है, जिसने विभाजन का दर्द झेला. इसी तरह साम्यवाद जैसा बड़ा सिद्धांत भी टिक नहीं पाया और सोवियत संघ तथा यूगोस्लाविया इतिहास का हिस्सा बन गए. देशों को जोड़े रखने का काम साझा आकांक्षाएं, समान ऐतिहासिक समझ और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताएं करती हैं.

साझा इतिहास और मौजूदा परिस्थितियां मिलकर एक पुराने सवाल को फिर से सामने ला सकती हैं और वह है पश्तून राष्ट्र के पुनर्मिलन की मांग.

एक बफर राज्य का निर्माण

1886 में रूस ने हेरात के निकट पंजदेह ओएसिस पर कब्जा कर लिया. यह वह समय था जिसे “ग्रेट गेम” कहा जाता है, जब मध्य एशिया में प्रभाव बढ़ाने के लिए ब्रिटिश और रूसी साम्राज्य आमने-सामने थे. रूस की इस कार्रवाई के बाद ब्रिटेन ने साफ संदेश दिया कि हेरात की दिशा में किसी भी तरह का विस्तार उसके भारतीय हितों के खिलाफ माना जाएगा.

दूसरे एंग्लो-अफगान युद्ध के बाद मई 1879 में गंदमक संधि हुई. इस समझौते के तहत ब्रिटेन ने अफगानिस्तान के विदेश मामलों पर प्रभाव स्थापित कर लिया. इसी संधि के कारण ब्रिटेन को सिंधु नदी के पश्चिम में स्थित पारंपरिक पश्तून क्षेत्रों, जिनमें पेशावर और खैबर दर्रा भी शामिल थे, पर नियंत्रण मिल गया.

पंजदेह विवाद के बाद ब्रिटेन और रूस ने मिलकर एक सीमा आयोग बनाया. हैरानी की बात यह थी कि इस प्रक्रिया में अफगानिस्तान की कोई भागीदारी नहीं थी. इसी आयोग ने तुर्किस्तान यानी आज के किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के साथ अफगानिस्तान की सीमाएं तय कीं. इस तरह आधुनिक अफगानिस्तान दो साम्राज्यों के बीच एक बफर राज्य के रूप में विकसित हुआ.

1893 में ब्रिटिश राजनयिक सर मॉर्टिमर डुरंड ने अफगानिस्तान और ब्रिटिश भारत के बीच पूर्वी सीमा निर्धारित करने का काम शुरू किया. बाद में 1901 में ब्रिटिशों ने उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (वर्तमान खैबर पख्तूनख्वा) का गठन किया. इससे पश्तून इलाकों को अफगानिस्तान और पंजाब दोनों से अलग कर दिया गया.

ब्रिटिश प्रशासन ने एनडब्ल्यूएफपी को दो हिस्सों में बांटा. एक वे जिले जो सीधे ब्रिटिश नियंत्रण में थे और दूसरे पांच स्वायत्त जनजातीय एजेंसियां, जिनका संचालन स्थानीय सरदार करते थे. हालांकि इन पर ब्रिटिश अधिकारियों की नजर बनी रहती थी.

शुरुआत से ही डुरंड रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं बल्कि एक नियंत्रण रेखा के रूप में देखा गया. 1930 की साइमन कमीशन रिपोर्ट में भी कहा गया था कि ब्रिटिश भारत वहीं समाप्त होता है जहां उसका प्रशासनिक नियंत्रण समाप्त होता है.

इसके बावजूद 1947 में ब्रिटिशों ने जनजातीय लोया जिर्गा की सहमति के बाद इन पांच स्वायत्त एजेंसियों को पाकिस्तान को सौंप दिया. अफगानिस्तान ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इन क्षेत्रों को भी वही विकल्प मिलने चाहिए थे जो 562 भारतीय रियासतों को दिए गए थे. पहला भारत में शामिल होना, दूसरा पाकिस्तान में जाना और तीसरा स्वतंत्र रहना.

शुरुआत में पाकिस्तान ने इन क्षेत्रों की स्वशासन व्यवस्था को बरकरार रखा. वहां कोई स्थायी प्रशासक, पुलिस या सेना नहीं भेजी गई. बाद में तालिबान और अल-कायदा के खिलाफ अभियानों के दौरान यह स्थिति बदली और पाकिस्तानी सेना इन इलाकों में दाखिल हुई.

पश्तूनिस्तान का मुद्दा

अमीर अब्दुर रहमान (1880-1901) के शासनकाल में अफगानिस्तान में केंद्रीकृत सत्ता मजबूत हुई. रूस और ब्रिटेन के बीच बने बफर राज्य को एकजुट रखने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. उन्हें अक्सर जर्मनी के बिस्मार्क की तरह देखा जाता है, जिन्होंने कठोर तरीकों से एक नए राष्ट्र का निर्माण किया.

लगभग बीस वर्षों तक चले उनके शासन में अफगानिस्तान एक केंद्रीकृत राज्य के रूप में स्थापित हुआ. उन्हें ब्रिटेन से आर्थिक सहायता भी मिलती थी. यह वार्षिक सहायता 1.2 मिलियन रुपये से बढ़कर 1893 तक 1.8 मिलियन रुपये हो गई थी.

मई 1919 में उनके पोते अमानुल्लाह खान ने वह संघर्ष शुरू किया जिसे अफगान आज भी अपनी स्वतंत्रता का युद्ध कहते हैं. इतिहास में इसे तीसरे एंग्लो-अफगान युद्ध के रूप में जाना जाता है. अफगान सैनिक डुरंड रेखा पार कर एनडब्ल्यूएफपी में पहुंच गए और दोनों ओर के कई जनजातीय समूह उनके समर्थन में खड़े हो गए.

लेकिन इस युद्ध में अफगानों को एक नई सैन्य ताकत का सामना करना पड़ा. ब्रिटिश लड़ाकू विमानों ने काबुल और जलालाबाद पर बमबारी की. इसके बाद अफगान उत्साह धीरे-धीरे कम हो गया. अंततः रावलपिंडी संधि हुई, जिसके जरिए अफगानिस्तान को अपने विदेश मामलों पर नियंत्रण मिला, लेकिन एनडब्ल्यूएफपी और जनजातीय क्षेत्र ब्रिटिश भारत का हिस्सा बने रहे.

अमानुल्लाह के तेजी से आधुनिकीकरण के प्रयासों के कारण देश में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो गई. इस दौरान ब्रिटिशों ने जनरल नादिर खान का समर्थन किया. नादिर खान ने 1929 में काबुल पर कब्जा कर खुद को शासक घोषित कर दिया.

हालांकि उनका शासन लंबा नहीं चला. 1933 में अमानिया स्कूल के एक पूर्व छात्र ने उनकी हत्या कर दी. यह स्कूल उस समय अफगान राष्ट्रवादी आंदोलन का केंद्र माना जाता था. इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य डुरंड रेखा के पार स्थित क्षेत्रों को फिर से अफगान राष्ट्रवाद से जोड़ना था.

इसके बाद जहीर शाह सत्ता में आए और 1973 तक शासन करते रहे. बाद में उनके चचेरे भाई और पूर्व प्रधानमंत्री सरदार दाऊद खान ने उन्हें अपदस्थ कर सत्ता संभाली.

दाऊद खान कट्टर राष्ट्रवादी थे. वे अफगानिस्तान के आधुनिकीकरण के साथ-साथ खोए हुए क्षेत्रों को वापस पाने के भी समर्थक थे. उनका दौर अमेरिकी रणनीतिकार जॉन फोस्टर डलेस के समय से मेल खाता था, जब शीत युद्ध अपने चरम पर था.

1954 में पाकिस्तान सिएटो और सेंटो जैसे सैन्य गठबंधनों में शामिल हो गया. इसका मकसद भारत के खिलाफ राजनीतिक और सैन्य समर्थन हासिल करना था. दूसरी तरफ दाऊद खान ने भी अमेरिका से सैन्य और आर्थिक सहायता मांगी, लेकिन अपेक्षित सहयोग नहीं मिला. इसके बाद उन्होंने सोवियत संघ की ओर रुख किया.

धीरे-धीरे पश्तून क्षेत्रों का विवाद शीत युद्ध की राजनीति से जुड़ गया. सितंबर 1960 में अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हो गए. एक साल बाद अफगान सरकार ने पाकिस्तान से राजनयिक संबंध तोड़ लिए और सीमा बंद कर दी.

एक विभाजित राष्ट्र

सीमा बंद होने का असर अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा और 1963 में दाऊद खान को पद छोड़ना पड़ा. हालांकि 10 साल बाद उन्होंने फिर सत्ता में वापसी की और पश्तूनिस्तान के सवाल को फिर जीवित कर दिया.

1971 में पाकिस्तान के टूटने और बांग्लादेश बनने के बाद बलूचिस्तान में भी अलगाववादी गतिविधियां बढ़ीं. कंधार में बलूच लड़ाकों के लिए एक प्रशिक्षण शिविर स्थापित किया गया. इसके जवाब में जुल्फिकार अली भुट्टो ने काबुल और जलालाबाद में बम धमाकों का सहारा लिया.

1977 में दाऊद खान और सोवियत नेता लियोनिद ब्रेझनेव के बीच मतभेद बढ़ गए. अगले ही साल कम्युनिस्टों ने उन्हें सत्ता से हटा दिया.

1979 में नई अफगान सरकार ने औपचारिक रूप से डुरंड रेखा को मानने से इनकार कर दिया. लेकिन तब तक शीत युद्ध की परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी थीं और एक लंबे संघर्ष का दौर शुरू हो चुका था.

पिछले 35 वर्षों से अफगानिस्तान निरंतर युद्ध, अस्थिरता और हिंसा का सामना कर रहा है. आधुनिक इतिहास में इतने लंबे समय तक चले संघर्ष के उदाहरण बहुत कम मिलते हैं.

आज अफगान लोग अपने भविष्य का रास्ता खुद तय करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन पश्तून समुदाय अब भी एक ऐसी सीमा से बंटा हुआ है, जिसे कई लोग कृत्रिम और विवादास्पद मानते हैं.

कई विश्लेषकों का मानना है कि भविष्य में पश्तून राष्ट्र के पुनर्मिलन की मांग और मजबूत हो सकती है. अफगानिस्तान की आंतरिक राजनीति और क्षेत्रीय हालात भी इस मुद्दे को लगातार जिंदा रखे हुए हैं.

यही कारण है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के संबंधों का इतिहास आज भी अधूरा माना जाता है और इस कहानी के कई अध्याय अभी लिखे जाने बाकी हैं.

खुशाल खान खट्टक का संदेश आज भी पश्तून समाज में गूंजता है:

पश्तून नाम ही सम्मान और गौरव का प्रतीक है;
उस सम्मान के बिना अफगान कहानी क्या है?
केवल तलवार में ही हमारी मुक्ति निहित है.

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-भारत एक्सप्रेस



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