Delhi Durga Puja: राजधानी दिल्ली में जब भी सबसे भव्य और पारंपरिक दुर्गा पूजा की बात होती है, तो उत्तरी दिल्ली के तिमारपुर और सिविल लाइंस का नाम सबसे ऊपर आता है. इस वर्ष यह ऐतिहासिक समिति अपने गौरवशाली इतिहास के 113वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है. ब्रिटिश काल यानी सन 1914 से चली आ रही दिल्ली की इस दूसरी सबसे पुरानी दुर्गा पूजा ने इस बार के उत्सव को बेहद अनूठे और गहरे आध्यात्मिक संदेश के साथ मनाई जा रही है.
इस साल के पंडाल की मुख्य थीम ‘जीवन चक्र’ (The Circle of Life) रखी गई है, जो सीधे इंसान के वजूद, प्रकृति और ब्रह्मांड के शाश्वत सत्यों से रूबरू कराएगी.
‘दिल्लीर बुके बांग्ला’ और जीवन चक्र की अनोखी थीम(Delhi Durga Puja)
इस साल के पूरे उत्सव की मुख्य टैगलाइन ‘दिल्लीर बुके बांग्ला’ यानि दिल्ली के दिल में बंगाल’ दी गई है, जो एक सदी से भी अधिक समय से राजधानी में बंगाली समुदाय की जड़ों और उनकी अटूट सांस्कृतिक संस्कृति को बयां करती है. समिति के अनुसार, इस बार का पंडाल कला और आध्यात्मिकता का बेजोड़ संगम होगा:
कलाकृति और संदेश: पंडाल के भीतर मनुष्य के जन्म, कर्म, प्रकृति के बदलावों और मोक्ष की यात्रा को दर्शाती जीवंत कलाकृतियां बनाई जा रही हैं.
पारंपरिक कारीगरी: बंगाल से आए विशेष शिल्पकार इको-फ्रेंडली और प्राकृतिक सामग्रियों से इस भव्य पंडाल को तैयार कर रहे हैं.
दिव्य स्वरूप: इस बार माँ दुर्गा का स्वरूप “जीवन चक्र” की रचयिता और ब्रह्मांड की सर्वोच्च शक्ति के रूप में बेहद सौम्य और अलौकिक रखा गया है.
ब्रिटिश काल से जुड़ा है इतिहास
तिमारपुर की यह दुर्गा पूजा महज़ एक उत्सव नहीं, बल्कि इतिहास का एक जीता-जाता दस्तावेज है. साल 1914 में जब इसकी शुरुआत हुई थी, तब देश की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित हो रही थी. उस समय कुछ सरकारी कर्मचारियों और स्थानीय बंगाली परिवारों ने मिलकर इसकी नींव रखी थी.
बता दें इन 113 वर्षों के लंबे सफर में तिमारपुर ने बोधन, संधि पूजा, पारंपरिक शंख ध्वनि और प्रसिद्ध धुनुची नाच जैसी अपनी शुद्ध पारंपरिक बंगाली संस्कृति की थाती को आज भी पूरी शिद्दत से संभाल कर रखा है.
महाभोग, सांस्कृतिक संध्या और धुनुची नाच का धमाल
पाँच दिनों तक चलने वाले इस महा-उत्सव में अध्यात्म, कला और संस्कृति का जबरदस्त तड़का देखने को मिल रहा है:
पारंपरिक भोग: महासप्तमी, महाअष्टमी और महानवमी के पावन दिनों में यहाँ आने वाले हजारों श्रद्धालुओं के लिए विशेष पारंपरिक बंगाली ‘भोग’ का वितरण किया जाएगा.
सांस्कृतिक संध्या: मंच पर कोलकाता और दिल्ली के नामचीन कलाकार रबीन्द्र संगीत, लोक नृत्य और नाटकों की प्रस्तुतियां देंगे.
धुनुची प्रतियोगिता: महाअष्टमी की शाम होने वाला पारंपरिक ‘धुनुची नाच’ इस आयोजन का मुख्य आकर्षण होगा, जहाँ ढाक की थाप पर हर उम्र के लोग थिरकते नजर आएंगे.
-भारत एक्सप्रेस
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