भारतीय शिल्पशास्त्र, पुराण और प्रतिमालक्षण में माँ दुर्गा के स्वरूप का निगूढ़ तत्त्व और विज्ञान
भारतवर्ष की शिल्प-परंपरा और शास्त्र केवल बाहरी सौंदर्य या सौंदर्यशास्त्र की साधना नहीं हैं; यह एक गहन आध्यात्मिक साधना है. पश्चिमी कला में जहां अनुकरण और यथार्थवाद प्रधान है, वहीं भारतीय शिल्पशास्त्र का मूल लक्ष्य रूप के पीछे छिपे दिव्य तत्त्व को प्रकट करना है. मुट्ठी भर मिट्टी केवल मिट्टी नहीं रहती, जब उसमें शास्त्र के नियमों, ज्यामितीय अनुपात और मंत्रशक्ति का संयोग होता है. तब वह पूजा के योग्य जीवंत ‘विग्रह’ या ‘प्रतिमा’ में रूपांतरित हो जाती है.
पूजा के समय साधारण लोग प्रतिमा का बाहरी रूप, पंडाल की सजावट और धूमधाम देखते हैं. इसके पीछे हजारों वर्ष पुराने शास्त्रीय निर्देश, गणितीय हिसाब और मनोवैज्ञानिक रूपक छिपे हैं. इस लेख में हम प्रतिमा-निर्माण के शास्त्रीय नियम, तालमान, माँ दुर्गा के दशभुजा और अष्टादशभुजा स्वरूप के तत्त्व, अस्त्रों के प्रतीक, चालचित्र, त्रिभंग मुद्रा, परिवार-प्रतिमा, नवपत्रिका, पूजा-क्रम और क्षेत्रीय विविधता पर चर्चा करेंगे.
देवी के स्वरूप के बारे में शास्त्र की मूल घोषणा यह है:
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता. नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ (श्रीश्रीचण्डी, पंचम अध्याय)
अर्थात् जो देवी सब प्राणियों में शक्ति-रूप से स्थित हैं, उन्हें बारंबार प्रणाम.
ऐतिहासिक कालक्रम और प्रमुख शास्त्रग्रंथ
प्रतिमा-निर्माण के नियम मनमानी से नहीं बने. प्राचीन आचार्यों और स्थपतियों ने निश्चित ग्रंथों के माध्यम से इस विद्या को सुरक्षित रखा. काल-निर्धारण सर्वत्र अनुमानित है और विद्वानों में मतभेद भी हैं.
- विष्णुधर्मोत्तर पुराण (अनुमानतः चौथी–सातवीं शताब्दी): प्रतिमालक्षण और चित्रसूत्र का प्राचीन व प्रामाणिक स्रोत. इसमें मूर्ति के माप, मुद्रा और भाव के बारे में विस्तृत निर्देश हैं.
- बृहत्संहिता, वराहमिहिर (छठी शताब्दी): देव-प्रतिमाओं के लक्षण, मुकुट, अस्त्र और ऊँचाई निर्धारण के सुनिश्चित नियम यहाँ मिलते हैं.
- मानसार और मयमत (अनुमानतः सातवीं–ग्यारहवीं शताब्दी): भारतीय स्थापत्य और प्रतिमा-शिल्प के मान्य ग्रंथ. यहाँ ‘तालमान’ अत्यंत सटीक ज्यामितीय रूप पाता है.
- मत्स्यपुराण और अग्निपुराण: दोनों में देव-देवियों के प्रतिमालक्षण और प्रतिष्ठा का विधान है. मत्स्यपुराण को सामान्यतः अधिक प्राचीन माना जाता है.
- शुक्रनीति (मध्यकाल): प्रतिमा के माप और भाव को उभारने की नीति यहाँ संकलित है.
‘तालमान’: माप का ज्यामितीय विज्ञान
प्रतिमा-निर्माण का सबसे विस्मयकारी पक्ष इसकी माप-पद्धति ‘तालमान’ है. शिल्पशास्त्र में शिल्पी को अपने अंदाज़ से मूर्ति गढ़ने की अनुमति नहीं थी. प्रतिमा के अपने मुख की लंबाई ही उसके सभी अंगों का मापदंड बन जाती है.
- ताल और अंगुल: ठुड्डी से केशरेखा तक मुख की लंबाई १ ‘ताल’ है. प्रचलित गणना में १ ताल = १२ अंगुल. कुछ ग्रंथों में और सूक्ष्म विभाजन भी मिलते हैं.
- मूर्ति की श्रेणी: शास्त्र में ऊँचाई के अनुसार अनेक तालों की मूर्तियों का उल्लेख है. नवताल माप में ९ ताल (१०८ अंगुल) और दशताल माप में १० ताल (१२० अंगुल) होते हैं. देव-देवी मूर्तियों में ये दोनों माप विशेष प्रचलित हैं, और दशताल को उत्तम, राजसी व ईश्वरीय अनुपात माना जाता है.
नवताल माप का अंग-विन्यास शिल्पशास्त्र की चर्चा में बहुधा उद्धृत किया जाता है. अंगुल के हिसाब से यह इस प्रकार है:
| अंग | अंगुल | ताल |
|---|---|---|
| मुख (ठुड्डी से केशरेखा) | 12 | 1 |
| ग्रीवा (गला) | 4 | 1/3 |
| ग्रीवा से हृदय | 12 | 1 |
| हृदय से नाभि | 12 | 1 |
| नाभि से कटि/जननेंद्रिय | 12 | 1 |
| ऊरु (जंघा के ऊपर) | 24 | 2 |
| जानु (घुटना) | 4 | 1/3 |
| जंघा (पिंडली) | 24 | 2 |
| पदतल/पांव का पंजा | 4 | 1/3 |
| कुल | 108 | 9 |
दशताल माप में कुल १२० अंगुल होते हैं, यानी नवताल से ठीक १ ताल (१२ अंगुल) अधिक. यह अतिरिक्त माप किस अंग में जुड़ेगा, यह ग्रंथ-भेद से अलग-अलग है, इसलिए शिल्पी अपनी परंपरा के ग्रंथ का अनुसरण करते हैं. ध्यान देने की बात यह है कि दोनों मापों में अंगों का योग कुल ताल से ठीक मिलता है. यही गणितीय संगति तालमान का सौंदर्य है.
मूल्य-बोध: यह कठोर अनुपात शिल्पी की निजी मनमर्ज़ी को नहीं, शास्त्र के अनुशासन को मानने की शिक्षा देता है. इससे प्रतिमा को नियमबद्ध सुषमा प्राप्त होती है.
माँ दुर्गा के स्वरूप के रहस्य और तात्त्विक विश्लेषण
क. दस हाथ क्यों?
साधारण लोग मानते हैं कि दस हाथ यानी दस अस्त्र धारण करने की जगहें. तंत्र और देवीभागवत की दृष्टि में देवी के दस हाथ दस दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, अग्नि, नैऋत्य, वायव्य, ऊर्ध्व और अधः) तथा दस इंद्रियों (५ ज्ञानेंद्रियाँ और ५ कर्मेंद्रियाँ) की एक साथ रक्षा और नियंत्रण के प्रतीक हैं. देवी सर्वदिग्व्यापिनी हैं.
ख. दशभुजा और अष्टादशभुजा
- अष्टादशभुजा स्वरूप: श्रीश्रीचण्डी के ध्यान में महालक्ष्मी के जिस महिषासुरमर्दिनी रूप का वर्णन है, उसमें वे अष्टादशभुजा हैं. १८ हाथों में माला, परशु, गदा, वज्र, पद्म, बाण, शूल, शंख, घंटा, पाश, शक्ति, दंड, चर्म (ढाल), धनुष और पानपात्र जैसे अनेक प्रतीक धारण होते हैं. यह समस्त ब्रह्मांड के सभी आयामों और दिशाओं पर देवी के आधिपत्य का प्रतीक है.
- दशभुजा स्वरूप: बंगाल की शारदीय पूजा में दशभुजा स्वरूप ही प्रधान है. कृत्तिवासी रामायण की कथा के अनुसार राम ने रावण-वध से पहले शरद ऋतु में असमय देवी का बोधन किया. इसी से इसका नाम ‘अकालबोधन’ पड़ा. वसंत की पूजा ‘वासंती’ कहलाती है.
ग. अस्त्रों का स्रोत और प्रतीकार्थ
महिषासुरमर्दिनी कथा का मूल यह है कि सभी देवताओं का तेज एकत्र होकर देवी का प्राकट्य हुआ. श्रीश्रीचण्डी के अनुसार देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र और आभूषण उन्हें अर्पित किए:
| अस्त्र या प्रतीक | दाता | प्रतीकार्थ |
|---|---|---|
| त्रिशूल | शिव | त्रिगुण और त्रिताप का विनाश |
| सुदर्शन चक्र | विष्णु | धर्मचक्र और काल का आवर्तन |
| शंख | वरुण | प्रणव या ओंकार की ध्वनि |
| शक्ति (भाला) | अग्नि | ज्ञान और तेज की दीप्ति |
| धनुष-बाण | वायु | गति और लक्ष्यभेद की एकाग्रता |
| वज्र और घंटा | इंद्र | दृढ़ता और चेतावनी |
| दंड | यम | न्याय और अनुशासन |
| अक्षमाला और कमंडलु | ब्रह्मा | जप, साधना और पवित्रता |
| खड्ग और ढाल | काल | विवेक की तीक्ष्णता और सुरक्षा |
| परशु | विश्वकर्मा | बाधाओं को काटकर मार्ग बनाने की शक्ति |
पद्म अनासक्ति का प्रतीक है, कीचड़ में खिलकर भी वह निर्लिप्त रहता है. देवी का वाहन सिंह हिमालय ने दिया था. यह कथा बताती है कि देवी किसी एक देवता की शक्ति नहीं, समवेत देवशक्ति का मूर्त रूप हैं. यह महातत्त्व इस मंत्र में गूँजता है:
सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके. शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
घ. सिंह वाहन क्यों?
सिंह तेज, पराक्रम और शक्ति का प्रतीक है. देवी के चरण सिंह की पीठ पर होने का अर्थ है कि दिव्य शक्ति मनुष्य के भीतर की पाशविक और हिंसक प्रवृत्तियों को नियंत्रण में रखती है.
ङ. महिषासुर की दृष्टि चरणों की ओर क्यों?
मूर्ति के नीचे दबे असुर की दृष्टि देवी के पद्म-चरणों की ओर रहती है. इसका गहन रूपक यह है कि निकृष्ट या तामसिक प्रवृत्ति भी चरम विनाश के क्षण में दिव्य चरणों में ही आश्रय खोजती है. विनाश के माध्यम से ही उसका रूपांतरण होता है. इसीलिए देवी एक साथ संहारकारिणी और मुक्तिदायिनी हैं.
च. भ्रूमध्य की ‘ऊर्णा’
भारतीय मूर्तिविद्या में दोनों भौंहों के बीच के बिंदु या विशेष चिह्न को ‘ऊर्णा’ कहा जाता है. बौद्ध और शाक्त मूर्तिविद्या में यह तीसरे नेत्र या प्रज्ञा की अभिव्यक्ति है. यह जगत माया के आवरण से ढका है. ललाट का यह बिंदु संकेत करता है कि जाग्रत महाशक्ति इस माया-जाल से ऊपर स्थित हैं.
छ. चालचित्र: ब्रह्मांड की परिधि
प्रतिमा के पीछे का अर्धचंद्राकार चालचित्र केवल सजावट नहीं है. शिल्पशास्त्र की दृष्टि में यह ब्रह्मांड या महाजागतिक परिधि का प्रतीक है. इसका विन्यास बताता है कि सृष्टि और लय का सारा आवर्तन इसी घेरे के भीतर घटित हो रहा है, और देवी इसके केंद्र में रहकर काल और विश्व को धारण कर रही हैं.
ज. त्रिभंग मुद्रा और गतिशीलता
देवी का शरीर सीधा और कठोर नहीं है. गर्दन, कमर और घुटनों पर हल्का मोड़ देकर गढ़ी गई इस मुद्रा का नाम ‘त्रिभंग’ है. यह मूर्ति में एक सुप्त गतिशीलता लाती है. इसका तात्त्विक अर्थ है कि दिव्य शक्ति कभी जड़ नहीं है, अशुभ के विनाश के लिए वह सदा प्रवाहमान है. पूजा के ध्यान-मंत्र में भी इस मुद्रा का उल्लेख है:
ॐ जटाजूटसमायुक्तामर्धेन्दुकृतलक्षणाम्. लोचनत्रयसंयुक्तां पूर्णेन्दुसदृशाननाम्॥ अतसीपुष्पवर्णाभां सुप्रतिष्ठां सुलोचनाम्. नवयौवनसम्पन्नां सर्वाभरणभूषिताम्॥ …त्रिभङ्गस्थानसंस्थानां महिषासुरमर्दिनीम्॥ (दुर्गा का ध्यान-मंत्र, अंश)
यहाँ देवी को जटाजूटधारिणी, अर्धचंद्र से शोभित, त्रिनेत्रा, पूर्णचंद्र-सदृश मुखवाली, अतसी पुष्प के समान वर्णवाली और त्रिभंग मुद्रा में स्थित महिषासुरमर्दिनी कहा गया है.
परिवार-प्रतिमा और एकचाला
बंगाल की दुर्गा अकेली नहीं हैं, वे पुत्री रूप में सपरिवार मायके आती हैं. एक ही चालचित्र के नीचे देवी के साथ लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिक और गणेश को रखा जाए, तो उसे ‘एकचाला’ प्रतिमा कहते हैं.
- लक्ष्मी: संपत्ति और समृद्धि.
- सरस्वती: ज्ञान और कला.
- कार्तिक: वीर्य और सेनापतित्व.
- गणेश: सिद्धि और विघ्ननाश.
देवी के चरणों के पास सिंह और महिषासुर होते हैं, और ऊपर शिव. यह विन्यास पारिवारिक बंधन और महाजागतिक शक्ति का अनूठा मिलन है.
नवपत्रिका: प्रकृति ही देवी
महासप्तमी की भोर में ‘कलाबहू’ को स्नान कराकर स्थापित किया जाता है. यह ‘नवपत्रिका’ वास्तव में नौ पौधों का गुच्छ है, जिन्हें एक साथ बाँधा जाता है:
रम्भा कच्ची हरिद्रा च जयन्ती बिल्वदाडिमौ. अशोको मानकश्चैव धान्यञ्च नवपत्रिका॥
| पौधा | अधिष्ठात्री स्वरूप |
|---|---|
| केला (रम्भा) | ब्रह्माणी |
| कच्ची (अरबी) | कालिका |
| हल्दी | दुर्गा |
| जयंती | कार्तिकी |
| बेल | शिव |
| अनार | रक्तदंतिका |
| अशोक | शोकरहिता |
| मानकंद | चामुंडा |
| धान | लक्ष्मी |
यह दुर्गापूजा की कृषि-आधारित और प्रकृति-पूजा की जड़ों की याद दिलाती है. अन्न, औषधि और वृक्षों में ही देवी को देखा गया है.
उपादान-तत्त्व, प्रतिमा की मिट्टी और नयन उन्मीलन
प्रतिमालक्षण में उपादान पर विशेष बल दिया गया है. मृण्मयी प्रतिमा के लिए मिट्टी संग्रह की निश्चित रीति है, जो पंचमहाभूतों की शक्ति का प्रतीक है.
बंगाल की लोक-परंपरा में प्रतिमा की मिट्टी में गंगा-तट की मिट्टी, गोबर और गोमूत्र मिलाया जाता है. प्रचलित रीति के अनुसार इसमें वर्जित-पल्ली (वेश्यालय) के द्वार की मिट्टी भी जोड़ी जाती है, जिसे ‘पुण्य-माटी’ कहा जाता है. इसका सामाजिक अर्थ गहरा है: समाज के हाशिये पर खड़े लोग भी देवी की आराधना के भागीदार हैं. हालाँकि यह लोकाचार है, सभी शास्त्र-ग्रंथों में इसका निर्देश नहीं मिलता.
प्रतिमा गढ़ लेने पर शिल्पी का कार्य समाप्त नहीं होता. अंतिम चरण है ‘नयन उन्मीलन’ या चक्षुदान. महालया के दिन प्रतिमा की आँखें बनाई जाती हैं. मंत्रोच्चार और प्राण-प्रतिष्ठा के द्वारा एक जड़ वस्तु में दिव्य शक्ति का आवाहन होता है. तब प्रतिमा मिट्टी की मूर्ति भर नहीं रहती, भक्त की चेतना से एकाकार होकर जीवंत शक्ति का आधार बन जाती है.
रंगों का महत्त्व
- देवी का वर्ण: ध्यान-मंत्र में ‘अतसीपुष्पवर्णाभा’ कहा गया है, यानी अलसी के फूल जैसा उज्ज्वल स्वर्णिम रंग. बंगाल की प्रतिमा में यह ‘कच्चे सोने’ के रंग में उभरता है. यह ज्योति और तेज का प्रतीक है.
- सिंह: सुनहरा-पीला रंग पराक्रम का प्रतीक है.
- असुर: प्रचलित बंगाली प्रतिमा में असुर का रंग हरा होता है. इसे तामसिक, जंगली और अशुभ प्रवृत्तियों के प्रतीक के रूप में पढ़ा जाता है.
- साड़ी: लाल रंग शक्ति और शुभ का चिह्न है.
- साज: ‘डाक का साज’ चाँदी जैसी पन्नी से बनता है, और ‘शोला का साज’ शोला (सोला) पौधे के सफेद गूदे से गढ़ा जाता है. दोनों बंगाल की अपनी शिल्प-परंपराएँ हैं.
दुर्गापूजा का ऐतिहासिक विकास
प्राचीन बंगाल में वसंत की वासंती पूजा ही देवी की प्रमुख आराधना थी. बाद में शरद ऋतु का अकालबोधन लोकप्रिय हुआ. जमींदार-घरानों की पूजा से धीरे-धीरे सार्वजनिक पूजा का जन्म हुआ. प्रचलित धारणा के अनुसार बंगाल में बारोयारी, यानी सामूहिक पूजा की शुरुआत अठारहवीं शताब्दी के अंतिम दौर में हुगली के गुप्तिपाड़ा में हुई. उसी धारा से आज के मोहल्ले-मोहल्ले के सार्वजनिक उत्सव का जन्म हुआ.
पूजा-क्रम और दिनों का महत्त्व
महालया: पितृपक्ष का अंत और देवीपक्ष का आरंभ. इस दिन चक्षुदान होता है और चंडीपाठ से देवी का आवाहन किया जाता है.
- षष्ठी: देवी का बोधन और आमंत्रण.
- सप्तमी: नवपत्रिका स्नान और स्थापना, प्राण-प्रतिष्ठा.
- अष्टमी: महापूजा और अंजलि. अंतिम भाग में संधिपूजा.
- संधिपूजा: अष्टमी और नवमी के संधिक्षण में यह पूजा होती है. मान्यता है कि इसी क्षण देवी ने चामुंडा रूप में चंड-मुंड असुरों का वध किया था. परंपरा के अनुसार १०८ दीप जलाए जाते हैं. यह पूजा का सबसे तीव्र और पवित्र क्षण है.
- नवमी: महानवमी पूजा और हवन.
- दशमी: विजया दशमी. दर्पण-विसर्जन, सिंदूर खेला, विसर्जन और गले मिलना.
अंजलि के मंत्र में गूँजता है:
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि. गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥
क्षेत्रीय विविधता और अन्य स्वरूप
नवदुर्गा: उत्तर भारत की नवरात्रि में देवी के नौ स्वरूप पूजे जाते हैं:
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी. तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥ पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च. सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥ नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः॥ (देवीकवच)
- गुजरात: नौ रात्रियों तक गरबा और डांडिया नृत्य.
- दक्षिण भारत: तमिलनाडु और आंध्र में नवरात्रि पर ‘गोलू’, यानी गुड़ियों की सजावट. मैसूर का दशहरा राजसी शोभायात्रा के लिए प्रसिद्ध है.
- प्राचीन निदर्शन: महाबलीपुरम की महिषासुरमर्दिनी गुफा (पल्लव काल, अनुमानतः सातवीं शताब्दी) तथा कुषाण और गुप्त काल की महिषासुरमर्दिनी मूर्तियाँ दिखाती हैं कि यह स्वरूप-कल्पना कितनी प्राचीन है. इस गुफा के शिल्प में सिंहवाहिनी देवी और महिषासुर का संग्राम गतिमय रूप में उकेरा गया है.
उपसंहार
भारतीय शिल्पशास्त्र, पुराण और प्रतिमालक्षण अंधविश्वासों का संकलन नहीं हैं. यह ज्यामितीय अनुपात, गणितीय संतुलन, प्रकृति-चेतना और गहन दर्शन का अनूठा समन्वय है. मृण्मयी प्रतिमा की हर रेखा, तालमान, भुजाओं की संख्या, अस्त्र, चालचित्र, वाहन, ऊर्णा, त्रिभंग और नवपत्रिका के पीछे एक ही शाश्वत संदेश छिपा है: भीतर की पाशविक प्रवृत्तियों का दमन कर दिव्य चेतना को जगाना. मिट्टी की मूर्ति तभी चिन्मयी बनती है, जब भक्त के अंतर में वह चेतना जाग उठती है.
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते. भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥
लेखक का निवेदन : यह लेख मैंने अपने व्यक्तिगत जीवन में जो कुछ देखा, सुना और पढ़ा है, उसी के आधार पर लिखा है. आशा है यह सभी को स्वीकार्य होगा। इस विषय पर अन्य मत भी हो सकते हैं, और उन सभी मतों के प्रति मेरे मन में सम्मान है.
-भारत एक्सप्रेस
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