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CJP नेता सौरभ दास से SEM ने मांगा दिल्ली निवास प्रमाण पत्र

कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरभ दास को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने दिल्ली निवास का प्रमाण पत्र पेश करने का निर्देश दिया है. 17 नवंबर को अगली सुनवाई होगी.

Jantar Mantar Protest

कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरभ दास को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) ने दिल्ली में अपने निवास का प्रमाण पत्र पेश करने का निर्देश दिया है. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि सौरभ दास की ओर से दिल्ली निवास से संबंधित कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया है. अब इस मामले में अदालत 17 नवंबर को अगली सुनवाई करेगी.

जमानत और न्यायिक हिरासत से जुड़ा घटनाक्रम

इससे पहले अदालत ने सौरभ दास और आशुतोष रांका को लिखित माफीनामा और शपथ पत्र (Affidavit) दाखिल करने के बाद शर्तों के साथ जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया था. कोर्ट ने पुलिस की उस मांग को सिरे से खारिज कर दिया था, जिसमें दोनों की न्यायिक हिरासत तीन दिन और बढ़ाने की अपील की गई थी. इसके बाद दोनों को 50-50 हजार रुपये के निजी मुचलके पर जमानत दे दी गई थी.

गत 14 अक्टूबर 2026 को आशुतोष रांका और सौरभ दास को शांति भंग होने और सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) प्रभावित होने की आशंका के आधार पर निवारक कार्रवाई (Preventive Action) के तहत अदालत में पेश किया गया था.

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया

जेल से बाहर आने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के फाउंडर अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर लिखा था, “सौरभ और आशु न सिर्फ मुझसे बेहतर, बल्कि मुझसे बहुत-बहुत बड़े नेता हैं. अपने नेताओं के हर हुक्म का पालन करने के लिए तैयार हूं, जान हाजिर है.”

दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणियां

इससे पहले दोनों नेताओं ने अपनी न्यायिक हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका दिल्ली हाईकोर्ट से वापस ले ली थी. सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कई अहम टिप्पणियां की थीं. कोर्ट ने कहा था कि सौरभ दास और आशुतोष रांका ‘GenZ’ (जेन-जी) नहीं हैं, क्योंकि दोनों की उम्र क्रमशः 27 और 31 वर्ष है. अदालत ने स्पष्ट किया था कि यदि उद्देश्य सत्ता परिवर्तन है, तो इसे केवल और केवल चुनावों के माध्यम से ही हासिल किया जाना चाहिए.

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हाईकोर्ट आने पर सवाल

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील से यह भी सवाल किया था कि जब यह मामला उसी दिन SEM कोर्ट के समक्ष आ रहा है, तो ऐसी क्या जल्दी थी कि हाईकोर्ट का रुख करना पड़ा. कोर्ट ने कहा था कि यदि यह ऐसा आदेश है जिस पर पुनर्विचार संभव है, तो याचिका वापस लेना ही बेहतर होगा.



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