कैंसर जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की आसमान छूती कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. दवाओं के दाम नियंत्रित करने की मांग वाली याचिका पर सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने केंद्र सरकार से दो सप्ताह के भीतर लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया. सुनवाई के दौरान अदालत ने दवाओं के वास्तविक दाम और MRP के बीच भारी अंतर को लेकर केंद्र सरकार को जमकर फटकार लगाई.
अदालत ने सुनाया अस्पताल की ‘लूट’ का वाकया
पीठ ने सुनवाई के दौरान एक आंखें खोल देने वाली घटना का जिक्र किया. अदालत ने बताया कि कीमोथेरेपी का जो इंजेक्शन एक मेडिकल डिस्ट्रीब्यूटर को खुद 11 हजार रुपये में मिलता है, अस्पताल ने उसकी कैंसर पीड़ित पत्नी को बाहर का इंजेक्शन लगाने से मना कर दिया और उसी दवा के 1 लाख 30 हजार रुपये वसूल लिए.
कोर्ट ने तीखे सवाल पूछते हुए केंद्र से कहा, “क्या आप इस खुली लूट का कोई वाजिब कारण बता सकते हैं? इतना बड़ा अंतर क्यों है और यह पैसा आखिर किसकी जेब में जाता है? क्या सरकार जनता के साथ खड़ी है या सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है?”
15 रुपये की ड्रिप 270 की
अदालत ने कहा कि आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं में 5 लाख तक की मदद तो मिलती है, लेकिन जब अस्पतालों के बिल इतने भारी-भरकम होंगे, तो घूम-फिरकर सारा आर्थिक बोझ बेबस मरीज पर ही पड़ता है. सुनवाई में 15 रुपये की ड्रिप लाइन 270 रुपये में बेचे जाने का उदाहरण भी सामने आया.
दूसरी तरफ, केंद्र सरकार ने हलफनामे में बताया कि गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30% तक सीमित करने और नई व्यवस्था के लिए एक्सपर्ट कमेटी बनाने का फैसला लिया गया है. इससे दवाओं के दाम 20 से 70 फीसदी तक घट सकते हैं और मरीजों को सालाना ₹2,500 करोड़ की बचत होगी.
-भारत एक्सप्रेस
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