यूपी में सपा-कांग्रेस सीट बंटवारे का गणित
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच संभावित गठबंधन की चर्चाएं लगातार तेज हो रही हैं. इसी बीच कांग्रेस मुख्यालय के बाहर लगे एक पोस्टर ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी. पोस्टर में कांग्रेस के लिए 200 सीटों की मांग दिखाई गई, हालांकि पार्टी ने इससे खुद को अलग बताते हुए इसे आधिकारिक रुख मानने से इनकार कर दिया. बावजूद इसके, राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि कांग्रेस इस बार सपा से 170 से ज्यादा सीटों की मांग कर सकती है. इसी बीच सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव का एक बयान सीट बंटवारे के संभावित आधार को लेकर खासा चर्चा में आ गया है.
रामगोपाल यादव ने याद किया 1992 का समझौता
फिरोजाबाद में पत्रकारों से बातचीत के दौरान रामगोपाल यादव से कांग्रेस के साथ गठबंधन और सीटों के बंटवारे पर सवाल किया गया. जवाब में उन्होंने 1992 में सपा और बसपा के बीच हुए समझौते का जिक्र किया. उन्होंने बताया कि उस समय कांशीराम और उन्होंने बेहद कम समय में सभी 425 सीटों का बंटवारा तय कर लिया था. रामगोपाल यादव के मुताबिक, कांशीराम ने उस समय एक आसान सिद्धांत रखा था कि जिस सीट पर पिछली बार जिस पार्टी को अधिक वोट मिले हों, वह सीट उसी पार्टी को मिलनी चाहिए. उन्होंने कहा कि उस वक्त भी उन्होंने इस सिद्धांत का समर्थन किया था और आज भी व्यक्तिगत तौर पर वही तरीका सबसे उचित मानते हैं.
कांग्रेस-सपा का फैसला शीर्ष नेतृत्व करेगा
सपा नेता ने साफ कहा कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सीटों का अंतिम फैसला अखिलेश यादव और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व मिलकर करेगा. उन्होंने कहा कि अलग-अलग नेताओं के सार्वजनिक बयान ज्यादा महत्व नहीं रखते, क्योंकि कई बार लोग सिर्फ अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने के लिए बयान देते हैं. रामगोपाल यादव ने यह भी कहा कि 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा अलग-अलग मैदान में उतरी थीं. ऐसे में उनकी राय है कि जिस विधानसभा क्षेत्र में किसी पार्टी को ज्यादा वोट मिले थे, उस सीट पर दावा उसी पार्टी का होना चाहिए. उनके इस बयान को दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे के संभावित फॉर्मूले के तौर पर देखा जा रहा है.
इस फॉर्मूले से कांग्रेस के हिस्से आएंगी सिर्फ 6 सीटें
यदि 2022 विधानसभा चुनाव के आंकड़ों को आधार बनाया जाए तो कांग्रेस की स्थिति काफी कमजोर नजर आती है. उस चुनाव में कांग्रेस को केवल दो सीटों पर जीत मिली थी. इसके अलावा चार सीटों पर वह दूसरे स्थान पर रही थी. कांग्रेस ने 403 में से 399 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. पार्टी ने रामपुर खास से आराधना मिश्रा मोना और फरेंदा से वीरेंद्र चौधरी को जिताया था. वहीं मथुरा, खेरागढ़, जगदीशपुर और किदवईनगर में पार्टी दूसरे नंबर पर रही थी. ऐसे में रामगोपाल यादव द्वारा बताए गए सिद्धांत को लागू किया जाए तो कांग्रेस के हिस्से महज 6 सीटें आती दिखाई देती हैं.
RLD और सुभासपा की सीटों से बदल सकता है समीकरण
2022 के चुनाव में सपा ने 347 सीटों पर चुनाव लड़ा था. उसके साथ राष्ट्रीय लोकदल ने 33 और ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा ने 19 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. चुनाव में RLD को 8 और सुभासपा को 6 सीटों पर जीत मिली थी. अब ये दोनों दल सपा के साथ नहीं हैं. ऐसे में यदि इन सहयोगी दलों द्वारा लड़ी गई सीटों के हिस्से को कांग्रेस के लिए समायोजित किया जाए तो यह संख्या करीब 58 सीटों तक पहुंच सकती है. सूत्रों के अनुसार सपा नेतृत्व कांग्रेस को लगभग 50 से 60 सीटें देने पर विचार कर सकता है, जबकि पार्टी खुद करीब 350 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है.
लोकसभा चुनाव में अलग रहा था सीट बंटवारे का गणित
दिलचस्प बात यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान यही फॉर्मूला लागू नहीं किया गया था. उस चुनाव में समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस को 17 सीटें दी थीं. अगर 2019 लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को आधार बनाया जाता तो कांग्रेस को केवल 4 सीटों पर ही दावा मिलना चाहिए था. 2019 में कांग्रेस ने 67 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन जीत सिर्फ रायबरेली सीट पर मिली थी. इसके अलावा अमेठी, कानपुर और फतेहपुर सीकरी में पार्टी दूसरे स्थान पर रही थी. इसके बावजूद अखिलेश यादव ने कांग्रेस को 17 सीटें देकर उदार रुख अपनाया था. यही वजह है कि इस बार भी अंतिम सीट बंटवारा केवल पुराने चुनावी आंकड़ों के आधार पर होगा या राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से, इस पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं.
Also Follow Bharat Express on Youtube
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.



