Rajendra Pal Gautam Controversy: कहानी उस नेता की जिसे कांग्रेस के बारे में कुछ भी अता-पता नहीं है, लेकिन कांग्रेस ने उसे सबसे बड़े प्रदेश यूपी का प्रभारी बना के भेज दिया है. जी हां, ये कहानी है राजेंद्रपाल गौतम की. आम आदमी पार्टी में लगभग सात साल मंत्री रहे राजेंद्रपाल गौतम पहली बार इतनी बड़ी जिम्मेदारी और इतना बड़ा मौका पाकर बौरा गए लगते हैं.
‘राय’ से टकराव और ‘आराधना’ पर भरोसा (Rajendra Pal Gautam controversy Congress)
पुराने कांग्रेसी कह रहे हैं कि गौतम साहब का ओवर कॉन्फिडेंस इतना है कि उन्होंने पहला फरमान ही ये सुनाया कि उन्हें किसी ‘राय’ की जरूरत नहीं… पूजा-पाठ के तो घोर विरोधी हैं, लेकिन उनका मानना है कि वो केवल ‘आराधना’ से काम चला लेंगे. तो सबसे पहले तो ‘राय’ से भिड़े, पूरा कमांड अपने हाथ में लेने के लिए लगे रहे… बात नहीं बनी तो ‘राय’ की छुट्टी ही करा दी.

राहुल गांधी के सामने बड़ा दावा
दिल्ली में केसी वेणुगोपाल के जरिए राहुल गांधी को समझा चुके हैं कि देश में अब कोई दलित नेता है तो बस राजेंद्रपाल गौतम ही हैं. यूपी के तो सारे 12 परसेंट जाटव वोट गौतम जी की ही जेब में हैं और सरकार इंडिया गठबंधन की ही नहीं, कांग्रेस की भी बनने वाली है.
करीबियों से बातचीत में गौतम साहब यूपी में कांग्रेस का सीएम बनने का दावा करने भी लगे हैं. 200 सीटों का दावा भी इसीलिए ठोका था क्योंकि मुख्यमंत्री बनना है तो लड़ने वाली सीटों की संख्या भी बहुमत के आसपास तो हो.

टिकट के दावेदार और फंड का खेल (Ajay Rai vs Rajendra Pal Gautam)
समाजवादी पार्टी से गठबंधन की खबर सुनते ही खरीदार भी आने लगे हैं, तो साहब को उम्मीद है कि अच्छा फंड जुटा लेंगे. फंड पर अब खास नजर दिखती है. यहां तक कि अपने एक पुराने साथी प्रोफेसर को भी चूना लगा बैठे हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र संघ चुनावों में गौतम जी ने जीत दिलाने का दावा किया ही था.
केसी वेणुगोपाल को समझा दिया था कि दिल्ली में अपना ही जलवा है. स्टूडेंट्स की एक मीटिंग करते ही एनएसयूआई के चारों के चारों कैंडिडेट्स की जीत तय और एबीवीपी का सूपड़ा साफ… वैसे भी जेनज़ी के आंदोलन ने माहौल बना ही दिया था.

प्रोफेसर के घर डिनर और दावत का बिल
गौतम साहब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार में मंत्री रहे भी थे, तो कांग्रेस को भी भरोसा हो गया. सुना है, एक ठीक-ठाक रकम भी पार्टी से ले ली और साहब जुट गए छात्र-छात्राओं की मीटिंग करने में. अब स्टूडेंट्स से उनका कोई लेना-देना तो था नहीं.
तो साहब ने कांग्रेस से हाल-फिलहाल में जुड़े कुछ प्रोफेसरों की मदद ली. एक तेज-तर्रार प्रोफेसर के घर पर मीटिंग भी बुलाई. बोल भी दिया कि फंड की फिकर नहीं करना है, सब खर्चा पार्टी से मिल जाएगा. प्रोफेसरों ने दम लगा दी तो तय दो सौ की जगह करीब ढाई सौ स्टूडेंट्स आ भी गए.

भावी प्रत्याशियों की भीड़
अब साहब यूपी कांग्रेस के प्रभारी (Rajendrapal Gautam) भी हैं यानी दो सौ टिकट उनकी जेब में हैं, तो मीटिंग की खबर मिलते ही यूपी के कांग्रेस के सारे भावी प्रत्याशी भी प्रोफेसर के घर धमक गए. हो गई चार-पांच सौ की भीड़. डिनर के नाम पर बुलवाया था, तो सबने बढ़िया दावत उड़ाई. प्रोफेसर साहब को पसीने आ गए, जैसे-तैसे सबको खिलाने का इंतजाम कराया.
महीने भर बाद भी नहीं चुकाया खर्च
खैर, अब महीना भर से ऊपर हो गया, गौतम जी चवन्नी देने को राजी नहीं. यूपी चुनाव हैं, तो व्यस्तता का बहाना है ही, तो न तो फोन उठाते हैं और न मैसेज चेक कर पाते हैं. अब हालत ये है कि गौतम जी की दिल्ली में जो टीम थी, वो भी खार खाए बैठी है.

दलित नेताओं की घेराबंदी
बहरहाल, अब यूपी में पार्टी ठप पड़ गई है. “राय” चाहिए नहीं, और “आराधना” करने की आदत कांग्रेसियों की है नहीं, या तो वो बगावत करते हैं या चरण-वंदना. कांग्रेस के जितने भी छोटे-बड़े दलित नेता थे, उन पर अकेले गौतम जी ही भारी हैं. बाकी सारे दलित नेताओं को राहुल गांधी से मिलने ही नहीं देते. जिसको भी मिलना हो गौतम जी के जरिए ही जाइए, और गौतम जी बैठे हैं बैरियर लगाए… तो आप समझ ही गए होंगे कि यूपी कांग्रेस में अभी क्या-क्या होना है.
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.



