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हंसे या रोएं? MLC चुनावों के नतीजों से नेता हुए परेशान, राजनीतिक पंडितों का सिर घूमा

MLC Election Results: चार राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों पर चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं. वाराणसी और लखनऊ में सपा की जीत हुई तो कर्नाटक में कांग्रेस शून्य पर रह गई. जानिए क्यों परेशान हैं बड़े नेता?

MLC election results analysis

MLC Election Results: देश के चार बड़े राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों पर हुए चुनावों को लेकर भारी राजनीतिक सरगर्मी देखने को मिली. उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में तो राजनीतिक विश्लेषकों ने इन्हें आगामी विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल तक करार दे दिया था. हालांकि, देश के प्रबुद्ध और शिक्षित मतदाताओं ने ऐसा फैसला सुनाया है कि सभी राजनीतिक विश्लेषक हैरान हैं. बड़े-बड़े राजनीतिक दिग्गज भी यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे इन परिणामों पर खुशी मनाएं या चिंता व्यक्त करें.

जनता ने अपना मन पूरी तरह बना लिया है, ऐसे बड़े-बड़े दावे जनता के बीच जाकर करने वाले नेता भी यह समझ नहीं पा रहे हैं कि शिक्षक और स्नातक वर्ग के ये मतदाता वास्तव में क्या संदेश देना चाहते हैं.

MLC election results analysis 1

बिहार में कांग्रेस और प्रमुख दलों का गणित बिगड़ा (Bihar MLC Election Results Analysis)

सबसे पहले कांग्रेस पार्टी की स्थिति की पड़ताल करते हैं, जहां कई नेता लगातार यह दावा कर रहे थे कि देश ने राहुल गांधी को अपना सर्वमान्य नेता स्वीकार कर लिया है. बिहार की शिक्षक और स्नातक कोटे की 8 सीटों पर कांग्रेस ने अपने सहयोगी दल राष्ट्रीय जनता दल (RJD) से अलग होकर 5 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. जब परिणाम सामने आए, तो कांग्रेस के पांचों उम्मीदवार दौड़ से पूरी तरह बाहर नजर आए.

इस चुनाव में खुद आरजेडी को भी मात्र एक ही सीट हासिल हो सकी. वहीं, सरकार में शामिल जनता दल यूनाइटेड (JDU) को भी प्रबुद्ध मतदाताओं ने केवल एक ही सीट दी, जो प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के बराबर ही रही. इसके अलावा दो सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की. भारतीय जनता पार्टी के लिए भी यह परिणाम बहुत अधिक उत्साहजनक नहीं रहे, क्योंकि पार्टी को 8 में से केवल 3 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा.

कर्नाटक में सत्ताधारी कांग्रेस का सूपड़ा साफ (Karnataka MLC Election Results Analysis)

अब बात करते हैं कर्नाटक की, जहां कांग्रेस पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार है और हाल ही में सिद्धारमैया की जगह डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई है. इसके बावजूद विधान परिषद की चार सीटों पर हुए चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस के हाथ पूरी तरह खाली रहे.

यहां भारतीय जनता पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए तीन सीटें अपनी झोली में डालीं, जबकि एक सीट जनता दल सेक्युलर (JDS/JDU गठबंधन) के खाते में गई.

महाराष्ट्र में महायुति को झटका (Maharastra MLC Election Results Analysis)

महाराष्ट्र में अधिकांश लोग यह मानकर चल रहे थे कि शरद पवार गुट वाली एनसीपी और महाविकास अघाड़ी के दिन लद चुके हैं, लेकिन 5 सीटों पर हुए चुनाव में 2 सीटें अकेले शरद पवार की पार्टी ने जीत लीं. एक सीट पर कांग्रेस ने कब्जा जमाया, जबकि सत्ताधारी भाजपा और एकनाथ शिंदे की शिवसेना को महज एक-एक सीट ही मिल सकी.

महाराष्ट्र के परिणामों में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के मजबूत प्रभाव वाली नागपुर स्नातक सीट पर कांग्रेस ने विजय हासिल कर ली और भाजपा को हार का सामना करना पड़ा. इस तरह बिहार और कर्नाटक से भाजपा को जो बढ़त मिली थी, वह महाराष्ट्र के नतीजों में सिमटती नजर आई.

उत्तर प्रदेश के गढ़ में सपा की सेंध (UP MLC Election Results Analysis)

उत्तर प्रदेश की 11 सीटों पर असली राजनीतिक फैसला देखने को मिला. सीटों की कुल संख्या के लिहाज से भाजपा 6 सीटें जीतकर सबसे आगे जरूर रही, लेकिन अंदरूनी तस्वीर इतनी सीधी नहीं है. समाजवादी पार्टी ने इस बार दो नई सीटों पर कब्जा जमाते हुए कुल 5 सीटों पर जीत दर्ज की और भाजपा के लिए कड़ी चुनौती पेश की.

इस चुनाव में सबसे बड़ा उलटफेर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में हुआ, जहां वाराणसी स्नातक और वाराणसी शिक्षक दोनों ही सीटों पर समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की और भाजपा को पराजय झेलनी पड़ी. इतना ही नहीं, देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र वाली प्रतिष्ठित लखनऊ स्नातक सीट पर भी भाजपा परास्त हो गई और यह सीट भी समाजवादी पार्टी के खाते में चली गई.

दिग्गजों के सामने असमंजस की स्थिति (2026 MLC Election Results)

इन अप्रत्याशित नतीजों के बाद राजनीतिक दलों के सामने अजीब धर्मसंकट खड़ा हो गया है. कांग्रेस यदि वाराणसी, लखनऊ और नागपुर जैसी हाईप्रोफाइल सीटों पर भाजपा की हार का जश्न मनाना चाहे, तो वह अपनी सरकार वाले राज्य कर्नाटक में पूरी तरह पिछड़ने के कारण ऐसा नहीं कर पा रही है. वहीं दूसरी तरफ, भाजपा कर्नाटक की जीत पर खुलकर इतरा नहीं पा रही है, क्योंकि उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के अपने सबसे मजबूत सियासी किलों में उसे अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा है.

पढ़े-लिखे मतदाताओं के इस जनादेश ने तमाम बड़े नेताओं को गहरी उलझन में डाल दिया है कि वे अपनी स्थिति पर खुश हों या निराश. आने वाले समय में इन नतीजों का मुख्यधारा के विधानसभा चुनावों पर गहरा प्रभाव पड़ना तय माना जा रहा है.



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