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‘बार का अपराधीकरण न्याय व्यवस्था को कर रहा खोखला’: इलाहाबाद HC ने कोर्ट नंबर 49 में हिंसा का लिया स्वतः संज्ञान, वकीलों पर अवमानना और FIR के निर्देश

Allahabad High Court Court 49 lawyers violence contempt: इलाहाबाद हाईकोर्ट की कोर्ट 49 में हिंसा और एजीए पर हमले पर खंडपीठ सख्त हुई. स्वतः संज्ञान लेकर आपराधिक अवमानना व एफआईआर के आदेश दिए, बार के अपराधीकरण पर गहरी चिंता जताई.

इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा NSA रद्द करने के फैसले को UP सरकार सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी.

इलाहाबाद हाई कोर्ट

Vijay Ram Edited by Vijay Ram

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कोर्ट संख्या 49 में 28 अक्टूबर 2026 को वकीलों के एक समूह द्वारा की गई हिंसा, तोड़फोड़, सरकारी वकील से मारपीट और न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालने की अभूतपूर्व घटना पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है. न्यायमूर्ति अजय भनोट और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए प्रथम दृष्टया इसे आपराधिक अवमानना और गंभीर आपराधिक कृत्य करार दिया है. अदालत ने चिंता व्यक्त करते हुए तल्ख टिप्पणी की कि “बार का अपराधीकरण” पूरी न्याय व्यवस्था की नींव को खोखला कर रहा है.

सरकारी वकील को पीटा, चैंबर में ली शरण; कोर्ट रूम में तोड़फोड़

अदालत के अनुसार, 28 अक्टूबर की सुबह अदालत बैठने से पहले ही कोर्ट रूम में वकीलों की उग्र भीड़ जमा होकर नारेबाजी कर रही थी. इसके चलते पीठ को उठना पड़ा. पीठ के उठते ही उपद्रवी वकीलों ने अपर शासकीय अधिवक्ता (प्रथम) परितोष कुमार मालवीय पर जानलेवा हमला कर दिया. बुरी तरह पीटे जाने के बाद लहूलुहान व सूजे हुए चेहरे के साथ मालवीय ने जज के चैंबर में भागकर जान बचाई, जहां हाई कोर्ट डिस्पेंसरी के डॉक्टरों ने उनका प्राथमिक उपचार किया. रजिस्ट्रार जनरल की रिपोर्ट और वीडियो फुटेज से पुष्टि हुई कि उपद्रवियों ने अन्य सरकारी वकीलों, कोर्ट स्टाफ व सुरक्षाकर्मियों पर भी हमला किया और कोर्ट रूम के फर्नीचर तोड़ डाले.

बार पदाधिकारियों के पत्र को बताया हिंसा की मुख्य जड़

खंडपीठ ने इस सुनियोजित हिंसा की जड़ हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के नवनिर्वाचित अध्यक्ष डॉ. सी.पी. उपाध्याय और महासचिव संतोष कुमार मिश्र द्वारा जारी 27 अक्टूबर के पत्र को ठहराया. पीठ ने पत्र में लगाए गए सभी आरोपों—पुलिस अधिकारी के लिए कुर्सी, वकील से जबरन माफी और जज द्वारा जेल भेजने की धमकी—को पूरी तरह मनगढ़ंत और असत्य करार दिया. अदालत में वरिष्ठ अधिवक्ता वी.पी. श्रीवास्तव ने उग्र भीड़ के सामने खड़े होकर पत्र के दावों का खंडन किया और स्पष्ट किया कि उनके साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं हुआ था. कोर्ट ने उनके अदम्य साहस की सराहना की और माना कि पत्र की भड़काऊ भाषा ने सीधे तौर पर हिंसा को हवा दी.

अवमानना, एफआईआर और भ्रामक सोशल मीडिया पोस्ट हटाने के सख्त आदेश

पीठ ने मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करते हुए कई कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं:

  • उपद्रवी वकीलों के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाए.
  • रजिस्ट्रार जनरल को हिंसा, साजिश, हमले और तोड़फोड़ में शामिल वकीलों के विरुद्ध तत्काल नामजद एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए जाएं.
  • न्यायपालिका की छवि धूमिल करने के लिए सोशल मीडिया पर भ्रामक व झूठी पोस्ट डालने वालों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज कर पोस्ट ब्लॉक और डिलीट कराई जाएं.
  • राज्य सरकार अदालतों में पैरवी करने वाले अपने विधि अधिकारियों (लॉ ऑफिसर्स) की पुख्ता सुरक्षा सुनिश्चित करे.


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