काशी की पहचान सिर्फ उसके प्राचीन मंदिरों, गंगा के घाटों और धार्मिक परंपराओं से नहीं है. इस शहर की एक खास पहचान यहां के काशी नरेश भी रहे हैं. सदियों से काशी की संस्कृति, धर्म और परंपराओं को सहेजने में काशी के राजपरिवार की अहम भूमिका रही है. हालांकि, आजादी के बाद राजाओं के अधिकार भले ही खत्म हो गए, लेकिन काशी नरेश के प्रति लोगों का सम्मान कभी कम नहीं हुआ. इसकी सबसे बड़ी मिसाल थे डॉ. विभूति नारायण सिंह. वे ऐसे राजा थे, जिन्होंने अपनी पहचान महल और राजसी ठाठ-बाट से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार, विद्वता और जनता से गहरे जुड़ाव से बनाई.
काशीवासी उन्हें केवल महाराजा नहीं मानते थे, बल्कि उनके लिए वे श्रद्धा और आस्था का प्रतीक थे. यही वजह थी कि उन्हें लोग प्यार से ‘सचल विश्वनाथ’ भी कहते थे.
बचपन में ही मिली राजपरिवार की जिम्मेदारी
डॉ. विभूति नारायण सिंह का जन्म 5 नवंबर 1927 को आजमगढ़ के सूरजपुर में हुआ था. उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह बालक आगे चलकर काशी की एक ऐतिहासिक परंपरा का प्रमुख चेहरा बनेगा.
महाराजा आदित्य नारायण सिंह की कोई संतान नहीं थी. इसलिए उन्होंने जून 1934 में आठ साल के विभूति नारायण सिंह को अपना दत्तक पुत्र बनाया. 4 अप्रैल 1939 को महाराजा आदित्य नारायण सिंह के निधन के बाद उन्हें नारायण वंश का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया. उस समय उनकी उम्र कम थी, इसलिए कुछ वर्षों तक राज्य का काम परामर्शी परिषद की देखरेख में चलता रहा.
जुलाई 1947 में बालिग होने के बाद उन्हें शासन की पूरी जिम्मेदारी सौंप दी गई. लेकिन इसके कुछ ही समय बाद देश की आजादी के साथ रियासतों का दौर भी बदलने लगा.
जब खुद फहराया तिरंगा और भारतीय संघ में मिलाया काशी राज्य
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ. इस बदलाव के साथ बनारस रियासत के सामने भी एक बड़ा फैसला लेने का समय आया. डॉ. विभूति नारायण सिंह ने जनता की भावनाओं का सम्मान करते हुए 15 अक्टूबर 1948 को रामनगर किले में खुद तिरंगा फहराया और काशी राज्य का भारतीय संघ में विलय कर दिया.
उन्होंने अपनी सेना और छावनी भी भारत सरकार को सौंप दी. यह फैसला उनके व्यक्तित्व और देश के प्रति उनकी सोच को दिखाता है. राजशाही के अधिकार छोड़ने के बाद भी उन्होंने काशी की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं से अपना रिश्ता बनाए रखा. इस तरह वे स्वतंत्रता से पहले के काशी राज्य के अंतिम शासक बने.
वेद-पुराण के जानकार थे, आधुनिक शिक्षा में भी थी गहरी रुचि
डॉ. विभूति नारायण सिंह का व्यक्तित्व सिर्फ एक राजा तक सीमित नहीं था. उन्हें धर्म, दर्शन और भारतीय परंपराओं की गहरी समझ थी. वे वेदों के महान विद्वान स्वर्गीय राजराजेश्वर शास्त्री द्रविड़ के शिष्य रहे थे. वेद, पुराण और सनातन धर्म के अध्ययन के साथ-साथ उनकी दिलचस्पी आधुनिक शिक्षा और विज्ञान में भी थी.
उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की. वर्ष 1992 में उन्हें काशी हिंदू विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया. शिक्षा के क्षेत्र में उनकी यह भूमिका उनके व्यक्तित्व का एक अलग पहलू सामने लाती है. वे मानते थे कि भारतीय ज्ञान परंपरा को सहेजने के साथ आधुनिक शिक्षा को भी आगे बढ़ाना जरूरी है.
काशी की गलियों में गूंजता था ‘हर-हर महादेव’
डॉ. विभूति नारायण सिंह की असली लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे जहां भी पहुंचते, लोग उन्हें देखने और उनका अभिवादन करने के लिए जुट जाते थे. उनके आने पर ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे गूंजने लगते थे.
खास बात यह थी कि इतने सम्मान और प्रतिष्ठा के बावजूद उनके व्यवहार में कभी अहंकार नहीं दिखा. जनता के बीच पहुंचकर वे हाथ जोड़कर सबका अभिवादन करते थे. उनका यही सहज स्वभाव लोगों को अपना बना लेता था.
25 दिसंबर 2000 को जब उनके निधन की खबर आई, तो पूरा बनारस शोक में डूब गया. ठंड की उस शाम रामनगर किले से लेकर नदेसरी कोठी तक लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी. अंतिम दर्शन के लिए शहर के अलग-अलग इलाकों से लोग पहुंचे. मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार के दौरान भी भारी संख्या में लोग मौजूद रहे. सोनारपुरा से लेकर मैदागिन और कबीरचौरा तक लोगों की लंबी कतारें देखने को मिलीं.
बुजुर्गों के मुताबिक, महामना मदन मोहन मालवीय की अंतिम यात्रा के बाद काशी में ऐसा जनसैलाब बहुत कम देखने को मिला था. यह भीड़ किसी राजकीय आदेश या औपचारिक आयोजन के कारण नहीं थी, बल्कि उस इंसान के प्रति लोगों के प्रेम का नतीजा थी, जिसने उनके दिलों में खास जगह बनाई थी.
काशी के हर बड़े उत्सव से जुड़ा रहता था उनका नाम
काशी की संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने में डॉ. विभूति नारायण सिंह की खास भूमिका रही. रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला हो या नाटी इमली का भरत मिलाप, तुलसी घाट की नाग नथैया हो या ध्रुपद मेला, हर बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन में उनकी मौजूदगी को लोग खास महत्व देते थे.
पंचगंगा घाट की देव दीपावली, गौतमेश्वर पूजनोत्सव और पंचकोसी यात्रा जैसे आयोजनों में भी उनकी भागीदारी रहती थी. काशी के लोग इन अवसरों पर उनकी राह देखते थे. उनके पहुंचते ही माहौल में अलग उत्साह दिखाई देने लगता था.
रामनगर किले में वाल्मीकि रामायण का पाठ और वसंत पूजा जैसे धार्मिक आयोजनों में भी वे पूरी श्रद्धा के साथ शामिल होते थे. वे विद्वानों, वेदपाठियों और धर्माचार्यों का बहुत सम्मान करते थे. उनकी दिनचर्या में पूजा-पाठ और संध्या-वंदन का भी खास स्थान था.
शिक्षा और मंदिरों की सेवा को भी दिया महत्व
डॉ. विभूति नारायण सिंह ने सिर्फ धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का काम नहीं किया, बल्कि शिक्षा के प्रसार के लिए भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए. वर्ष 1947 में उन्होंने श्री काशी नरेश एजुकेशन ट्रस्ट की स्थापना की. इसके साथ ही भदोही के ज्ञानपुर में काशी नरेश गवर्नमेंट पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज की नींव रखी गई. ज्ञानपुर और सूरजपुर में उनके नाम से जुड़े शिक्षण संस्थान आज भी उनकी शैक्षिक सोच की याद दिलाते हैं.
काशी विश्वनाथ मंदिर से भी उनका गहरा जुड़ाव रहा. वर्ष 1983 में मंदिर का प्रबंधन ट्रस्ट को सौंपे जाने के बाद वे इसके अध्यक्ष बने. मंदिर की व्यवस्था और धार्मिक परंपराओं से जुड़े कार्यों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही.
प्रिवी पर्स समाप्त होने के बाद भी उन्हें मिलने वाला सम्मान बरकरार रहा. काशी नरेश की उपाधि जीवन के अंतिम समय तक उनके नाम के साथ जुड़ी रही.
राजशाही खत्म हुई, लेकिन लोगों के दिलों में कायम रहा उनका राज
काशी के इतिहास में कई राजा हुए, जिन्होंने अलग-अलग समय में इस नगरी की पहचान को आगे बढ़ाया. लेकिन डॉ. विभूति नारायण सिंह का स्थान इसलिए खास है, क्योंकि उन्होंने बदलते दौर में भी काशी की परंपराओं को टूटने नहीं दिया.
वे एक तरफ वेदों और पुराणों के जानकार थे, तो दूसरी तरफ आधुनिक शिक्षा के समर्थक भी. उन्होंने धर्म और संस्कृति को महत्व दिया, लेकिन शिक्षा और समाज के विकास से भी अपना नाता बनाए रखा.
आज जब उनकी जयंती और जन्मशती वर्ष के अवसर पर उन्हें याद किया जाता है, तो उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा संदेश यही सामने आता है कि किसी व्यक्ति की असली पहचान उसके पद या अधिकार से नहीं बनती. लोगों के प्रति उसका व्यवहार, समाज के लिए उसका योगदान और मुश्किल समय में लिए गए उसके फैसले ही उसे यादगार बनाते हैं.
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.




