PM Modi article on LK Advani journey: देश के वरिष्ठ राजनेता और ‘भारत रत्न’ लालकृष्ण आडवाणी के 100वें वर्ष में प्रवेश करने के उपलक्ष्य में पीएम मोदी द्वारा लिखे गए विशेष लेख (आर्टिकल) के दूसरे हिस्से में भारतीय राजनीति के कई ऐतिहासिक और अनछुए पहलुओं से पर्दा उठा है. प्रधानमंत्री ने बताया कि किस प्रकार आडवाणी जी के जीवन में आधुनिक भारत के इतिहास के कई बड़े अध्याय समाए हुए हैं.
विभाजन का दर्द और शून्य से नई शुरुआत (PM Modi On Lal Krishna Advani political life)
प्रधानमंत्री ने अपने लेख में याद किया कि कैसे 1947 में विभाजन की विभीषिका के दौरान युवा आडवाणी को सिंध में अपना घर और अपनी जानी-पहचानी दुनिया पीछे छोड़कर सब कुछ शून्य से शुरू करना पड़ा था. तमाम कठिन परिस्थितियों के बावजूद उनके भीतर चीजों को नए सिरे से खड़ा करने का अदम्य संकल्प था, जो आगे चलकर जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के निर्माण में साफ दिखाई दिया.
Today, 8th November, is a landmark day. Respected L.K. Advani Ji enters his hundredth year. On this special occasion, my greetings to him.
I’ve written an article in which I’ve highlighted his everlasting contribution to India.
I have recalled his journey, be it experiencing the horrors of Partition and rebuilding life from scratch, strengthening the Jana Sangh and building the BJP, standing up for democracy during the Emergency, leading the Somnath to Ayodhya Rath Yatra or serving the nation in government.
Have also written about other aspects of Advani Ji – the voracious reader, his love for culture and cinema, a prolific writer and more.
English – https://t.co/tc77ZVhRdo
हिंदी – https://t.co/t0JSavOopX
— Narendra Modi (@narendramodi) November 8, 2026
अटल और आडवाणी की अटूट जोड़ी
लेख में सबसे खास जिक्र अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के ऐतिहासिक और गहरे रिश्ते का है. प्रधानमंत्री ने लिखा कि राजनीति में अक्सर महत्वाकांक्षाएं टकरा जाती हैं और साथ चलने वाले रास्ते बदल लेते हैं, लेकिन अटल और आडवाणी की पांच-छह दशकों की लंबी यात्रा एक-दूसरे के प्रति अटूट विश्वास, सम्मान और सहयोग की एक बेमिसाल दास्तान है.
छद्म धर्मनिरपेक्षता पर बेबाक रुख
पीएम मोदी ने आडवाणी जी के व्यक्तित्व की दो प्रमुख विशेषताओं को रेखांकित करते हुए लिखा कि उनकी वैचारिक स्पष्टता, बौद्धिक प्रखरता और उनके लिखे प्रस्ताव आज भी राजनीति को समझने के लिए अमूल्य हैं. इसके साथ ही, भारतीय राजनीति में लंबे समय से चली आ रही छद्म धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ उनका निर्भीक रुख राजनीतिक विमर्श की एक बड़ी वास्तविकता को उजागर करता है.
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गांधीनगर से ‘घर वापसी’ और संसदीय सफर
1991 के लोकसभा चुनावों को याद करते हुए पीएम मोदी ने लिखा कि जब आडवाणी ने गांधीनगर सीट से चुनाव लड़ा, तो वह उनके लिए एक प्रकार से ‘घर वापसी’ जैसा था, क्योंकि उनके पिता विभाजन के बाद कच्छ में आकर बसे थे. संसद के दोनों सदनों में विपक्ष के नेता के रूप में और एक सांसद के तौर पर उनकी सक्रिय भागीदारी आज भी भारतीय संसदीय इतिहास में एक मिसाल मानी जाती है.
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