एशियाई खेलों का आयोजन शुरू होते ही भारतीय खेल प्रशंसकों की उम्मीदें भी बढ़ जाती हैं. हर बार लगता है कि इस बार भारत कुछ नए खेलों में आगे आएगा, नए खिलाड़ी चमकेंगे और मेडल की संख्या में बड़ा उछाल देखने को मिलेगा. लेकिन प्रतियोगिता खत्म होते-होते एक सवाल फिर सामने खड़ा हो जाता है. आखिर भारत उस मुकाम तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा, जहां एशिया की बड़ी खेल ताकतें पहले से मौजूद हैं?
मुद्दा सिर्फ उन खेलों का नहीं है, जहां भारत से मेडल की उम्मीद कम होती है. चिंता उन स्पर्धाओं को लेकर भी है, जहां भारतीय खिलाड़ियों के पास अच्छा मौका होता है, लेकिन आखिरी दौर में प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहता. यह किसी एक एशियाई खेल की समस्या नहीं है. इसके पीछे कई सालों से चली आ रही सामाजिक सोच, खेल व्यवस्था और प्रशिक्षण संस्कृति का असर दिखाई देता है.
चीन से तुलना क्यों होती है?
भारत और चीन दोनों एशिया के बड़े देश हैं. दोनों की आबादी विशाल है और दोनों ने लगभग एक ही दौर में आधुनिक राष्ट्र के रूप में अपनी यात्रा आगे बढ़ाई. फिर भी खेलों की दुनिया में दोनों के प्रदर्शन के बीच बहुत बड़ा अंतर दिखाई देता है.
चीन ने कई दशकों में खेलों को स्कूल स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक एक व्यवस्थित ढांचे में विकसित किया. भारत में यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी रही. इसलिए यह अंतर केवल पैसे, आबादी या खिलाड़ियों की संख्या का मामला नहीं है. इसके पीछे खेलों को लेकर सोच, सरकारी प्राथमिकताएं, प्रशिक्षण की निरंतरता और प्रतिभाओं को तैयार करने की व्यवस्था जैसे कई पहलू जुड़े हैं.
हमारे समाज में लंबे समय तक पढ़ाई को ही सुरक्षित भविष्य का सबसे भरोसेमंद रास्ता माना गया. बच्चों से कहा जाता रहा “पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे हो जाओगे खराब.”
यह सोच सिर्फ एक कहावत तक सीमित नहीं थी. इसका असर परिवारों और स्कूलों के फैसलों में भी दिखता था. खेल को अक्सर शौक समझा गया, करियर नहीं. अगर बच्चा घंटों मैदान में रहना चाहता था, तो कई माता-पिता की पहली चिंता यही होती थी कि उसकी पढ़ाई पीछे न छूट जाए.
नतीजा यह हुआ कि देश में प्रतिभाएं तो थीं, लेकिन उन्हें कम उम्र से पहचानने और लंबे समय तक तराशने की संस्कृति मजबूत नहीं बन पाई.
क्रिकेट की चमक और बाकी खेल
दूसरी बड़ी चुनौती क्रिकेट के इर्द-गिर्द बना विशाल आर्थिक और सामाजिक आकर्षण है. क्रिकेट ने भारत को विश्व खेल मंच पर एक अलग पहचान दिलाई है. इसमें कोई संदेह नहीं कि इस खेल ने देश में खेल संस्कृति को लोकप्रिय बनाया है. लेकिन इसके साथ यह भी सच है कि दूसरे खेलों को उतना ध्यान, पैसा और दर्शक नहीं मिल पाए.
किसी बच्चे के खिलाड़ी बनने की बात होती है तो कई परिवारों की पहली पसंद क्रिकेट ही होती है. बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक क्रिकेट अकादमियों और मैदानों की मांग दिखाई देती है. सवाल यह है कि अगर इसी स्तर की दिलचस्पी और निवेश एथलेटिक्स, तैराकी, कुश्ती, जिम्नास्टिक, तलवारबाजी, शूटिंग या दूसरे ओलंपिक खेलों में भी पहुंचे, तो क्या भारत की पदक संभावनाएं नहीं बढ़ सकतीं?
यहां समस्या क्रिकेट को कमतर आंकने की नहीं, बल्कि बाकी खेलों के लिए भी समान रूप से मजबूत रास्ते तैयार करने की है.
भारत में किसी खिलाड़ी के पदक जीतते ही माहौल बदल जाता है. टीवी चैनलों पर चर्चा, सोशल मीडिया पर बधाइयां और सरकारी सम्मान—सब कुछ तेजी से सामने आ जाता है. यह खिलाड़ियों के सम्मान और प्रोत्साहन के लिहाज से अच्छी बात है.
लेकिन असली सवाल पदक जीतने के बाद नहीं, उससे कई साल पहले पूछा जाना चाहिए.
खिलाड़ी को किस उम्र में पहचाना गया? उसे किस स्तर की कोचिंग मिली? उसके पास अंतरराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग और सुविधाएं थीं या नहीं? उसे लगातार बेहतर प्रतिद्वंद्वियों के साथ खेलने का मौका मिला या नहीं?
अगर इन सवालों पर तैयारी कमजोर है, तो सिर्फ प्रतियोगिता के समय पदक की उम्मीद करना मुश्किल होगा.
कांस्य के बाद संतुष्टि या गोल्ड की तैयारी?
एक और महत्वपूर्ण पहलू पुरस्कार और पहचान का है. भारत में किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में कांस्य या रजत पदक जीतना भी खिलाड़ी के लिए आर्थिक और सामाजिक रूप से बहुत बड़ा बदलाव ला सकता है. यह जरूरी भी है कि खिलाड़ियों को उनके प्रदर्शन के लिए सम्मान और आर्थिक सुरक्षा मिले.
लेकिन खेल व्यवस्था को यह सुनिश्चित करना होगा कि पुरस्कार की संस्कृति और उच्च प्रदर्शन की संस्कृति के बीच संतुलन बना रहे. खिलाड़ी को सिर्फ पदक जीतने के लिए नहीं, बल्कि लगातार अपने प्रदर्शन का स्तर ऊपर ले जाने के लिए तैयार करना जरूरी है.
मनु भाकर जैसी खिलाड़ियों की सफलता बताती है कि जब किसी खिलाड़ी को बड़े मंच पर लगातार प्रदर्शन का मौका मिलता है, तो उसका प्रभाव कितना व्यापक हो सकता है. लेकिन किसी एक खिलाड़ी की सफलता को पूरी व्यवस्था की सफलता मान लेना पर्याप्त नहीं होगा. असली बदलाव तब माना जाएगा, जब हर बड़े खेल में ऐसी कई प्रतिभाएं तैयार हों.
दुनिया की बड़ी खेल ताकतों की एक खासियत यह है कि वहां किसी एक खिलाड़ी की जगह पहले से कोई दूसरा खिलाड़ी तैयार रहता है. एक खिलाड़ी चोटिल हुआ या खराब फॉर्म में गया, तो टीम के पास उसकी जगह लेने वाला मजबूत विकल्प मौजूद होता है.
इस प्रतिस्पर्धा का फायदा सीधे खिलाड़ी को मिलता है. उसे पता होता है कि प्रदर्शन गिरा तो टीम में जगह पक्की नहीं है. इसलिए वह खुद को लगातार बेहतर बनाने की कोशिश करता है.
भारत के कई खेलों में अभी ऐसी गहराई पैदा नहीं हुई है. हमें सिर्फ एक-दो प्रतिभाशाली खिलाड़ियों पर निर्भर रहने के बजाय हर स्पर्धा में खिलाड़ियों की पूरी दूसरी और तीसरी कतार तैयार करनी होगी.
अब आगे का रास्ता क्या है?
सरकार, खेल संघों, राज्यों, निजी संस्थानों और क्रिकेट से जुड़े बड़े संगठनों—सभी की इसमें भूमिका हो सकती है. जरूरत सिर्फ नए स्टेडियम बनाने की नहीं, बल्कि ऐसे पूरे सिस्टम की है जिसमें खिलाड़ी को बचपन से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक लगातार प्रशिक्षण और सही मार्गदर्शन मिलता रहे.
राज्यों को भी केवल पदक जीतने के बाद सम्मान समारोह आयोजित करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. प्रतिभाओं की पहचान पहले होनी चाहिए. फिर उन्हें कई वर्षों तक अच्छी कोचिंग, फिटनेस सपोर्ट, पोषण, प्रतियोगिताओं और अंतरराष्ट्रीय अनुभव की सुविधा मिलनी चाहिए.
आखिर किसी एशियाई खेल या ओलंपिक में पदक की तैयारी प्रतियोगिता शुरू होने के कुछ महीने पहले नहीं होती. उसकी नींव कई साल पहले रखी जाती है.
और सबसे बड़ा बदलाव समाज में होना चाहिए. बच्चों को यह भरोसा मिलना चाहिए कि खेल भी करियर हो सकता है. हर बच्चा क्रिकेटर बने, यह जरूरी नहीं. कोई एथलीट बन सकता है, कोई तैराक, कोई पहलवान, कोई निशानेबाज और कोई किसी ऐसे खेल में देश का नाम रोशन कर सकता है, जिसके बारे में आज बहुत कम लोग जानते हैं.
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