BRICS से भारत को क्या मिला?
India China Trade Imbalance: नई दिल्ली में BRICS का मंच सजा है. एक तरफ व्लादिमीर पुतिन, शी जिनपिंग, प्रबोवो सुबियांतो और अबी अहमद जैसे नेता भारत की मेजबानी में एक ही टेबल पर हैं, दूसरी तरफ दुनिया यह सवाल पूछ रही है, भारत को इस बड़े वैश्विक जमावड़े से आखिर मिला क्या?
क्या BRICS अमेरिका और पश्चिम के वर्चस्व को चुनौती देने वाला नया ध्रुव बन रहा है? या भारत के लिए यह उससे कहीं अधिक व्यावहारिक मंच है, जहां वह अमेरिका के साथ अपनी साझेदारी भी जारी रख सकता है और रूस-चीन के साथ संवाद के दरवाजे भी खुले रख सकता है? भारत की कहानी शायद इन दोनों के बीच है.
BRICS भारत के लिए गठबंधन नहीं, रणनीतिक स्पेस है. नई दिल्ली BRICS को NATO जैसे सैन्य गठबंधन या किसी पश्चिम-विरोधी मोर्चे के रूप में नहीं देखती. भारत के लिए BRICS की असली उपयोगिता है, रणनीतिक स्वायत्तता. एक ही मंच पर रूस और चीन हैं, लेकिन भारत अमेरिका, यूरोप, जापान और QUAD के साथ भी अपनी रणनीतिक साझेदारी जारी रख सकता है.
यानी भारत का संदेश साफ है: ‘हम किसी एक खेमे में नहीं हैं, लेकिन हर महत्वपूर्ण शक्ति-केंद्र से बात करने की स्थिति में हैं.’
यही BRICS भारत को देता है, एक अतिरिक्त कूटनीतिक कमरा, जहां नई दिल्ली अपनी शर्तों पर बातचीत कर सकती है.
सबसे बड़ा फायदा, चीन से सीधे संवाद का रास्ता
BRICS की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद कोई आर्थिक घोषणा नहीं, बल्कि मोदी-शी संवाद हो सकता है. 2020 के गलवान संकट के बाद भारत-चीन संबंधों में जो अविश्वास पैदा हुआ, उसने सिर्फ सीमा को प्रभावित नहीं किया, बल्कि व्यापार, निवेश, वीजा, आपूर्ति श्रृंखला और रणनीतिक संबंधों पर भी असर डाला, लेकिन अब दोनों देशों ने धीरे-धीरे संवाद बहाल करने के संकेत दिए हैं.
BRICS के दौरान मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात में व्यापार, कनेक्टिविटी और आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने की बात हुई, हालांकि सीमा विवाद और व्यापार असंतुलन अभी भी बड़ी चुनौतियां हैं.
यहां भारत का हित बेहद व्यावहारिक है.
- सीमा पर तनाव कम हो, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता न हो.
- चीन से व्यापार बढ़े, लेकिन निर्भरता न बढ़े.
- और दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा रहे, लेकिन वह स्थायी टकराव में न बदले.
- अगर BRICS भारत और चीन के बीच इस सीमित लेकिन महत्वपूर्ण संवाद का मंच बनता है, तो यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि होगी.
लेकिन यहां कहानी का दूसरा चेहरा है, $226 अरब का घाटा और यहीं BRICS का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है. BRICS भारत के लिए बड़ा व्यापारिक बाजार बन रहा है, लेकिन अभी तक भारत के लिए यह उतना बड़ा निर्यात बाजार नहीं बन पाया है.
FY2025-26 में भारत ने BRICS के बाकी 10 देशों को लगभग $95.7 अरब का माल निर्यात किया, जबकि वहां से $321.8 अरब का माल आयात किया. यानी भारत का व्यापार घाटा: $226.1 अरब है.
यह घाटा सिर्फ बड़ा नहीं है, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है. FY2020-21 में भारत का BRICS देशों के साथ व्यापार घाटा करीब $74.5 अरब था. पांच साल में यह बढ़कर $226.1 अरब हो गया. इसी अवधि में भारत का BRICS के साथ कुल माल व्यापार लगभग $203 अरब से बढ़कर $417.5 अरब हो गया. यानी BRICS के साथ व्यापार बढ़ा जरूर है, लेकिन भारत की जेब से ज्यादा पैसा बाहर गया है.
भारत BRICS से क्या खरीद रहा है?
इस घाटे की सबसे बड़ी वजह चीन है. FY2024-25 में अकेले चीन से भारत का माल आयात करीब $113.46 अरब रहा, जबकि भारत का निर्यात सिर्फ $14.25 अरब था. रूस से भारत ने करीब $63.84 अरब का आयात किया, जबकि निर्यात सिर्फ $4.88 अरब रहा.
UAE से भी भारत का आयात करीब $63.42 अरब रहा, जबकि निर्यात $36.64 अरब था. सऊदी अरब, इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका के साथ भी भारत को व्यापार घाटा है. अर्थात BRICS भारत के लिए सिर्फ बाजार नहीं है. यह भारत की ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, कच्चे माल और औद्योगिक आपूर्ति का बड़ा स्रोत भी बन चुका है.
चीन, BRICS की ताकत भी, भारत की चुनौती भी
BRICS के भीतर चीन की आर्थिक ताकत इतनी बड़ी है कि वह पूरे समूह के व्यापारिक ढांचे पर असर डालता है. यही भारत के लिए अवसर और चुनौती दोनों है.
भारत चीन से मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन और औद्योगिक सामान बड़े पैमाने पर खरीदता है. दूसरी तरफ भारत के चीन को निर्यात का बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत कम मूल्यवर्धित वस्तुओं पर निर्भर है.
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत चीन से कितना व्यापार करता है?. असल सवाल है कि भारत चीन को क्या बेचता है और चीन से क्या खरीदता है? यहीं व्यापार संतुलन की असली समस्या छिपी है.
रूस, घाटा है, लेकिन गणित अलग है
रूस के मामले में तस्वीर कुछ अलग है. भारत रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा और अन्य वस्तुओं का आयात करता है. यूक्रेन युद्ध के बाद रूस का चीन पर आर्थिक झुकाव बढ़ा है, इसलिए भारत के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि रूस के साथ उसके सीधे रणनीतिक और आर्थिक संबंध कमजोर न हों.
नई दिल्ली की कोशिश यही है कि रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध बने रहें, लेकिन रूस-चीन संबंध ही मॉस्को की एशिया नीति का एकमात्र आधार न बन जाए. BRICS इस लिहाज से भारत को एक अतिरिक्त कूटनीतिक रास्ता देता है. तो आखिर भारत को BRICS से क्या मिला? इसका जवाब सिर्फ डॉलर में नहीं दिया जा सकता.
भारत को BRICS से मिला है:
- रूस तक सीधी पहुंच.
- चीन से संवाद का मंच.
- Global South में नेतृत्व का अवसर.
- नए बाजारों तक पहुंच.
- स्थानीय मुद्रा और भुगतान विकल्पों की संभावना.
- और सबसे महत्वपूर्ण, अमेरिका तथा पश्चिम के साथ संबंध बनाए रखते हुए रूस और चीन के साथ संवाद करने की रणनीतिक स्वतंत्रता.
लेकिन इसके साथ एक बड़ा बिल भी आया है: $226.1 अरब का व्यापार घाटा. इसलिए भारत के लिए BRICS की अगली परीक्षा कोई बड़ी राजनीतिक घोषणा नहीं होगी.
असली परीक्षा यह होगी कि: क्या नई दिल्ली BRICS को ‘आयात का क्लब’ से ‘भारतीय निर्यात का बाजार’ बना सकती है? क्योंकि अगर BRICS भारत को रणनीतिक ताकत देता है, लेकिन व्यापार में लगातार कमजोरी पैदा करता है, तो तस्वीर अधूरी है. और अगर भारत कूटनीति को व्यापार से जोड़ पाए, तो BRICS भारत के लिए सिर्फ अमेरिका के वर्चस्व को चुनौती देने वाला मंच नहीं रहेगा, बल्कि भारत के अपने वैश्विक प्रभाव को बढ़ाने का मंच बन सकता है.
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यही शायद BRICS में भारत की असली रणनीति है: न किसी खेमे का हिस्सा बनना, न किसी खेमे से लड़ना. बल्कि हर खेमे के बीच अपनी जगह इतनी मजबूत करना कि भारत के बिना कोई भी बड़ी वैश्विक व्यवस्था अधूरी लगे.
-भारत एक्सप्रेस
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