Brigadier Mohammad Usman Martyrdom Day: आज ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान, एमवीसी की शहादत दिवस है. भारतीय सेना के इस महान सपूत को ‘नौशेरा का शेर’ के नाम से जाना जाता है. जिया उस सलाम और आनंद मिश्रा द्वारा लिखित पुस्तक The Lion of Naushera (ब्लूम्सबरी) में उनकी वीर गाथा को जीवंत रूप से प्रस्तुत किया गया है. यह मात्र एक सैन्य कहानी नहीं बल्कि देशभक्ति, धर्मनिरपेक्षता और स्वतंत्र भारत के प्रति अटूट समर्पण की मिसाल है.
बचपन से ही कूट-कूट कर भरी थी बहादुरी
15 जुलाई 1912 को उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के बिबीपुर गांव में जन्मे मोहम्मद उस्मान का परिवार सेवा भावना से ओत-प्रोत था. उनके पिता पुलिस अधिकारी थे. वाराणसी में शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने मात्र 12 वर्ष की आयु में एक डूबते बच्चे को कुएं में कूदकर बचाया. सिविल सेवा की बजाय सैन्य जीवन चुनते हुए वे रॉयल मिलिट्री एकेडमी सैंडहर्स्ट पहुंचे जहां 1934 में कमीशन प्राप्त किया. 5/10 बलूच रेजिमेंट में तैनात होकर उन्होंने उत्तर-पश्चिम सीमा और द्वितीय विश्व युद्ध में बर्मा में बहादुरी दिखाई.
ठुकराया पाकिस्तान का आर्मी चीफ बनने का ऑफर
1947 के विभाजन के समय मुस्लिम अधिकारी होने के बावजूद पाकिस्तान की ओर से आर्मी चीफ बनने जैसे लुभावने प्रस्तावों को ठुकराकर उन्होंने भारत का साथ चुना. उनका फैसला देश के प्रति अटूट प्रेम से प्रेरित था. डॉगरा रेजिमेंट में स्थानांतरित होकर उन्होंने भारतीय सेना और संविधान की धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक बनकर देश की सेवा की.
कसम खाई और बन गए ‘नौशेरा के शेर’
1947-48 के भारत-पाक युद्ध में ब्रिगेडियर उस्मान 50वीं पैराशूट ब्रिगेड की कमान संभाल रहे थे. दिसंबर 1947 में जब पाकिस्तानी कबायली हमलावरों ने सामरिक रूप से महत्वपूर्ण झंगड़ पर कब्जा कर लिया, तो उस्मान ने कसम खाई कि झंगड़ वापस लिए बिना बिस्तर पर नहीं सोएंगे. जनवरी-फरवरी 1948 में नौशेरा की रक्षा करते हुए उन्होंने भारी संख्या में दुश्मनों पर हमला किया. भारतीय सैनिकों ने दुश्मन को लगभग 2000 हताहत पहुंचाए, जबकि खुद के नुकसान न्यूनतम रहे. इस बहादुरी के लिए उन्हें ‘नौशेरा का शेर’ का खिताब मिला. पाकिस्तान ने उनके सिर की कीमत रखी, लेकिन वे अडिग रहे.
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मातृभूमि की रक्षा में सर्वोच्च बलिदान
फरवरी 1948 में उन्होंने झंगड़ वापस छीन लिया. मई-जून 1948 में पाकिस्तानी नियमित सेना और भारी तोपखाने के हमलों के बावजूद उन्होंने मोर्चा संभाला. 3 जुलाई 1948 को, अपने 36वें जन्मदिन से मात्र 12 दिन पहले, झंगड़ की रक्षा करते हुए दुश्मन की 25-पाउंडर शेल से वे शहीद हो गए. उनकी अंतिम इच्छा थी- “मैं मर रहा हूं, लेकिन जिस धरती के लिए हम लड़ रहे थे, उसे दुश्मन के हवाले न होने दो.”
राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई
मरणोपरांत उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. वे इस युद्ध में शहीद होने वाले सबसे उच्च रैंकिंग भारतीय अधिकारी थे. दिल्ली में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कब्रिस्तान में उन्हें राजकीय सम्मान के साथ दफनाया गया. प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, मंत्रिमंडल और तीनों सेनाध्यक्षों ने उनके अंतिम संस्कार में हिस्सा लिया.
पुस्तक The Lion of Naushera में उनकी बहादुरी के साथ-साथ उनके मानवीय पहलुओं को भी उजागर किया गया है. वे शाकाहारी थे, गरीब बच्चों की शिक्षा पर खर्च करते थे और मस्जिद में छिपे हमलावरों पर गोली चलाने का आदेश देते हुए कहा था कि जब वहां धर्म के नाम पर आक्रांता छिपे हों तो वह जगह पवित्र नहीं रहती.
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-भारत एक्सप्रेस
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