Current Education System: सभी जानते हैं कि शिक्षा को ज्ञान का दीपक माना जाता है. लेकिन आज के युग में वास्तविकता यह है कि हमारी मौजूदा शिक्षा व्यवस्था एक ऐसा जाल बन गई है जिसमें लाखों-करोड़ों युवा फंस रहे हैं. यह प्रणाली न तो सच्चे कौशल विकसित करती है और न ही नवाचार को प्रोत्साहित करती है. बल्कि यह छात्रों को एक सांचे में ढालकर औसत जीवन की ओर धकेल रही है. बदलाव की मांग अब न केवल जरूरी बल्कि अनिवार्य बन चुकी है. तो ऐसा क्या किया जाए कि देश की युवा पीढ़ी शिक्षित भी बनें और अपने पसंद के क्षेत्र में निपुण भी बनें.
सफल उद्यमियों की कहानियां गवाह हैं कि बड़ी कंपनियों के संस्थापकों ने अक्सर पारंपरिक शिक्षा के इस जाल से खुद को बचाया. उनकी सफलता का राज रट्टा मारने या परीक्षा में अंक लाने में नहीं, बल्कि व्यावहारिक सोच, जोखिम लेने की क्षमता और निरंतर सीखने में छिपा है. इसके विपरीत, हमारी शिक्षा प्रणाली अमीर और गरीब के बीच खाई को और चौड़ा कर रही है. अमीर बच्चे बेहतर संसाधनों और अतिरिक्त कोचिंग के साथ आगे बढ़ते हैं, जबकि गरीब परिवार के बच्चे सीमित अवसरों में संघर्ष करते रह जाते हैं.
रचनात्मकता कुचली जा रही?
शिक्षा की इस व्यवस्था में रचनात्मकता को कुचला जा रहा है. उदाहरण के लिए अधिकतर कक्षाओं में बच्चों को सरल दृश्य बनाने या मानकीकृत उत्तर लिखने को कहा जाता है, न कि स्वतंत्र सोच विकसित करने को. परिणामस्वरूप, वे किसी बड़े कारखाने की असेंबली लाइन से निकलने वाले उत्पादों की तरह एक जैसे बन जाते हैं. ‘तारे ज़मीन पर’ और ‘थ्री इडियट्स’ जैसी फिल्में भले ही सफलता से बेहतर उत्कृष्टता का संदेश देती हों, लेकिन समाज और परिवार अभी भी प्रतिशत और रैंकिंग की दौड़ में बच्चों को धकेल रहे हैं. ऐसे में जीवन को ‘दौड़’ बताकर तनाव बढ़ाया जा रहा है, जबकि वास्तव में हर बच्चे की अपनी गति और प्रतिभा होती है, जिस पर कोई ध्यान ही नहीं देता.
उल्लेखनीय है कि इस व्यवस्था की जड़ें ब्रिटिश काल से जुड़ी हैं, जब 1835 में एक नीति बनाई गई जिसका उद्देश्य सच्चा सशक्तिकरण नहीं बल्कि आज्ञाकारी नागरिक तैयार करना था. आज भी स्कूल और कॉलेज उन पूर्वनिर्धारित भूमिकाओं के लिए ग्रेजुएट तैयार कर रहे हैं, न कि नवप्रवर्तक या नेता. ग्रेडिंग सिस्टम बुद्धिमत्ता को केवल परीक्षा अंकों तक सीमित कर देता है, जबकि संचार, समझौता कौशल और समस्या-समाधान जैसे जीवन-महत्वपूर्ण गुणों की उपेक्षा की जाती है.
डिग्री से कौशल की ओर मुड़ें
आपको याद होगा जब 2025 में राजस्थान के चपरासी/चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के 53,000 पदों की भर्ती के लिए करीब 25 लाख युवाओं ने आवेदन किया था. इनमें से लगभग 85% से 90% उम्मीदवार उच्च शिक्षित (ग्रेजुएट, पोस्ट-ग्रेजुएट, बीटेक और पीएचडी) थे. इस जाल का सबसे दर्दनाक पहलू मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रभाव है. नौकरी न मिलने की निराशा से हर साल हजारों छात्र आत्महत्या कर लेते हैं या गुनाह का रास्ता अपना लेते हैं. आईआईटी जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में दाखिला पाने की होड़ में व्यक्तिगत रुचि और क्षमता को नजरअंदाज किया जाता है, जिससे जलन और हताशा बढ़ती है. ऐसा कहना ग़लत नहीं होगा कि, शिक्षा डिग्री-केंद्रित हो गई है, कौशल-केंद्रित नहीं.
इसलिए समय आ गया है कि हम डिग्री से कौशल की ओर मुड़ें. रट्टा मारने की बजाय अवधारणात्मक समझ, व्यावहारिक उदाहरण और समस्या-समाधान पर जोर दिया जाए. वित्तीय शिक्षा अनिवार्य हो. बच्चों को एसेट-लायबिलिटी का अंतर, मुद्रास्फीति से लड़ना, निवेश बनाम खर्च और जल्दी बचत करने का महत्व सिखाया जाए. स्कूलों में कोडिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल मार्केटिंग और आर्थिक मामलों जैसे भविष्योन्मुखी विषयों को भी शामिल किया जाए.
इसके साथ ही बिजनेस सिमुलेशन प्रोजेक्ट्स शुरू किए जाएं ताकि बच्चे नौकरी मांगने वाले नहीं बल्कि नौकरियां पैदा करने वाले बनें. जोखिम लेने की क्षमता विकसित करने के लिए गणना-आधारित प्रयोगों को प्रोत्साहन मिले. हमारे शिक्षक इस व्यवस्था की रीढ़ हैं, इसलिए उनका नियमित प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरणों से लैस होना और प्रदर्शन-आधारित मूल्यांकन जरूरी है. प्रेरित शिक्षक सैकड़ों जीवन बदल सकते हैं.
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शिक्षा के नए आयाम अपनाने की जरूरत
आज के भाग-दौड़ भरे युग में मानसिक स्वास्थ्य और जीवन कौशल भी शिक्षा का हिस्सा बनें. बच्चे एक ओर गणित सीखते हैं, लेकिन तनाव प्रबंधन नहीं. समय प्रबंधन, नागरिकता भावना, संचार कौशल सातवीं कक्षा से अनिवार्य हों. संचार की मजबूती ही समाज में सम्मान या अपमान तय करती है. शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी दिलाना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, रचनात्मकता और स्वतंत्र सोच विकसित करना होना चाहिए. प्राचीन भारतीय गुरुकुल प्रणाली में हर छात्र की व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार शिक्षा दी जाती थी. उसी पद्धति को आधुनिक संदर्भ में अपनाने की जरूरत है.
वर्तमान शिक्षा प्रणाली ने लाखों युवाओं को औसत जीवन की ओर धकेला है. लेकिन जागरूकता और सुधार से हम इस जाल से बाहर निकल सकते हैं. सरकार, शिक्षाविद्, अभिभावक और समाज को मिलकर काम करना होगा. तभी हमारा युवा वर्ग न केवल आत्मनिर्भर बनेगा बल्कि राष्ट्र-निर्माण में योगदान देगा. बदलाव अब विलंब सहन नहीं कर सकता. सभी को मिलकर ऐसा करना होगा कि शिक्षा ज्ञान का स्रोत बने, न कि जाल.
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-भारत एक्सप्रेस
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