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ईंधन की प्यास, गांवों में अकाल; क्या E20 एथेनॉल पॉलिसी देश को जल संकट की ओर धकेल रही है?

भारत की एथेनॉल ब्लेंडिंग पॉलिसी (EBP) का लक्ष्य पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाकर तेल आयात घटाना, किसानों की आय बढ़ाना और प्रदूषण कम करना है.

भारत सरकार की एथेनॉल ब्लेंडिंग पॉलिसी (EBP) एक महत्वाकांक्षी कदम है. इसका लक्ष्य पेट्रोल में 20% एथेनॉल (E20) मिलाना है, जो तेल आयात कम करने, किसानों की आय बढ़ाने और प्रदूषण घटाने के लिए प्रचारित किया जा रहा है. E20 लक्ष्य पहले ही हासिल हो चुका है या बहुत करीब है, लेकिन हालिया रिपोर्ट्स और विशेषज्ञ चेतावनियां एक बड़े सवाल को उठा रही हैं: क्या यह ‘हरित’ ईंधन छिपा जल संकट पैदा कर रहा है?

एथेनॉल उत्पादन का जल फुटप्रिंट

एथेनॉल मुख्य रूप से गन्ना, चावल और मक्के से बनता है. इन फसलों की खेती और प्रसंस्करण में भारी मात्रा में पानी लगता है:

  • चावल-आधारित एथेनॉल: 1 लीटर एथेनॉल के लिए लगभग 10,000-10,790 लीटर पानी.
  • मक्का: लगभग 4,670 लीटर.
  • गन्ना: 2,860-3,636 लीटर.

ये आंकड़े मुख्य रूप से खेती (सिंचाई) के पानी को शामिल करते हैं. रिपोर्ट्स में चेतावनी दी गई है कि गन्ना और चावल पहले से ही भारत के कुल सिंचाई पानी का 70-80% इस्तेमाल करते हैं. एथेनॉल उत्पादन क्षमता बढ़ने के साथ पानी के संसाधनों पर दबाव और बढ़ेगा.

गांवों पर प्रभाव: जलभर और कृषि संकट

सबसे ज्यादा प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों और किसानों पर पड़ेगा:

महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक जैसे गन्ना-बहुल राज्यों में पहले से जल संकट है. सूखा-प्रभावित इलाकों में गन्ना खेती बढ़ने से भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है. एक टन गन्ने की खेती में लाखों लीटर पानी लग सकता है. अतिरिक्त गन्ना उत्पादन के लिए ज्यादा सिंचाई, बिजली (पंपिंग) और रसायनों की जरूरत पड़ेगी, जो मिट्टी की उर्वरता घटाएगी और लवणता बढ़ाएगी.

दूसरी फसलों (जैसे दालें, अनाज) के लिए जमीन और पानी कम हो सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी. सरप्लस चावल या मोलासेस (गन्ना उप-उत्पाद) से बनाने पर कुछ बचत हो सकती है, लेकिन स्केल बढ़ने पर नई खेती की जरूरत पड़ेगी. ग्रामीण अर्थव्यवस्था को शुरू में फायदा (किसानों को बेहतर दाम), लेकिन लंबे समय में पानी की कमी से खेती प्रभावित होगी और पलायन बढ़ सकता है.

शहरों पर प्रभाव: अप्रत्यक्ष लेकिन गंभीर

शहरों में सीधा जल संकट कम दिखेगा, लेकिन:

  • ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों को पानी की आपूर्ति प्रभावित होगी.
  • भोजन की कीमतें बढ़ सकती हैं अगर फूड-फ्यूल ट्रेड-ऑफ बढ़ा.
  • वाहन ईंधन सस्ता/स्वच्छ हो सकता है, लेकिन कुल पर्यावरणीय लागत (water + land) ज्यादा होगी.
  • लंबे समय में जल संकट से कृषि उत्पादन घटा तो शहरों में महंगाई और आपूर्ति चेन प्रभावित होगी.

पॉलिसी के फायदे भी कम नहीं

  • तेल आयात में बचत (अरबों डॉलर).
  • किसानों की अतिरिक्त आय.
  • वाहन उत्सर्जन में कुछ कमी.
  • ऊर्जा सुरक्षा.

लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि बिना सतत उपायों के ये फायदे अल्पकालिक साबित हो सकते हैं.

समाधान और सुझाव

  • दूसरी पीढ़ी का एथेनॉल (crop residue, waste से) बढ़ावा दें- पानी का इस्तेमाल बहुत कम.
  • मक्का और कम पानी वाली फसलों को प्रोत्साहन
  • ड्रिप इरिगेशन, माइक्रो इरिगेशन अनिवार्य करें गन्ना क्षेत्रों में.
  • गन्ने के जूस vs मोलासेस पर बैलेंस्ड अप्रोच.
  • व्यापक जल-ऊर्जा-खाद्य nexus अध्ययन कर पॉलिसी अपडेट करें.

एथेनॉल ब्लेंडिंग ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है, लेकिन इसे “जल-तटस्थ” बनाने की जरूरत है. बिना सावधानी के यह गांवों पर सबसे भारी पड़ेगा जहां पानी पहले से दबाव में है. शहर भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होंगे. नीति-निर्माताओं को फायदे के साथ-साथ लंबे समय के पर्यावरणीय और सामाजिक खर्चों को भी तौलना चाहिए. सस्टेनेबल विकास तभी संभव है जब हम ईंधन बचाने के चक्कर में पानी न गंवा दें.

ये भी पढ़ें: पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग से क्या होगा?

-भारत एक्सप्रेस 



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