Kargil Vijay Diwas 2026: ताशी नामग्याल को जानते हैं? लद्दाख के इस साधारण चरवाहे ने 1999 के दौरान बटालिक सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठ की सूचना भारतीय सेना को दी थी. इसके बाद जो हुआ, वह इतिहास बन गया.
मई 1999 की शुरुआत में, गारकोन गांव के ताशी नामग्याल अपनी खोई हुई याक की तलाश में बटालिक की ऊंची पहाड़ियों पर निकले थे. वहां उन्होंने पथानी पोशाक में सैनिकों को बंकर खोदते देखा. वे हथियार भी लिए हुए थे. स्थिति की गंभीरता समझते हुए ताशी ने तुरंत भारतीय सेना को सूचना दी. उनकी इस सतर्कता ने सेना को समय रहते अलर्ट कर दिया. इससे पाकिस्तान की योजना को झटका लगा, जो श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग को काटने की कोशिश कर रहा था. ताशी नामग्याल की यह भूमिका कारगिल युद्ध में भारत की जीत में महत्वपूर्ण साबित हुई.
लद्दाख में अमर शहीदों के शौर्य की जीवंत गाथा
लेह में भारतीय सेना का ‘हॉल ऑफ फेम’ संग्रहालय इन वीर गाथाओं का जीवंत गवाह है. यहां ताशी नामग्याल से लेकर कैप्टन सौरभ कालिया, कैप्टन विक्रम बत्रा (‘शेरशाह’), कैप्टन विजयंत थापर और लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे जैसे वीरों के शौर्य और सर्वोच्च बलिदान की कहानियां सुरक्षित हैं. दीवारों पर लगे चित्र, दस्तावेज और स्मृतियां याद दिलाती हैं कि कैसे इन जांबाजों ने देश के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया.
18 हजार फीट की ऊंचाई और माइनस तापमान
ठंडे रेगिस्तान में बर्फ से ढंकी चोटियों पर 16,000 से 18,000 फीट की ऊंचाई पर कारगिल युद्ध लड़ना और जीतना भारतीय सेना के लिए कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा, इसका अहसास वहां जाने पर ही होता है. ऑक्सीजन की कमी, कड़ाके की ठंड, खड़ी चढ़ाई और दुश्मन की फायरिंग- इन सबके बावजूद जवानों ने ‘ऑपरेशन विजय’ को सफलता दिलाई. 26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने कब्जा किए गए सभी क्षेत्रों को खाली करवा लिया.
सीमा की सुरक्षा में स्थानीय लोगों और सेना का अटूट संगम
सब जानते हैं कि लेह-लद्दाख क्षेत्र भारत के लिए रणनीतिक तौर पर बेहद अहम है. इसके एक ओर पाकिस्तान की सीमा है, तो दूसरी ओर चीन की. यही वजह है कि इस इलाके की सुरक्षा और यहां के स्थानीय लोगों का सहयोग हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है. ताशी नामग्याल जैसे आम नागरिकों का योगदान इस बात का प्रमाण है कि सीमा सुरक्षा केवल वर्दीधारी जवानों का ही नहीं, पूरे राष्ट्र का सामूहिक दायित्व है.
अमर बलिदानियों और गुमनाम नायकों को शत-शत नमन
आज 27वां कारगिल विजय दिवस है. यह दिन केवल विजय का उत्सव नहीं, बल्कि उन अनगिनत वीरों को नमन करने का अवसर है जिन्होंने देश की अखंडता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी. ताशी नामग्याल जैसे गुमनाम नायकों की कहानी हमें याद दिलाती है कि देशभक्ति कभी भी पोशाक या पदवी की मोहताज नहीं होती.
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-भारत एक्सप्रेस
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