भारत की आजादी की कहानी सिर्फ उन नेताओं तक सीमित नहीं है जिनके नाम हर किताब और हर जुबान पर सुनाई देते हैं. इस संघर्ष में कई ऐसे महान लोग भी शामिल थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया, लेकिन समय के साथ उनकी कहानियां आम लोगों तक कम पहुंच पाईं. ऐसे ही एक महान क्रांतिकारी थे मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली, जिनका नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है.
मौलाना बरकतुल्लाह का जन्म 7 जुलाई 1854 को भोपाल में हुआ था. बचपन से ही वे पढ़ाई-लिखाई में रुचि रखने वाले और नई सोच रखने वाले व्यक्ति थे. आगे चलकर वे एक विद्वान, पत्रकार और प्रखर राष्ट्रवादी विचारक बने. अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उनका संघर्ष केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने दुनिया के कई देशों में जाकर भारत की आजादी के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास किया.
उन्होंने जापान, अमेरिका, जर्मनी, अफगानिस्तान और रूस जैसे देशों की यात्रा की और वहां रह रहे भारतीयों तथा राजनीतिक संगठनों से संपर्क स्थापित किया. उनका उद्देश्य साफ था—ब्रिटिश शासन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माहौल तैयार करना और भारत की स्वतंत्रता की आवाज को दुनिया तक पहुंचाना.
काबुल में बनाई भारत की पहली अस्थायी सरकार
साल 1915 भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक खास महत्व रखता है. इसी वर्ष मौलाना बरकतुल्लाह ने राजा महेंद्र प्रताप के साथ मिलकर अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में भारत की पहली अस्थायी सरकार की स्थापना की. इस सरकार को “प्रोविजनल गवर्नमेंट ऑफ इंडिया” कहा गया.
इस अस्थायी सरकार में मौलाना बरकतुल्लाह को प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी दी गई थी. इसी वजह से उन्हें कई इतिहासकार स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में भी याद करते हैं. हालांकि, यह सरकार ब्रिटिश शासन के दौरान निर्वासन में बनाई गई थी और इसका उद्देश्य भारत को अंग्रेजी शासन से मुक्त कराने के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करना था.
आजादी के लिए दुनिया भर में उठाई आवाज
मौलाना बरकतुल्लाह सिर्फ एक राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं थे, बल्कि एक प्रभावशाली लेखक और विचारक भी थे. वे मानते थे कि भारत की आजादी की लड़ाई तभी सफल हो सकती है जब देश के सभी समुदाय एकजुट होकर संघर्ष करें. हिंदू-मुस्लिम एकता उनके विचारों का अहम हिस्सा थी.
उन्होंने विदेशों में रहकर भारतीय क्रांतिकारियों के साथ मिलकर काम किया. वे रूस गए और वहां के नेताओं से मुलाकात कर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के लिए समर्थन मांगा. उन्होंने कई अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं के जरिए अंग्रेजी शासन की नीतियों और अत्याचारों को दुनिया के सामने रखने का प्रयास किया.
आखिरी समय भी देश के नाम रहा
मौलाना बरकतुल्लाह का निधन 1927 में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को शहर में हुआ. जीवन के अंतिम दौर में वे आर्थिक परेशानियों से गुजर रहे थे, लेकिन देश की आजादी के अपने सपने से कभी पीछे नहीं हटे. उनकी समाधि अमेरिका के सैक्रामेंटो में स्थित है.
इतिहासकारों का मानना है कि मौलाना बरकतुल्लाह जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की भूमिका को और अधिक लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है. उन्होंने प्रसिद्धि या सम्मान की उम्मीद किए बिना अपना जीवन भारत की आजादी के लिए लगा दिया. आज जब देश अपने स्वतंत्रता सेनानियों को याद करता है, तो मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली का योगदान भी उतनी ही श्रद्धा और सम्मान के साथ याद किया जाना चाहिए.
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-भारत एक्सप्रेस
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