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Kanya Sumangla Mission Shakti Digital
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जन्मदिन विशेष; नवजोत सिंह सिद्धू- धैर्य और आक्रामकता का अनोखा संगम

नवजोत सिंह सिद्धू ने अपने करियर की शुरुआत ‘स्ट्रोकलेस वंडर’ की छवि के साथ की थी लेकिन बाद में आक्रामक बल्लेबाजी से अपनी अलग पहचान बनाई. श्रीलंका के खिलाफ लखनऊ की यादगार पारी और स्पिनरों पर उनके बेखौफ हमलों ने उन्हें भारतीय क्रिकेट का खास बल्लेबाज बना दिया.

From 'Strokeless Wonder' to 'Sixer King'

स्ट्रोकलेस वंडर से सिक्सर किंग तक

जब नवजोत सिंह सिद्धू ने 1983-84 में टेस्ट करियर की शुरुआत की थी, तो उन्हें “स्ट्रोकलेस वंडर” कहा जाता था. लेकिन 1987 के विश्व कप तक आते आते उन्होंने अपनी इस छवि को पूरी तरह पलट दिया. उन्होंने टूर्नामेंट की शुरुआत लगातार चार अर्धशतकों के साथ की थी. गेंदबाजों पर भरोसे के साथ हमला करते हुए वे अक्सर गेंद को हवा में उछालकर खेलते थे.

लखनऊ की वो यादगार पारी

कुछ साल बाद 1992-93 में लखनऊ में श्रीलंका के खिलाफ उनकी पारी आज भी याद की जाती है. 223 गेंदों पर बने 124 रनों में आठ छक्के और नौ चौके शामिल थे. दिलचस्प बात यह है कि बाउंड्री हटा दें तो बाकी 206 गेंदों से उन्होंने सिर्फ 40 रन बनाए थे. यह धैर्य और आक्रामकता के सही तालमेल का बेहतरीन उदाहरण था. उन्हें पता था कि कब ठहरना है और कब हमला करना है.

धैर्य और आक्रामकता का बेजोड़ संगम

यही सिद्धू की सबसे बड़ी खासियत थी. जरूरत पड़ने पर वे घंटों क्रीज पर टिक सकते थे, जैसे 1996-97 में त्रिनिदाद में उनका मैराथन 201 रनों का स्कोर, जो 11 घंटे से भी ज्यादा चला था. वहीं जरूरत पड़ने पर वे तुरंत गियर बदलकर विपक्षी टीम पर हमला बोलने में भी कभी संकोच नहीं करते थे.

स्पिन के खिलाफ निडर बल्लेबाज

अपने युग के सबसे निडर स्ट्रोक प्लेयर में से एक, सिद्धू उन गिने चुने बल्लेबाजों में थे जो मुथैया मुरलीधरन और शेन वॉर्न जैसे दिग्गज स्पिनरों के खिलाफ भी क्रीज से बाहर निकलकर खेलने का हौसला रखते थे.

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आंकड़ों में नवजोत सिंह सिद्धू का करियर

1980 और 1990 के दशक में भारतीय बल्लेबाजी के प्रमुख स्तंभ रहे सिद्धू ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में टेस्ट में 3,202 रन औसत 42.13 और वनडे में 4,413 रन औसत 37.08 बनाए. दोनों फॉर्मेट को मिलाकर उन्होंने कुल 15 अंतरराष्ट्रीय शतक जड़े.

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-भारत एक्सप्रेस



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