BRICS सम्मेलन मोदी-शी मुलाकात पर दुनिया की नजर
भारत और चीन के रिश्ते एक बार फिर उस मोड़ पर खड़े हैं, जहां एक मुलाकात महज मुलाकात नहीं, बल्कि रणनीतिक संकेत बन सकती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संभावित द्विपक्षीय बैठक को लेकर कूटनीतिक हलकों में खासा उत्साह है.
शी जिनपिंग के आगामी BRICS शिखर सम्मेलन के लिए भारत आने की उम्मीद है. यदि यह यात्रा होती है और दोनों नेताओं के बीच औपचारिक बातचीत होती है, तो यह भारत-चीन संबंधों में जारी सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा. लेकिन इस मुलाकात की असली अहमियत मुस्कुराते चेहरों और हाथ मिलाने से कहीं आगे होगी.
गलवान के बाद धीरे-धीरे पटरी पर लौटते रिश्ते
2020 के गलवान संघर्ष ने भारत-चीन संबंधों को गहरे संकट में डाल दिया था. सीमा पर सैन्य तनाव ने दोनों देशों के राजनीतिक और आर्थिक रिश्तों को भी प्रभावित किया.
इसके बाद दोनों देशों ने सैन्य और कूटनीतिक चैनलों को सक्रिय रखा. 2024 में सीमा पर disengagement के बाद रिश्तों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई. अक्टूबर 2024 में कजान में मोदी और शी की मुलाकात और फिर अगस्त 2025 में तियानजिन में उनकी बातचीत ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया. भारत के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार दोनों नेताओं ने माना था कि दोनों देश विकास साझेदार हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं, और मतभेदों को विवाद में नहीं बदलना चाहिए. अब 2026 में तस्वीर और दिलचस्प हो गई है.
अगस्त में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच सीमा विवाद पर उच्चस्तरीय बातचीत हुई. दोनों पक्षों ने सीमा प्रश्न का समाधान तलाशने के लिए बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई.
यानी मोदी-शी मुलाकात से पहले कूटनीतिक जमीन तैयार की जा रही है.
तीन मुद्दे होंगे सबसे अहम
अगर मोदी और शी की द्विपक्षीय बैठक होती है तो तीन विषयों पर दुनिया की सबसे ज्यादा नजर होगी.
सीमा विवाद: भारत के लिए सीमा पर शांति और स्थिरता किसी भी व्यापक रिश्ते की बुनियादी शर्त है. इसलिए बातचीत में LAC पर सैन्य तनाव कम करने, विश्वास बहाली और भविष्य में टकराव रोकने के उपाय महत्वपूर्ण रहेंगे.
व्यापार और आर्थिक संबंध: दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्ते बड़े हैं, लेकिन सुरक्षा और रणनीतिक चिंताओं के कारण भारत चीन को लेकर बेहद सतर्क रहा है. हाल ही में UPI को चीन से जुड़े Alipay+ नेटवर्क के साथ जोड़ने के प्रस्ताव पर भी भारत ने सुरक्षा और डेटा-गोपनीयता संबंधी चिंताएं उठाईं.
बदलती विश्व व्यवस्था: अमेरिका-चीन तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक व्यापार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारत और चीन दोनों अपने-अपने रणनीतिक हितों को साध रहे हैं.
ऐसे समय में दिल्ली और बीजिंग के बीच संवाद केवल द्विपक्षीय मुद्दा नहीं रह जाता. इसका असर पूरे एशिया की रणनीतिक तस्वीर पर पड़ता है.
क्या यह ‘Reset’ होगा?
मोदी और शी के बीच मुलाकात को रिश्तों का पूर्ण reset मानना जल्दबाजी होगी. भारत की चिंताएं अभी खत्म नहीं हुई हैं और सीमा विवाद का स्थायी समाधान अभी दूर है. लेकिन कूटनीति में हर समाधान एक बड़े समझौते से नहीं, बल्कि संवाद की वापसी से शुरू होता है. यदि दोनों नेता एक बार फिर सीधे संवाद करते हैं, तो यह संकेत होगा कि दोनों देश प्रतिस्पर्धा के बावजूद संबंधों को टकराव की दिशा में जाने से रोकना चाहते हैं.
भारत और चीन दोस्ती की तलाश में नहीं, बल्कि स्थिरता की जरूरत में एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं.
मोदी-शी पर दुनिया की नजर
BRICS सम्मेलन भारत के लिए भी एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मंच होगा. नई दिल्ली एक तरफ ग्लोबल साउथ में अपनी भूमिका मजबूत करना चाहती है, तो दूसरी तरफ अमेरिका, रूस और चीन जैसे बड़े शक्ति केंद्रों के बीच अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना चाहती है.
ऐसे में शी जिनपिंग का भारत आना और मोदी के साथ संभावित द्विपक्षीय बैठक भारत की ‘multi-alignment’ diplomacy का एक और महत्वपूर्ण अध्याय बन सकती है.
फिलहाल सवाल यह नहीं है कि मोदी और शी एक तस्वीर में साथ दिखाई देंगे या नहीं. बल्कि सवाल यह है कि उस तस्वीर के पीछे की बातचीत कितनी दूर तक जाएगी. क्योंकि एक हाथ मिलाना सुर्खी बन सकता है, लेकिन LAC पर शांति, व्यापार में भरोसा और रणनीतिक स्थिरता, यही तय करेंगे कि भारत-चीन संबंध वास्तव में किस दिशा में जा रहे हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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