केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने उज्जैन में ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन के दौरान एक चर्चित प्रस्ताव रखा. उन्होंने कहा कि ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) की जगह अब Mahakal Standard Time (MST) को वैश्विक समय मानक बनाना चाहिए. उनका तर्क था कि प्राचीन काल में समय गणना का केंद्र उज्जैन (अवंतिका) रहा है, न कि लंदन का ग्रीनविच.
उज्जैन: प्राचीन समय का केंद्र
उज्जैन भारत की प्राचीन खगोलीय परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है. सूर्य सिद्धांत जैसे प्राचीन ग्रंथों में उज्जैन को शून्य देशांतर (Prime Meridian) के रूप में वर्णित किया गया है. यहां कर्क रेखा (Tropic of Cancer) गुजरती है और प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्रियों ने इसी आधार पर समय, कैलेंडर और भौगोलिक गणनाएं कीं. महाकालेश्वर मंदिर को ‘समय के स्वामी’ के रूप में पूजा जाता है, जो समय की अवधारणा से गहरा जुड़ाव दर्शाता है.
धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि आधुनिक AI टूल्स भी उज्जैन को समय गणना का मूल केंद्र मानते हैं. उन्होंने जोर दिया कि औपनिवेशिक काल में यह विरासत यूरोप को सौंपी गई, लेकिन अब भारत को अपनी वैज्ञानिक और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर स्थापित करना चाहिए. उन्होंने वैज्ञानिक समुदाय से अपील की कि वे इस ढांचे पर पुनर्विचार करें.
वर्तमान वैश्विक समय मानक: GMT की कहानी
वर्तमान में दुनिया का समय ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) या Coordinated Universal Time (UTC) पर आधारित है. 1884 में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में ग्रीनविच (लंदन) को प्राइम मेरिडियन (0° देशांतर) चुना गया था. इससे पहले विभिन्न देश अपने स्थानीय मेरिडियन का इस्तेमाल करते थे. भारत में भी ब्रिटिश काल से पहले उज्जैन-आधारित गणनाएं प्रचलित थीं.
GMT का फायदा यह है कि यह एकल, सुसंगत और वैश्विक रूप से स्वीकृत मानक है, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विमानन, नेविगेशन (GPS), कंप्यूटर नेटवर्क और संचार को सुगम बनाता है.
महाकाल स्टैंडर्ड टाइम का प्रस्ताव
यह प्रस्ताव ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है. यह भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा आर्यभट्ट, वराहमिहिर और सूर्य सिद्धांत की विरासत को फिर से वैश्विक मंच पर लाने का प्रयास है. इससे ‘मैकाले माइंडसेट’ से मुक्ति और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक प्रतीकात्मक कदम माना जा सकता है. कुछ संतों और हिंदू संगठनों ने इस विचार का स्वागत भी किया है.
हालांकि, इसे व्यावहारिक रूप से लागू करना आसान नहीं. इसके लिए वैश्विक सहमति के साथ, तकनीकी आधार और वैज्ञानिक प्रभाव को भी ध्यान में रखना होगा.
वैश्विक सहमति
1884 की तरह सभी देशों, वैज्ञानिक संगठनों (जैसे International Bureau of Weights and Measures) और संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी जरूरी होगी.
तकनीकी आधार
अचानक बदलाव से GPS सिस्टम, सॉफ्टवेयर, बैंकिंग, स्टॉक मार्केट, उड़ान अनुसूचियां और दूरसंचार पर भारी असर पड़ सकता है. करोड़ों डिवाइस और डेटाबेस को अपडेट करना होगा.
वैज्ञानिक प्रभाव
हालांकि उज्जैन का ऐतिहासिक महत्व है, लेकिन समय मानक मुख्यतः सुविधा और अंतरराष्ट्रीय समझौते पर टिका है, न कि सिर्फ ऐतिहासिक केंद्र पर.
बहस का सकारात्मक पहलू
महाकाल स्टैंडर्ड टाइम का विचार भले ही तत्काल लागू न हो, लेकिन यह एक जरूरी बहस शुरू करता है. यह भारत को अपनी प्राचीन वैज्ञानिक उपलब्धियों पर गर्व करने और उन्हें आधुनिक संदर्भ में पुनर्स्थापित करने की प्रेरणा देता है. उज्जैन जैसे केंद्रों को और मजबूत बनाकर खगोलशास्त्र, समय गणना और शिक्षा में निवेश बढ़ाया जा सकता है.
अंततः, समय का मानक चाहे जो भी हो, लेकिन भारत की ‘समय के स्वामी’ वाली विरासत को विश्व पटल पर चमकाना ही इस चर्चा का सबसे बड़ा लाभ है.
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-भारत एक्सप्रेस
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