देश की राजधानी दिल्ली और उससे सटे नोएडा-गाजियाबाद के प्राइवेट स्कूल इन दिनों शिक्षा देने के बजाय ‘वसूली केंद्र’ बन गए हैं. भारत एक्सप्रेस की Special Investigation Team (SIT) ने एक बड़ा खुलासा किया है, जिसमें यह सामने आया है कि नामी स्कूल नियमों को ताक पर रखकर अभिभावकों को महंगी किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने के लिए मजबूर कर रहे हैं. शिक्षा निदेशालय के स्पष्ट आदेश हैं कि कोई भी स्कूल किसी खास दुकान से सामान खरीदने का दबाव नहीं बना सकता, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है.
दिल्ली के पॉश इलाकों का हाल ऐसा दिखा
भारत एक्सप्रेस के अंडर कवर रिपोर्टर राजू गुप्ता और SIT हेड सुबोध जैन ने जब ग्रेटर कैलाश-1 स्थित K.R. Mangalam World School का दौरा किया, तो वहां 8वीं कक्षा की किताबों की कीमत 9,200 रुपये और यूनिफॉर्म की कीमत 5 से 6 हजार रुपये बताई गई. स्कूल स्टाफ ने साफ कहा कि यह यूनिफॉर्म बाहर कहीं मिलेगी ही नहीं. इसी तरह ईस्ट दिल्ली के G D Goenka Public School में बुक सेट की कीमत 8,767 रुपये वसूली जा रही है. वहीं, पुष्प विहार के Amity International School में भी 7,695 रुपये का बुक सेट बेचा जा रहा है.
नोएडा और गाजियाबाद में भी मनमानी
नोएडा के सेक्टर-40 स्थित The Khaitan School में भी आलम कुछ अलग नहीं है. यहां 8वीं क्लास का फ्रेंच बुक सेट 6,968 रुपये का है. Kothari International School में यूनिफॉर्म और किताबों के नाम पर करीब 11 हजार रुपये तक वसूले जा रहे हैं और स्टाफ का दावा है कि यह सामान बाहर ट्राई कर लीजिए, कहीं नहीं मिलेगा.
गाजियाबाद के DLF Public School में बुक सेट की कीमत 7,841 रुपये है. यहां के Khaitan Public School और New Era School में भी स्टाफ ने साफ कर दिया कि किताबें और ड्रेस केवल स्कूल के बताए माध्यमों से ही लेनी होंगी, क्योंकि वे बाहर बाजार में उपलब्ध ही नहीं हैं.
प्राइवेट पब्लिशर्स और स्कूलों की नूरा-कुश्ती
इस पूरे खेल के पीछे प्राइवेट पब्लिशर्स और स्कूलों की नूरा-कुश्ती है. स्कूलों में NCERT की सस्ती किताबों के बजाय जानबूझकर प्राइवेट पब्लिशर्स की महंगी किताबें लगाई जाती हैं, जिनसे स्कूलों को मोटा कमीशन मिलता है. शिक्षा निदेशालय और CBSE जैसे विभाग इस पूरे मामले से वाकिफ हैं, लेकिन अधिकारियों की चुप्पी स्कूलों के हौसले बुलंद कर रही है. भारत एक्सप्रेस की पड़ताल ने साबित कर दिया कि दिल्ली-NCR के कई प्राइवेट स्कूल अब केवल मुनाफे की मशीन बन चुके हैं. अभिभावक मजबूरी में अपनी जमा-पूंजी इन स्कूलों के स्टॉल्स पर लुटा रहे हैं. अब जरूरत है कि सरकार और प्रशासन इन ‘लुटेरे स्कूलों’ पर सख्त कानूनी कार्रवाई करे ताकि शिक्षा के नाम पर चल रही इस खुली लूट को रोका जा सके.
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