Manikarnika Ghat Development Controversy: काशी के मणिकर्णिका घाट पर उपजे विवाद ने एक बार फिर देश के सामने वही पुराना और ज्वलंत सवाल खड़ा कर दिया है कि हम अपनी प्राचीन धरोहरों को नुकसान पहुंचाए बिना शहरों का आधुनिक विकास कैसे कर सकते हैं. यह प्रश्न सिर्फ काशी तक सीमित नहीं है. वाराणसी, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, उज्जैन, द्वारका जैसे भारत के लगभग हर प्रमुख धार्मिक नगर में आज यही संघर्ष दिखाई देता है. एक तरफ बढ़ती आबादी, पर्यटकों की भीड़ और बुनियादी सुविधाओं की मांग है. दूसरी तरफ सदियों पुरानी वास्तुकला, गहरी धार्मिक भावनाएं, पुरोहित समाज के पैतृक अधिकार और तीर्थस्थलों की आत्मा है. इन दोनों के बीच संतुलन बनाना आज सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है.
पुरातन नगरों में विकास की जटिल चुनौतियां
धार्मिक नगरों का जीर्णोद्धार या सौंदर्यीकरण एक बेहद जटिल और संवेदनशील प्रक्रिया है. यहां केवल ईंट, सीमेंट और सड़क की बात नहीं होती. धार्मिक भावनाओं और श्रद्धालुओं की अपेक्षाओं का संतुलन, पुरोहितों और स्थानीय समाज के पारंपरिक अधिकारों का सम्मान, सीमित भौगोलिक क्षेत्र में व्यापक व्यवस्थाएं, तीर्थयात्रियों की सुरक्षा और कानून व्यवस्था, और आर्थिक विकास के साथ आध्यात्मिक गरिमा को बनाए रखना, ये सभी एक साथ जुड़ी हुई चुनौतियां हैं.
इन सबके लिए जिस कलात्मक समझ, आध्यात्मिक चेतना और पुरातत्व के गहरे ज्ञान की जरूरत होती है, वह अक्सर प्रशासनिक व्यवस्था में देखने को नहीं मिलती. सड़क, नाली और फ्लाईओवर बनाने के आदी इंजीनियरों और ठेकेदारों की सोच इन नगरों की आत्मा को समझ ही नहीं पाती. इसका नतीजा पिछले तीन दशकों में साफ दिखाई देता है. धार्मिक नगरों में दियासलाई के डिब्बों जैसे बेतरतीब भवन खड़े हो गए. पारंपरिक वास्तुकला धीरे धीरे खत्म होती चली गई और इन नगरों की ऐतिहासिक पहचान धुंधली पड़ती गई.
भूटान के विकास का मॉडल से सीखें सबक
भूटान इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है. वहां कोई भी भवन, चाहे वह होटल हो, सरकारी दफ्तर हो या दुकान, भूटानी बौद्ध संस्कृति के विपरीत नहीं बनाया जा सकता. हर इमारत का डिजाइन, खिड़कियां, दरवाजे और छज्जे पारंपरिक बौद्ध विहारों की शैली में ही होते हैं. इससे न केवल सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहती है, बल्कि पर्यटकों के लिए यह और अधिक आकर्षक भी बनता है. दुनिया के कई प्रमुख पर्यटन स्थल इसी तरह अपनी सांस्कृतिक आत्मा को बचाते हुए विकास करते हैं. भारत में समस्या यह है कि आज भी योजनाएं पुराने और यांत्रिक ढर्रे पर बनाई जा रही हैं. फिर सवाल उठता है कि ऐसे में पुरातन नगरों का स्वरूप आखिर सुधरेगा कैसे.
भ्रष्टाचार का दोहरा चेहरा: डिजाइन और कार्यान्वयन
शहरी विकास की प्रक्रिया में भ्रष्टाचार केवल निर्माण तक सीमित नहीं रहता. इसका पहला स्तर होता है करप्शन ऑफ डिजाइन और दूसरा करप्शन ऑफ इम्प्लीमेंटेशन. निर्माण में भ्रष्टाचार तो लगभग सर्वविदित है, जहां बिना कमीशन के फाइलें आगे नहीं बढ़तीं. लेकिन डिजाइन का भ्रष्टाचार उससे कहीं अधिक खतरनाक साबित होता है. जब तीर्थस्थलों के विकास की योजनाएं सही समझ और अनुभवी विशेषज्ञों की सलाह के बिना बनाई जाती हैं, और उद्देश्य केवल अवैध कमाई बन जाता है, तो योजनाएं भले ही कागज पर भव्य दिखें, लेकिन जमीनी हकीकत में विनाशकारी साबित होती हैं. गलत लोगों से नक्शे बनवाए जाते हैं और सत्ता के जोर पर उन्हें लागू कराया जाता है. इसका परिणाम विकास नहीं, बल्कि धर्मक्षेत्रों का नुकसान होता है.
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पिछले तीन दशकों से जारी है मसला
पिछले करीब तीन दशकों से ब्रज सहित कई धार्मिक क्षेत्रों में धरोहर संरक्षण से जुड़े लोगों का अनुभव साफ बताता है कि कितना व्यापक विनाश हो चुका है. इसके बावजूद नीतियों और सोच में कोई बुनियादी बदलाव नजर नहीं आता. निर्णय आज भी उसी पुराने ढांचे में लिए जा रहे हैं. जब तक नीतिगत स्तर पर क्रांतिकारी बदलाव नहीं होंगे, तब तक वांछित सुधार संभव नहीं हैं. अन्यथा वही स्थिति बार बार दोहराई जाएगी, जिसे कहावत में कहा गया है कि चौबे जी गए छब्बे बनने और दूबे बनकर लौटे.
धरोहरों को राजनीति से ऊपर रखें
केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद धर्मक्षेत्रों का विकास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडे में भी शामिल रहा है. ऐसे में संघ नेतृत्व की जिम्मेदारी बनती है कि वह धर्मक्षेत्रों के विकास और संरक्षण के लिए स्पष्ट और दीर्घकालिक नीति तय करे. इसके लिए अनुभवी, निष्पक्ष और क्षेत्रीय जानकारों की राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर गोष्ठियां आयोजित की जानी चाहिए. उनकी राय के आधार पर नीति बनाई जाए और इस पूरे विषय को राजनीति से अलग रखा जाए.
धरोहरें किसी एक दल की सत्ता से न तो बनती हैं और न ही खत्म होती हैं. उनका अस्तित्व सदियों पुराना है और आने वाली सदियों तक बना रहना चाहिए. इसलिए धरोहर संरक्षण में लगे लोगों और विशेषज्ञों के प्रति राग द्वेष से ऊपर उठकर केवल धरोहरों के हित में फैसले लिए जाने चाहिए. अगर ऐसा नहीं हुआ तो संरक्षण और विकास के नाम पर विनाश की प्रक्रिया ही चलती रहेगी. यह याद रखना जरूरी है कि प्राचीन धरोहरें किसी एक धर्म, समाज या देश की संपत्ति नहीं होतीं.
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-भारत एक्सप्रेस
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