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नोएडा में मजदूर अशांति: क्या एक राष्ट्रीय चेतावनी?

नोएडा में मजदूरों का हिंसक प्रदर्शन सिर्फ स्थानीय घटना नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है. न्यूनतम मजदूरी में अंतर, महंगाई और संवाद की कमी ने आग भड़काई.

नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में बीते 13 अप्रैल को जो घटना घटी, वह केवल एक स्थानीय प्रदर्शन नहीं थी. फेज-2 के होजरी कॉम्प्लेक्स, सेक्टर 60, 62, 63 और आसपास के दर्जनों कारखानों के हजारों मजदूर वेतन वृद्धि, ओवरटाइम का दोगुना भुगतान, साप्ताहिक छुट्टी, बोनस और शिकायत निवारण समिति जैसी मांगों को लेकर सड़क पर उतरे. शुरू में शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन था, लेकिन जल्द ही पथराव, वाहनों में आगजनी, संपत्ति तोड़फोड़ और पुलिस के साथ टकराव का रूप ले लिया. पुलिस को आंसू गैस और लाठीचार्ज का सहारा लेना पड़ा. सैकड़ों लोग घायल हुए, दर्जनों वाहन जलाए गए और सैकड़ों मजदूरों की गिरफ्तारी हुई.

उत्तर प्रदेश सरकार ने तुरंत न्यूनतम मजदूरी में 21 प्रतिशत की अंतरिम वृद्धि की घोषणा कर दी, लेकिन आग बुझने में समय लगा. यह घटना मात्र नोएडा की नहीं है. यह पूरे देश के लिए एक बड़े संदेश की तरह है. आज भारत मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अगर श्रमिक-प्रबंधन संबंधों को नजरअंदाज किया गया तो नोएडा जैसी स्थिति कहीं भी दोहराई जा सकती है.

मुख्य वजह हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बीच न्यूनतम मजदूरी का बड़ा अंतर था. हरियाणा सरकार ने हाल ही में अनुभवी मजदूरों के वेतन में करीब 35 प्रतिशत की वृद्धि कर दी. अकुशल श्रमिकों के वेतन को 14,000 रुपये से बढ़ाकर 19,000 रुपये तक कर दिया गया. नोएडा के मजदूरों को यही खबर मिली और उन्होंने मांग की कि उनका वेतन भी उसी स्तर पर हो. वर्तमान में नोएडा में कई कारखानों में अनुभवी मजदूरों को 11-13 हजार रुपये मासिक मिल रहे थे, जबकि महंगाई, किराया, राशन, शिक्षा और स्वास्थ्य खर्च ने आसमान छू लिया है. साथ ही लंबे काम के घंटे, ओवरटाइम का सिंगल रेट, वेतन स्लिप न मिलना और यौन उत्पीड़न समिति जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी ने आक्रोश को भड़काया.

सोशल मीडिया पर ‘हरियाणा मॉडल’ की खबरें तेजी से फैलीं. कुछ बाहरी तत्वों ने भी इसे भड़काने की कोशिश की, लेकिन मूल समस्या आर्थिक थी. तीन-चार दिन के शांत प्रदर्शन के बाद 13 अप्रैल को हिंसा भड़क गई. पुलिस ने न्यूनतम बल प्रयोग किया, लेकिन स्थिति बिगड़ चुकी थी. सरकार ने बाद में 1 अप्रैल से लागू होने वाली वेतन वृद्धि की घोषणा की, फिर भी कई मजदूर संतुष्ट नहीं हुए.

गौरतलब है कि यह अशांति अचानक नहीं आई है. पिछले कुछ वर्षों में देश भर में श्रमिकों के बीच असंतोष बढ़ा है. कारण कई हैं. महंगाई और वास्तविक आय में कमी: खाने-पीने, आवास और परिवहन का खर्च तेजी से बढ़ा है, लेकिन वेतन वृद्धि धीमी रही. विशेषकर अनुबंधित और ठेकेदार मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित रहे.श्रम कानूनों का अधूरा कार्यान्वयन: चार नए श्रम संहिताओं का उद्देश्य सुविधा देना था, लेकिन कई राज्यों में उन्हें पूरी तरह लागू नहीं किया गया. न्यूनतम मजदूरी की समीक्षा समय पर नहीं होती.प्रबंधन की उदासीनता: कई कारखाने एमएसएमई क्षेत्र के हैं. मालिक लागत बचाने के चक्कर में वेतन, बोनस और सुरक्षा पर ध्यान नहीं देते. संवाद की कमी भी रहती है. जब हरियाणा में वेतन बढ़ा, तो नोएडा के मालिकों ने इसे ‘स्थानीय मुद्दा’ मानकर नजरअंदाज कर दिया.प्रवासी मजदूरों की स्थिति: नोएडा जैसे क्षेत्रों में ज्यादातर मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों और पूर्वी राज्यों से आते हैं. वे परिवार को पैसा भेजने के लिए कम वेतन पर भी काम करते हैं, लेकिन महंगाई ने उनका सब्र तोड़ दिया.सोशल मीडिया और सूचना का प्रसार ऐसा होने लगा कि एक जिले की खबर दूसरे जिले में तुरंत पहुंचने लगी. जिस कारण तुलना आसान हो गई है.

इसी तरह की घटनाएं पहले गुरुग्राम, चेन्नई, कोयंबटूर और अहमदाबाद में भी देखी गई हैं. इसलिए नोएडा की घटना कोई अलग घटना नहीं है.

सवाल उठता है कि क्या दोष किसी एक पक्ष का है?उल्लेखनीय है कि कई फैक्टरियां लाभ कमा रही हैं, लेकिन मजदूरों को न्यूनतम सुविधाएं भी नहीं दे पा रही. संवाद की जगह दमन का रवैया अपनाया जाता है. वहीं सरकार की बात करें तो उनके द्वारा न्यूनतम मजदूरी की समीक्षा में देरी करना. पड़ोसी राज्यों के साथ समन्वय की कमी. श्रम विभाग की कमजोरनिगरानी, आदि जैसे कई कारण हैं जो सरकार को भी सवालों के घेरे में लाते हैं. वहीं मजदूरों की बात की जाए तो हिंसा कभी जायज नहीं होती. वाहनों में आग लगाना, पथराव और संपत्ति तोड़फोड़ से उनकी अपनी मांगें कमजोर होती हैं. ऐसे में कुछ बाहरी उकसावे वाले तत्व इन सब का फायदा उठा लेते हैं.कई जगह यूनियनें राजनीतिक रंग ले लेती हैं और संवाद की बजाय आंदोलन को बढ़ावा देती हैं.वास्तव में दोष ‘व्यवस्था’ का है, जिसमें त्रिपक्षीय संवाद (सरकार-प्रबंधन-श्रमिक) कमजोर हो गया है.

नोएडा से सबक लेकर देश भर के कारखाना मालिकों को तुरंत कुछ कदम उठाने चाहिए. नियमित वेतन समीक्षा: हर साल महंगाई के आधार पर वेतन बढ़ोतरी का फॉर्मूला तय करें. न्यूनतम मजदूरी से ऊपर का. ‘लिविंग वेज’को अपनाएं.संवाद स्थापित करें: ग्रेविएंस कमेटी, वर्कर्स वेलफेयर कमेटी बनाएं. मासिक बैठकें रखें.कानूनों का पूर्ण पालन: ओवरटाइम, पीएफ, ईएसआई, बोनस, छुट्टियां जैसे सभी नियमों का पालन करें. वेतन समय पर और स्लिप के साथ दें.कौशल विकास: मजदूरों को ट्रेनिंग दें ताकि वे ज्यादा उत्पादक बनें और बेहतर वेतन का हकदार हों.सुरक्षा और सम्मान: काम का माहौल सुरक्षित और सम्मानजनक बनाएं. यौन उत्पीड़न समिति अनिवार्य रूप से सक्रिय रखें.सरकार से समन्वय: राज्य और केंद्र सरकार के साथ मिलकर लंबी अवधि की मजदूरी नीति बनाएं.

नोएडा की घटना भारत की औद्योगिक क्रांति के बीच एक लाल बत्ती है. अगर हम ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को साकार करना चाहते हैं, तो मजदूरों को साझेदार मानना होगा, न कि सिर्फ लागत का हिस्सा. हिंसा से कोई समस्या हल नहीं होती, लेकिन जड़ों में उपेक्षा भी घातक है. सरकार को श्रम कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करना चाहिए, प्रबंधन को मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और मजदूरों को शांतिपूर्ण संवाद का रास्ता चुनना चाहिए. तभी औद्योगिक शांति बनी रहेगी और विकास सतत होगा. नोएडा ने चेतावनी दी है, समय रहते इसे गंभीरता से लें, वरना यह आग देश के किसी भी कोने में भड़क सकती है.

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं.



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