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सेवा में चुप्पी, सेवानिवृत्ति पर सनसनी!

Retired Bureaucrats Revelations: सेवानिवृत्त अधिकारियों के सेवा के बाद किए गए खुलासे क्या लोकहित में हैं? जानिए सेवा में चुप्पी, राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक जवाबदेही पर यह सवाल.

Retired Bureaucrats Revelations

सेवानिवृत्त अधिकारियों के खुलासे कितने लोकहित में, कितने निजी हिसाब?

Retired Bureaucrats Revelations: भारत में आजकल एक नए साहित्यिक फैशन का चलन काफी आम हो चला है. सेवानिवृत्त अधिकारी अक्सर किताब, साक्षात्कार और पॉडकास्ट पर वे बातें कहते हैं जो सेवाकाल में वे फाइल पर, बैठक में या वैध संस्थागत माध्यम से नहीं कह सके. दावा यही होता है कि अब ‘सच’ सामने आ रहा है. सवाल यह है कि वह सच तब क्यों नहीं आया जब उससे शासन की दिशा बदल सकती थी और अब क्यों इतना आकर्षक लग रहा है?

सनसनी क्यों दबाई जाती है?

अधिकारी अक्सर राजनीतिक दबाव, तबादला, केंद्रीय प्रतिनियुक्ति, परिवार के लिए सुविधा और ‘सिस्टम के साथ चलने’ का तर्क देते हैं. अफसर जानता है कि नोट पर असहमति लिखना संभव है, पर लिखने के बाद अकेला पड़ना भी संभव है. कई बार नियम पुस्तक हाथ में रहती है, पर करियर की किताब अधिक भारी पड़ती है. मौखिक आदेश चलते हैं, फाइलें साफ रखी जाती हैं और असुविधाजनक सत्य को ‘समय नहीं है’ कहकर टाल दिया जाता है. नतीजा यह होता है कि सनसनी तब तक दबाई जाती है जब तक वह सुरक्षित स्मृति न बन जाए.

लोकहित है या पुराना हिसाब

सेवानिवृत होने के बाद निकला ‘रहस्य’ विवाद इसलिए पैदा करता है क्योंकि यह दोहरे मापदंड को उजागर करता है. जो व्यक्ति सत्ता के निकट रहा, उसी के मुंह से जब यह निकलता है कि निर्णय संविधान या प्रक्रिया से नहीं, दबाव से हुए, तो जनता पूछती है कि ‘तब आप कहां थे?’ विपक्ष इसे हथियार बनाता है, सत्ता इसे विश्वासघात कहती है और संस्थाएं गोपनीयता के नियम याद दिलाती हैं. आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, अखिल भारतीय सेवाओं के आचरण नियम और सेवानिवृत्ति के बाद प्रकाशन पर नियंत्रण, ये सब याद दिलाते हैं कि सरकारें अपने अंदरूनी मामलों को सार्वजनिक रंगमंच पर नहीं देखना चाहता. विवाद इसलिए तीखा होता है कि किताब अक्सर आधा इतिहास और आधी आत्मरक्षा होती है. नाम लिए जाते हैं, संदर्भ छूट जाते हैं और पाठक तय नहीं कर पाता कि यह लोकहित है या पुराना हिसाब.

देखा जाए तो फिर भी ऐसे खुलासों का कुछ लाभ अवश्य है. फाइलें अधूरी रहती हैं, बैठकें बिना पूरे कार्यवृत्त के निकल जाती हैं और मौखिक आदेश इतिहास से गायब हो जाते हैं. सेवानिवृत्त अधिकारी जब प्रक्रिया, दबाव और समझौते का ब्योरा देते हैं तो शोधार्थी, अदालतें और अगली पीढ़ी कम से कम यह समझ सकती है कि नीति कैसे बनती है. कभी-कभी इससे सुधार की बहस भी खुलती है कि क्या असहमति को फाइल पर सुरक्षित रखना पर्याप्त है, क्या आंतरिक शिकायत तंत्र काम करता है? क्या पद और प्रतिनियुक्ति का लालच तटस्थता को तोड़ देता है?

सही समय पर चुप रहो, गलत समय पर बोलो?

यहीं सबसे कठिन प्रश्न आता है कि यदि सेवाकाल में राजनीतिक आकाओं की कृपा का अपेक्षित प्रतिफल ‘पद, सम्मान, सुरक्षा’ न मिला, तो बाद में पर्दाफाश से अधिकारी को क्या मिलता है? देखा जाए तो अक्सर तीन चीजें मिलती हैं: ध्यान, बाजार और आत्म-औचित्य. किताब बिकती है, मंच मिलते हैं, सार्वजनिक चर्चा में नाम लौट आता है. जो व्यवस्था भीतर से चलाई, उसी व्यवस्था की आलोचना अब सार्वजनिक पूंजी बन जाती है. यदि प्रतिफल सेवा में नहीं मिला तो सेवानिवृत्ति में ‘सच बोलने वाले’ की छवि एक वैकल्पिक पुरस्कार बन जाती है. यह नैतिक जीत कम, प्रतिष्ठा का पुनर्निर्माण अधिक है. कुछ मामलों में यह सही भी हो सकता है. दबे हुए घोटाले, दबे हुए आदेश सामने आते हैं. पर समाज को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि देर से बोला गया सच, समय पर किए गए कर्तव्य का स्थानापन्न है. जो दबाव में झुका, वह बाद में झुकने की कहानी बेचकर खुद को सीधा नहीं कर सकता.

गौरतलब है कि ‘पश्चात्ताप’ का मंच बन चुकी ये कृतियां युवा अधिकारियों को गलत पाठ पढ़ा सकती हैं. सही समय पर चुप रहो, गलत समय पर बोलो. लोकसेवा का मूल यह नहीं है कि सत्य को पेंशन के बाद सुरक्षित गोदाम में रखो. सत्य को समकाल में दर्ज करना पड़ता है.

हर लड़ाई से भागना सही नहीं

कुछ वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि सेवा में रहते हुए अधिकारियों को कुछ ऐसा करना चाहिए ताकि बाद में किताब या पॉडकास्ट पश्चात्ताप का अस्पताल न बने. पहला, समकालीन लेखन. अधिकारी को असहमति नोट, तारीख सहित पत्राचार और वैध माध्यमों से आपत्ति दर्ज करनी चाहिए. मौखिक आदेश की लिखित पुष्टि मांगनी चाहिए. यह बगावत नहीं, नियम पुस्तक की मांग है. दूसरा, करियर की कीमत पर भी उन सीमाओं को पहचानना जहां संविधान और कानून राजनीतिक सुविधा से टकराते हैं. हर लड़ाई नहीं लड़नी होती, पर हर लड़ाई से भागना भी सही नहीं. तीसरा, संस्थागत मार्ग का सहारा लें. सतर्कता आयोग, सूचना का अधिकार, आंतरिक ऑडिट, विभागीय जांच आदि को औपचारिकता न समझा जाए. चौथा, निजी डायरी लिखें, पर उसे इतिहास का विकल्प न बनाया जाए. डायरी निजी पश्चात्ताप है; लोकपद सार्वजनिक जवाबदेही मांगता है. पांचवां, यह स्पष्ट कर लें कि सेवा का सम्मान बाद की प्रसिद्धि से बड़ा है. जो अधिकारी हर असुविधाजनक फाइल पर हस्ताक्षर इसलिए करता है कि कल इनाम मिलेगा, वह इनाम न मिलने पर संस्मरण लिखकर नैतिक श्रेष्ठता का दावा नहीं कर सकता.

ईमानदारी के बदले दंड मिला

सेवानिवृत्ति के बाद बोलना पूरी तरह बंद नहीं होना चाहिए. कुछ बातें राष्ट्रीय सुरक्षा या चल रही जांच के कारण तुरंत नहीं कही जा सकतीं. पर सिद्धांत यह होना चाहिए कि जो कहा जा सकता था और नहीं कहा गया, उसका श्रेय बाद में नहीं लिया जा सकता. राज्य को भी केवल दंड की भाषा नहीं बोलनी चाहिए. यदि ईमानदार असहमति को सेवा में दंड मिलता रहेगा तो सच बाहर किताबों में ही निकलेगा. साथ ही, सेवानिवृत्त अधिकारी को यह भी सोचना चाहिए कि आधा-अधूरा पर्दाफाश संस्थाओं की विश्वसनीयता को सुधारता कम और व्यक्तिगत प्रतिशोध को बढ़ाता अधिक है. नाम लेकर हमला और संदर्भ छिपाकर बचाव, दोनों इतिहास लेखन नहीं कहलाते.

अंत में यह प्रवृत्ति हमारे देश के प्रशासनिक जीवन की कमजोरी दिखाती है. हम सत्य को तब मनाते हैं जब वह किसी को नुकसान न पहुंचाए. अधिकारी को याद रखना चाहिए कि पछतावे की किताब अच्छी बिक सकती है, पर अच्छी संस्थाएं उन लोगों से बनती हैं जो पछतावे के लिए सामग्री जमा ही नहीं करते. नियम पुस्तक हाथ में हो और रीढ़ मज़बूत हो, तो सेवानिवृत्ति पर सनसनी की जरूरत कम पड़ती है. लोकतंत्र को बाद के रहस्य नहीं, समय पर दर्ज हिम्मत चाहिए.

-भारत एक्सप्रेस



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