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‘बहादुर 120’ ने फिर जीवित किया रेजांगला की अमर गाथा को

फरहान अख्तर की फिल्म ‘120 बहादुर’ ने 18 नवंबर 1962 की रेजांगला लड़ाई के अभूतपूर्व साहस को फिर जीवंत कर दिया है. मेजर शैतान सिंह और 13 कुमाऊं रेजिमेंट की 120 जवानों वाली कंपनी ने 4,000 चीनी सैनिकों का डटकर मुकाबला कर इतिहास रचा. यह कथा आज भी भारतीय सेना की शौर्य-परंपरा का सबसे उज्ज्वल अध्याय है.

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Edited by Sahil Singh

फरहान अख्तर की फिल्म 120 बहादुर ने एक बार फिर पूरे देश को 18 नवंबर 1962 की उस महान लड़ाई की याद दिला दी, जब लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर 13 कुमाऊं रेजिमेंट की सिर्फ 120 जवानों वाली चार्ली कंपनी ने चीनी सेना की हजारों की फौज को नाकों चने चबवा दिए. फिल्म मेजर शैतान सिंह भटी (परमवीर चक्र, मरणोपरांत) और उनके अहिर साथियों की शौर्य-गाथा को बड़े पर्दे पर जीवंत कर रही है.

21 नवंबर 1962 का दिन भारत-चीन युद्ध के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था. आज ही के दिन चीन ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा की और अपनी सेनाओं को 1959 की वास्तविक नियंत्रण रेखा से 20 किलोमीटर पीछे हटाने का ऐलान किया. यह युद्धविराम भारत के लिए अपमानजनक था क्योंकि हमारी सेना कई क्षेत्रों में पीछे हट चुकी थी, लेकिन इसी युद्ध के अंतिम चरण में लड़ी गई रेजांगला की लड़ाई ने भारतीय सैनिक के अदम्य साहस और बलिदान की ऐसी मिसाल कायम की जो आज भी हर भारतीय को गर्व से भर देती है.

3,500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर मौत से लड़ते सैनिक

लद्दाख के चुशुल सेक्टर में समुद्र तल से 5,300 मीटर (लगभग 18,000 फीट) की ऊंचाई पर स्थित रेजांगला पास पर 13 कुमाऊं रेजिमेंट की चार्ली कंपनी (मात्र 120 जवान) ने 18 नवंबर 1962 को चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की एक पूरी ब्रिगेड (लगभग 3,000-4,000 सैनिक) के सामने डटकर मुकाबला किया. कंपनी कमांडर थे परमवीर चक्र विजेता मेजर शैतान सिंह.

अदम्य साहस की मिसाल

ठंड -30 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे, ऑक्सीजन की भारी कमी, खुले मैदान में कोई कवर नहीं – फिर भी अहिर जवान (मेजर शैतान सिंह और उनकी कंपनी के अधिकांश जवान हरियाणा-राजस्थान के अहिर समुदाय से थे) ने आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी. जब गोलियां खत्म हो गईं तो संगीनें भांज लीं, जब हाथ कट गए तो पत्थरों से हमला किया. लड़ाई खत्म होने पर 114 भारतीय जवान शहीद हो चुके थे, केवल 5 जवान जीवित बचे जिनमें से 3 बुरी तरह घायल थे. दूसरी तरफ चीनी सेना के 1,300 से अधिक सैनिक मारे गए थे (चीनी आधिकारिक आंकड़े बहुत कम बताते हैं, लेकिन भारतीय स्रोत और बाद में आए विदेशी विश्लेषण इसे सही मानते हैं).

मेजर शैतान सिंह खुद कई गोलियां लगने के बाद भी पोस्ट से पोस्ट तक रेंगते हुए अपने जवानों का हौसला बढ़ाते रहे. जब वह चल नहीं सके तो उनके जवानों ने उन्हें कंबल में लपेटकर एक चट्टान के पीछे रख दिया ताकि दुश्मन उन्हें अपमानित न कर सके. उनकी लाश बाद में अप्रैल 1963 में बर्फ पिघलने पर बरामद हुई – हाथ अभी भी रिवॉल्वर की पकड़ पर जमा हुआ था.

वीरता का जीता-जागता प्रतीक

मेजर शैतान सिंह ने रेजांगला में उन्होंने जो नेतृत्व दिखाया, वह भारतीय सेना के इतिहास में दुर्लभ है. उनकी अंतिम रेडियो संदेश थी: “दुश्मन हमारे चारों तरफ हैं, लेकिन हम डटे हैं. लड़ाई जारी है. जय हिंद!”

उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन सम्मान परमवीर चक्र दिया गया. उनकी प्रतिमा आज जोधपुर में उनके पैतृक गांव में और रेजांगला स्मारक पर लगी है, जहां हर साल 18 नवंबर को श्रद्धांजलि दी जाती है.

सिनेमा और साहित्य

1962 के युद्ध पर हकीकत (1964) – चेतन आनंद की क्लासिक फिल्म. हालांकि यह पूरी तरह रेजांगला पर नहीं है, लेकिन लद्दाख की ऊंची चौकियों पर लड़ते सैनिकों की कहानी है. धर्मेंद्र, प्रिया राजवंश, बलराज साहनी, विजय आनंद अभिनीत. इस फिल्म में “कर चले हम फिदा”, “होके मजबूर मुझे उसने बुलाया होगा” जैसे गाने कैफी आजमी और मदन मोहन ने दिए. यह भारत की पहली युद्ध फिल्म मानी जाती है और उस दौर के दर्शकों पर गहरा असर डाला.

कुलप्रीत यादव की “रेज़ांगला: अनटोल्ड स्टोरी” उल्लेखनीय कृति है. इसे लिखित दस्तावेज की श्रेणी में रखा जा सकता है. इस अमर बलिदान की सबसे प्रामाणिक और गहराई वाली लिखित दास्तान आज भी मानी जाती है – यह किताब सिर्फ युद्ध का विवरण नहीं, बल्कि उन 120 जवानों की जिंदगियों, उनके परिवारों, उनकी बोलचाल, उनके गीतों और आखिरी पलों की हृदयस्पर्शी कहानी है. कुलप्रीत यादव ने वर्षों तक शोध किया – बचे हुए पांच जवानों से बात की, मेजर शैतान सिंह के परिजनों से मिले, हरियाणा-राजस्थान के गांवों में गए, और रेजांगला की उस खून से लाल हुई बर्फ को करीब से देखा. किताब में पहली बार कई तथ्य सामने आए:

– कैसे मेजर शैतान सिंह ने घायल होने पर भी अपनी पोस्ट नहीं छोड़ी
– कैसे सूबेदार रामचंद्र यादव ने अकेले एक पूरी चीनी प्लाटून को रोके रखा
– कैसे नर्सिंग असिस्टेंट फतेह सिंह ने घायलों को बचाने की कोशिश में खुद शहादत दे दी
– कैसे अप्रैल 1963 में जब बर्फ पिघली तो जवानों की लाशें आज भी लड़ते हुए की मुद्रा में मिलीं – राइफल कंधे पर, उंगली ट्रिगर पर.

कुलप्रीत यादव की यह किताब आज भी रेजांगला की सबसे विश्वसनीय और भावनात्मक दस्तावेज मानी जाती है. 120 बहादुर देखने से पहले या बाद में इसे जरूर पढ़ें – क्योंकि फिल्म आपको रुलाएगी, लेकिन यह किताब आपको गर्व से सीना तानकर खड़ा कर देगी.

63 साल बाद भी रेजांगला स्मारक पर लिखा शिलालेख हर आने वाले को झकझोर देता है:

“कैसे वीर भले मरे हैं, यहां देखो आकर तुम,
जब तक सूरज चांद रहेगा, शैतान सिंह का नाम रहेगा.”

मेजर शैतान सिंह और उनकी 13 कुमाऊं की चार्ली कंपनी ने सिद्ध कर दिया कि संख्या और हथियारों से ज्यादा हौसला और देशप्रेम मायने रखता है. 21 नवंबर 1962 को चीन ने युद्धविराम किया, लेकिन रेजांगला के जवानों ने यह साबित कर दिया कि भारत को कभी पराजित नहीं किया जा सकता – बस कभी-कभी हम खुद को हरा लेते हैं.

-भारत एक्सप्रेस



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