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BRICS 2026: क्यों फंसा है ‘ब्रिक्स करेंसी’ का पेच, जानिए भारत के सामने खड़ी 5 बड़ी चुनौतियां

BRICS 2026 में डॉलर से दूरी और साझा करेंसी की बहस फिर तेज होने वाली है, लेकिन भारत के सामने आर्थिक और रणनीतिक चुनौतियां हैं. चीन के युआन का दबदबा, भारत-चीन अविश्वास, अलग-अलग आर्थिक नीतियां और अमेरिकी टैरिफ दबाव सबसे बड़ी अड़चनें हैं.

BRICS देशों के झंडों के बीच डॉलर, डिजिटल करेंसी और चीनी युआन के प्रतीक, PC-@Chatgpt

Explainer on BRICS Currency: भारत की मेजबानी में आयोजित होने जा रहे ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन 2026 पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग समेत संगठन के तमाम कद्दावर नेता दिल्ली में जुट रहे हैं. इस महा-मंथन के बीच एक बार फिर ‘ब्रिक्स करेंसी’ और ‘डी-डॉलराइजेशन’ यानी डॉलर से मुक्ति की बहस सबसे ऊपर आ गई है.

लेकिन कैमरे की इस चमक के पीछे एक बड़ा और कड़वा सवाल यह है कि क्या ब्रिक्स देश वाकई अमेरिकी डॉलर के एकाधिकार को हिला पाएंगे? या फिर डॉलर से मुक्ति की यह चाहत, अनजाने में चीन के ‘युआन’ की गुलामी का नया रास्ता खोल देगी?

बता दें कि भारत के लिए यह शिखर सम्मेलन केवल एक राजनयिक आयोजन नहीं बल्कि अपनी आर्थिक संप्रभुता को बचाने की एक बड़ी परीक्षा है. डॉलर के मुकाबले एक साझी ब्रिक्स करेंसी खड़ी करने में दुनिया के सामने 5 सबसे बड़े कांटे मौजूद हैं:

‘युआन’ का बढ़ता चलन और चीन का हिडन एजेंडा

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कारण रूस ने अपने अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए चीनी युआन को बड़े पैमाने पर अपना लिया है. ब्रिक्स के नए सदस्य देश भी धीरे-धीरे युआन में व्यापार बढ़ा रहे हैं. भारत के लिए सबसे बड़ा चैलेंज यही है.

अगर डॉलर को हटाकर किसी ब्रिक्स पेमेंट सिस्टम या साझी करेंसी को लाया जाता है, तो अपनी विशाल मैन्युफैक्चरिंग अर्थव्यवस्था के दम पर चीन उस पर पूरी तरह हावी हो जाएगा. भारत कभी नहीं चाहेगा कि वह अमेरिकी डॉलर की निर्भरता छोड़कर बीजिंग के ‘युआन ट्रैप’ में फंसे.

भारत-चीन सीमा विवाद और ‘फाइनेंशियल ट्रस्ट’ की कमी

किसी भी साझी मुद्रा या साझा वित्तीय तंत्र को चलाने के लिए सदस्य देशों के बीच अटूट भरोसे की जरूरत होती है. लेकिन ब्रिक्स के दो सबसे मजबूत स्तंभ-भारत और चीन-के बीच गहरे भू-राजनीतिक मतभेद हैं.

लद्दाख सीमा पर तनाव और हिंद महासागर में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के माहौल में दोनों देशों के बीच वह ‘वित्तीय भरोसा’ कायम होना लगभग नामुमकिन है. जब तक सीमा पर विश्वास बहाली नहीं होती, तब तक भारत के लिए चीन के साथ किसी गहरे वित्तीय एकीकरण की सहमति देना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा.

आर्थिक नीतियों और प्राथमिकताओं में ज़मीन-आसमान का अंतर

यूरोपीय संघ (EU) ने जब ‘यूरो’ लॉन्च किया था, तो उनके सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाएं और मौद्रिक नीतियां एक समान ढांचे में थीं. लेकिन ब्रिक्स का कुनबा आर्थिक रूप से पूरी तरह बिखरा हुआ है:

भारत: दुनिया की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, जो फ्री-मार्केट और लोकतंत्र के सिद्धांतों पर चलती है.

चीन: एक मैन्युफैक्चरिंग महाशक्ति है, जो अपनी मुद्रा (युआन) की कीमत को खुद कंट्रोल और मैनिपुलेट करती है.

रूस: पश्चिमी प्रतिबंधों से जूझ रही एक तेल-निर्भर अर्थव्यवस्था है.

ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका: अपनी-अपनी गंभीर घरेलू आर्थिक चुनौतियों और मंदी से जूझ रहे हैं.

ऐसी स्थिति में सभी देशों के लिए एक समान ब्याज दर, महंगाई दर या एक सेंट्रल बैंक की मौद्रिक नीति तय करना आर्थिक रूप से एक असंभव पहेली जैसा है.

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वाशिंगटन का दबाव और 100% टैरिफ की धमकी

अमेरिका ब्रिक्स की इन हरकतों को बेहद गंभीरता से देख रहा है. अमेरिकी प्रशासन की ओर से साफ चेतावनी आ चुकी है कि जो भी देश डॉलर को रिप्लेस करने या ब्रिक्स करेंसी का समर्थन करने की कोशिश करेगा, उस पर 100% तक का भारी आयात शुल्क (Tariff) थोप दिया जाएगा.

भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार अमेरिका है. भारत कभी भी वाशिंगटन को नाराज करके अपने आईटी सेक्टर, फार्मा एक्सपोर्ट और पूरे ट्रेड बैलेंस को दांव पर नहीं लगाना चाहेगा.

भारत का डिजिटल रास्ता: नई करेंसी नहीं, ‘सिस्टम लिंक’ पर जोर

भारत की रणनीति इस पूरे विवाद में बहुत व्यावहारिक और स्पष्ट है. नई दिल्ली किसी ‘साझी ब्रिक्स कागजी मुद्रा’ के पक्ष में बिल्कुल नहीं है. दिल्ली शिखर सम्मेलन में भारत का मुख्य फोकस इस बात पर रहेगा कि ब्रिक्स देश अपनी-अपनी राष्ट्रीय डिजिटल मुद्राओं (CBDC)-जैसे भारत का e-Rupee और चीन का e-CNY-को एक साझी तकनीक से जोड़ें.

इससे व्यापार में डॉलर पर निर्भरता भी कम होगी, लेनदेन की गति बढ़ेगी और भारत को चीन या अमेरिका किसी के भी सामने झुकना नहीं पड़ेगा.

-भारत एक्सप्रेस



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