Gautam Adani US Case
Adani US Case: भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले में अमेरिकी अदालत द्वारा न्याय विभाग (DoJ) से विस्तृत स्पष्टीकरण मांगे जाने के बाद भी कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि मामला दोबारा पटरी पर लौटने की संभावना बेहद कम है. अमेरिका के वरिष्ठ वकील क्रिस मैन के अनुसार, जज का यह आदेश पूरी तरह औपचारिक है और इससे यह संकेत नहीं मिलता कि मुकदमा आगे बढ़ेगा.
जज ने क्यों मांगा जवाब?
ब्रुकलिन स्थित अमेरिकी जिला न्यायाधीश निकोलस गरौफिस ने DoJ से कहा है कि वह 18 मई को दाखिल उस अनुरोध पर अधिक विस्तृत कारण बताए, जिसमें गौतम अडानी और अन्य आरोपियों के खिलाफ दायर आपराधिक आरोप वापस लेने की मांग की गई थी. अदालत का कहना है कि शुरुआती आवेदन में पर्याप्त कारण नहीं बताए गए थे. अदालत ने DoJ को 13 जुलाई तक विस्तृत जवाब दाखिल करने का समय दिया है.
‘यह सामान्य कानूनी प्रक्रिया है’
वरिष्ठ अमेरिकी वकील क्रिस मैन ने कहा कि अमेरिकी कानून के Rule 48(a) के तहत अभियोजन वापस लेने के लिए अदालत की अनुमति जरूरी होती है. ऐसे मामलों में जज अतिरिक्त जानकारी मांग सकते हैं और यह बिल्कुल सामान्य प्रक्रिया है.
उन्होंने कहा कि आधुनिक अमेरिकी न्यायिक इतिहास में ऐसा कोई महत्वपूर्ण उदाहरण नहीं है, जहां अदालत ने न्याय विभाग को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी आपराधिक मुकदमे को जारी रखने के लिए बाध्य किया हो.
कुछ ही हफ्तों में खत्म हो सकता है मामला
क्रिस मैन के मुताबिक, DoJ निर्धारित समयसीमा से पहले अपना विस्तृत जवाब दाखिल कर सकता है. उनके अनुसार, संभावना है कि अदालत कुछ ही सप्ताह में बिना सुनवाई के भी मामले को खारिज कर सकती है. उन्होंने कहा कि अदालत केवल यह सुनिश्चित करना चाहती है कि अभियोजन वापस लेने का फैसला सद्भावना और कानून के अनुरूप लिया गया है.
एरिक एडम्स केस का दिया उदाहरण
कानूनी विशेषज्ञों ने न्यूयॉर्क के मेयर एरिक एडम्स के भ्रष्टाचार मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी DoJ ने आरोप वापस लेने का अनुरोध किया था. उस दौरान अदालत ने विस्तृत स्पष्टीकरण और सुनवाई की थी, लेकिन अंततः कानूनी कार्रवाई वापस लेने की अनुमति दे दी थी. विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत सरकार के फैसले की समीक्षा तो कर सकती है, लेकिन उसे पलटने की शक्ति बेहद सीमित होती है.
अडानी की ओर से अदालत में रखे गए प्रमुख तर्क
अडानी पक्ष ने 24 जून 2026 को अदालत में दाखिल पत्र में कई महत्वपूर्ण दलीलें पेश कीं.
- अमेरिकी कानून का दायरा नहीं: सभी लेन-देन अमेरिका के बाहर हुए. बॉन्ड दस्तावेज अमेरिका के बाहर तैयार और मंजूर किए गए तथा उन पर अंग्रेजी कानून लागू था. इसलिए मामला अमेरिकी प्रतिभूति कानून के दायरे में नहीं आता.
- रिश्वत के आरोपों पर सवाल: पूर्व भारतीय नियामक अधिकारी की विशेषज्ञ रिपोर्ट में कहा गया कि कथित भुगतान वास्तव में राज्य बिजली कंपनियों को सौर ऊर्जा अनुबंधों के लिए दी गई वैध व्यावसायिक रियायतें थीं, न कि रिश्वत.
- 500 पन्नों से अधिक दस्तावेज सौंपे: फरवरी से अप्रैल 2026 के बीच अडानी समूह ने DoJ को लगभग 500 पन्नों के कानूनी दस्तावेज, विशेषज्ञ रिपोर्ट और तर्क सौंपे. इनमें हार्वर्ड लॉ स्कूल के एक प्रोफेसर और पूर्व SEC आयुक्त की राय भी शामिल थी.
- निवेशकों को कोई नुकसान नहीं: अडानी पक्ष का कहना है कि अभियोग में किसी निवेशक को वित्तीय नुकसान होने का आरोप नहीं लगाया गया है. 2021 के बॉन्ड का भुगतान पूरा हो चुका है, 2024 के बॉन्ड पर कोई चूक नहीं हुई है, 2021 का ऋण पूरी तरह चुकाया जा चुका है और 2023 का कर्ज भी डिफॉल्ट में नहीं है.
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क्या है पूरा मामला?
अमेरिकी अधिकारियों ने गौतम अडानी और अन्य के खिलाफ प्रतिभूति धोखाधड़ी (Securities Fraud) और वायर फ्रॉड (Wire Fraud) से जुड़े आरोप लगाए थे. आरोप था कि भारत में सौर ऊर्जा परियोजनाओं से संबंधित कथित रिश्वतखोरी के जरिए निवेशकों को गुमराह किया गया. हालांकि, अब अमेरिकी न्याय विभाग स्वयं इस मामले को वापस लेने की मांग कर चुका है.
-भारत एक्सप्रेस
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