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‘असफलता सिर्फ एक कॉमा, फुल स्टॉप नहीं…’, आरा में मैट्रिक फेल छात्रा के खौफनाक कदम पर शिक्षाविदों की भावुक अपील

आरा के काजीचक मोहल्ले में मैट्रिक परीक्षा में असफल होने पर 17 वर्षीय छात्रा ने फांसी लगाकर जान देने की कोशिश की. परिजनों ने समय रहते बचा लिया, छात्रा अस्पताल में भर्ती है और हालत गंभीर बनी हुई है…

रिपोर्ट-आशुतोष पाण्डेय


Matric fail student suicide attempt Ara Bihar: आरा भोजपुर नगर थानानगर थाना क्षेत्र के काजीचक मोहल्ले में सोमवार को उस समय चीख-पुकार मच गई, जब मैट्रिक परीक्षा के परिणामों से निराश 17 वर्षीय चंचल कुमारी ने फांसी लगाकर जान देने की कोशिश की. दरअसल कमलेश प्रसाद की बेटी चंचल ने रविवार को आए रिज़ल्ट में खुद को असफल पाकर मानसिक संतुलन खो दिया था. सोमवार दोपहर जब घर के अन्य सदस्य अपने कामों में व्यस्त थे, उसने कमरे का दरवाजा बंद कर अपनी जीवनलीला समाप्त करने का प्रयास किया.

गनीमत रही कि उसकी छोटी बहन ने उसे फंदे पर झूलते देख शोर मचा दिया, जिससे परिजनों ने समय रहते दरवाजा तोड़कर उसे नीचे उतार लिया. फिलहाल चंचल सदर अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती है, जहाँ डॉक्टरों की टीम उसे बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है.

परिजनों ने मामले पर क्या बताया?

चंचल के पिता का कहना है कि रिज़ल्ट आने के बाद से ही वह गुमसुम थी लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि वह इतना बड़ा कदम उठा लेगी. यह घटना केवल एक परिवार का दुख नहीं है बल्कि उस ‘प्रेशर कुकर’ वाली शिक्षा व्यवस्था का परिणाम है जहां  अंकों को सफलता का एकमात्र पैमाना मान लिया गया है. अस्पताल के गलियारे में सिसकते परिजनों की आवाजें हर उस छात्र और अभिभावक के लिए एक सबक हैं, जो रिज़ल्ट को ही अंतिम सत्य मान बैठते हैं. स्थानीय निवासियों में इस घटना को लेकर गहरा दुख है और हर कोई चंचल की सलामती की दुआ मांग रहा है.

‘असफलता केवल एक ‘कॉमा’, ‘फुल स्टॉप’ नहीं’

शिक्षा विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मैट्रिक या इंटर की परीक्षा में फेल होना जीवन की असफलता नहीं है. दुनिया के इतिहास में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जहाँ परीक्षाओं में असफल होने वाले लोग बाद में महान वैज्ञानिक, नेता और सफल उद्यमी बने. एक मार्कशीट यह तय नहीं कर सकती कि आपके भीतर कितनी प्रतिभा छिपी है.

अगर आज आप गिर गए हैं, तो इसका मतलब यह है कि आपको और अधिक मजबूती से उठने का अवसर मिला है. खुदकुशी जैसा कदम उठाकर आप केवल अपनी समस्याओं का अंत नहीं करते बल्कि अपने पीछे माता-पिता के लिए उम्र भर का असहनीय दर्द छोड़ जाते हैं.

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अभिभावकों की क्या है जिम्मेदारी?

इस कठिन समय में अभिभावकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है. अपने बच्चों की तुलना दूसरों से करना बंद करें. उन्हें यह अहसास दिलाएं कि आप उन्हें उनके अंकों (Numbers) के लिए नहीं बल्कि उनके होने के लिए प्यार करते हैं. छात्रों को समझना होगा कि  हारना बुरा नहीं है, हार मान लेना बुरा है.

एक साल खराब होने से भविष्य खत्म नहीं होता बल्कि एक नई शुरुआत का मौका मिलता है. चंचल की इस स्थिति ने पूरे आरा को झकझोर दिया है, और अब जरूरत है कि समाज मिलकर बच्चों को यह सिखाए कि गिरकर संभलने वाला ही असली बाजीगर कहलाता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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