उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों बयानों के बड़े तीखे तीर चल रहे हैं. समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव अपनी हर छोटी-बड़ी जनसभा और प्रेस कॉन्फ्रेंस में राम मंदिर से जुड़ी जमीनों में ‘चंदाचोरी’ व भ्रष्टाचार का मुद्दा पुरजोर तरीके से उठा रहे हैं. अखिलेश की इस आक्रामक रणनीति के पीछे मंशा साफ़ है- वह बीजेपी को उसी के सबसे मजबूत स्तंभ ‘धर्म और आस्था’ के मुद्दे पर घेरना चाहते हैं.
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या हिंदुत्व के एजेंडे पर दशकों से महारत हासिल कर चुकी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के खिलाफ अखिलेश का यह दांव काम करेगा, या फिर वे जाने-अनजाने में बीजेपी द्वारा बिछाए गए धर्म के ही जाल में उलझते जा रहे हैं?
क्या बीजेपी के ‘हिंदुत्व’ में फंस गए हैं अखिलेश?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब-जब उत्तर प्रदेश की राजनीति का केंद्र ‘धर्म, मंदिर या आस्था’ बनता है, तब-तब इसका सीधा ध्रुवीकरण (Polarization) बीजेपी के पक्ष में झुका दिखाई देता है. बीजेपी हिंदुत्व की राजनीति की माहिर खिलाड़ी मानी जाती है.
अखिलेश यादव जब बार-बार ‘राम मंदिर’ और ‘चंदाचोरी’ का जिक्र करते हैं, तो वे मुख्य बहस को विकास या बेरोजगारी के मुद्दों से हटाकर वापस मंदिर और धर्म के इर्द-गिर्द ले आते हैं. ऐसे में बीजेपी के पास अपने फायरब्रांड नेताओं के जरिए यह संदेश देने का मौका बन जाता है कि सपा का यह हमला ‘मंदिर निर्माण से चिढ़’ का परिणाम है.

‘मुल्ला मुलायम’ के टैग को धोने की कोशिश
अखिलेश यादव की बदली हुई कार्यशैली भी इस समय चर्चा के केंद्र में है. कभी उनके पिता और सपा संरक्षक स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव को 1990 के दशक में कारसेवकों पर गोली चलवाने के घटनाक्रम के बाद उनके राजनीतिक विरोधियों द्वारा ‘मुल्ला मुलायम’ का टैग दिया गया था.
सपा के शासनकाल के दौरान भी उन पर यह आरोप लगते रहे कि उनकी सरकार में हिंदुत्ववादी सोच रखने वाले लोगों और साधु-संतों को किनारे किया गया.
अब अखिलेश यादव अपनी इस छवि को पूरी तरह बदलने में जुटे हैं:
- अखिलेश यादव आजकल खुले मंचों से भगवान राम और कृष्ण का नाम ले रहे हैं.
- समाजवादी पार्टी के दफ्तरों और नेताओं द्वारा हनुमान चालीसा के पाठ और सुंदरकांड के आयोजन कराए जा रहे हैं.
- वह लगातार खुद को ‘परम रामभक्त और कृष्णभक्त’ साबित करने के प्रयास में लगे हैं.
हालांकि, बीजेपी इस बदलाव को महज ‘चुनावी ढोंग’ करार देती है. बीजेपी का कहना है कि जिन्होंने अपने शासनकाल में रामभक्तों पर गोलियां चलवाईं, वे अब चुनाव आते ही जनेऊ और माला पहन रहे हैं.

यूपी चुनाव 2027: सपा-बीजेपी का ट्रैक रिकॉर्ड
उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव (2022) और पिछले 3 लोकसभा चुनावों (2014, 2019 और 2024) के आंकड़ों पर नजर डालें तो चुनावी समीकरणों की एक स्पष्ट तस्वीर सामने आती है:
1. उत्तर प्रदेश – पिछला विधानसभा चुनाव (2022)
दल+गठबंधन / जीती गईं सीटें / वोट शेयर (%)
भाजपा (BJP+) 255 ~41.3%
समाजवादी पार्टी (SP+) 111 ~32.1%
अपना दल (सोनेलाल) 12 ~0.9%
राष्ट्रीय लोक दल (RLD) 08 ~2.9%
बहुजन समाज पार्टी (BSP) 01 ~12.9%
कांग्रेस (INC) 02 ~2.3%
(कुल सीटें: 403)
2. पिछले 3 लोकसभा चुनावों में सीटों का गणित (कुल 80 सीटें)
राजनीतिक दल / 2014 के चुनाव / 2019 के चुनाव /2024 के चुनाव
भारतीय जनता पार्टी (BJP) 71 62 33
समाजवादी पार्टी (SP) 05 05 37
कांग्रेस (INC) 02 01 06
बहुजन समाज पार्टी (BSP) 00 10 00
अन्य / सहयोगी 02 (अपना दल) 02 (अपना दल) 04 (RLD/अपना दल आदि)
(2024 के लोकसभा चुनाव में ‘PDA’ यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक फॉर्मूले से सपा ने यूपी में अब तक का अपना सबसे बेहतरीन प्रदर्शन किया और 37 सीटें जीतीं.)
अखिलेश vs बीजेपी की काट
अखिलेश यादव की चुनावी रणनीति:
PDA का विस्तार: अखिलेश यादव ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के सामाजिक समीकरण को मजबूत करने के साथ-साथ अब उच्च जातियों (खासकर ब्राह्मण समाज) को साधने के लिए मंदिर-चंदाचोरी का मुद्दा उठा रहे हैं.
जातीय जनगणना का दांव: अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और दलितों को अपने पाले में बनाए रखने के लिए सपा लगातार जातीय जनगणना कराने की मांग को चुनावी मुद्दा बना रही है.
सॉफ्ट हिंदुत्व: बीजेपी के ‘कट्टर हिंदुत्व’ के खिलाफ सपा ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ अपनाकर मध्यमवर्गीय हिंदू मतदाताओं की नाराजगी दूर करने में जुटी है.

बीजेपी की काट (काउंटर स्ट्रैटेजी):
सीएम योगी आदित्यनाथ का चेहरा: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज की तारीख में यूपी के सबसे लोकप्रिय और असरदार राजनेता हैं. प्रदेश में अपराध मुक्त कानून-व्यवस्था (‘बुलडोजर मॉडल’) और सख्त शासन प्रणाली के कारण देश के एक बड़े वर्ग में उन्हें भविष्य के ‘प्रधानमंत्री मटेरियल’ के रूप में भी देखा जाता है.
विकास और ‘लॉटरी’ योजनाएं: डबल इंजन सरकार के दम पर एक्सप्रेसवे, इंफ्रास्ट्रक्चर और गरीब कल्याण योजनाओं (राशन, आवास, शौचालय) के लाभार्थियों का एक मजबूत वोट बैंक बीजेपी के पास है.
इतिहास की याद दिलाना: बीजेपी अखिलेश के हर ‘मंदिर या चंदाचोरी’ के बयान के जवाब में 1990 के कारसेवा घटनाक्रम और सपा शासन के दौरान हुए दंगों की याद दिलाकर हिंदू वोटों के बिखराव को रोकने की कोशिश करती है.
क्या रंग लाएगा ‘चंदाचोरी’ का मुद्दा?
राजनीति के चश्मे से देखें तो अखिलेश यादव ‘चंदाचोरी’ का आरोप लगाकर बीजेपी की नैतिक विश्वसनीयता पर चोट करने का प्रयास कर रहे हैं. हालांकि, यदि चुनाव पूरी तरह से धार्मिक अस्मिता और ध्रुवीकरण की पटरी पर लौटता है, तो योगी आदित्यनाथ के कड़े नेतृत्व और बीजेपी के जमीनी कैडर के आगे सपा के लिए अपनी बढ़त बनाए रखना एक बेहद कठिन चुनौती होगी.
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